Family pension: गुजरात हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला देते हुए कहा कि मृत रेलवे कर्मचारी की विधवा की पारिवारिक पेंशन से बकाया वसूली नहीं की जा सकती। 50.60 लाख रुपए की वसूली की रेलवे की मांग खारिज।
Gujarat High Court on family pension: किसी मृत रेलवे कर्मचारी की विधवा को मिलने वाली पारिवारिक पेंशन को बकाया चुकाने के लिए छोड़ी गई संपत्ति नहीं माना जा सकता। यह अहम टिप्पणी करते हुए गुजरात हाई कोर्ट ने भारतीय रेलवे की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 2004 की अनुशासनात्मक कार्यवाही के तहत लगाए गए 50.60 लाख रुपए के जुर्माने की वसूली मृत कर्मचारी की विधवा से करने की मांग की गई थी।
जस्टिस एनएस संजय गौड़ा और जस्टिस जेएल ओडेदरा की डिवीजन बेंच केंद्र सरकार, डिविजनल रेलवे मैनेजर और रेलवे के सीनियर डिविजनल इंजीनियर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के 2012 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें रेलवे द्वारा जारी वसूली आदेश को रद्द कर दिया गया था।
CAT ने यह कहते हुए रेलवे के आदेश को निरस्त कर दिया था कि यह रेलवे सेवा (पेंशन) नियम, 1993 के नियम 15 के अनुरूप नहीं है। रेलवे ने मृत कर्मचारी केएन दामोदरन पर लगाए गए जुर्माने की बकाया राशि उनकी विधवा समजाथाबेन की पारिवारिक पेंशन से वसूलने का निर्देश दिया था।
मामला कर्मचारी के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़ा था। उन पर गंभीर लापरवाही, कर्तव्य के प्रति समर्पण की कमी और उनके जिम्मे स्टॉक की सुरक्षित देखरेख में विफल रहने के आरोप थे। साल 2006 में अनुशासनात्मक प्राधिकरण ने उनकी पूरी डेथ-कम-रिटायरमेंट ग्रेच्युटी (DCRG) रोकने का आदेश दिया था। साथ ही, स्टॉक में कमी के चलते 50.60 लाख रुपए 15 दिनों के भीतर जमा करने और एक महीने का वेतन योगदान के रूप में देने का निर्देश भी दिया गया था।
दामोदरन ने इस आदेश को CAT में चुनौती दी, लेकिन अगस्त 2008 में निर्णय आने से पहले ही उनका निधन हो गया। इसके बाद पुनरीक्षण प्राधिकरण ने ग्रेच्युटी में कटौती को 100% से घटाकर 50% कर दिया, जिसे CAT ने बरकरार रखा। वारिसों द्वारा इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका 2009 में खारिज कर दी गई।
नवंबर 2012 में रेलवे ने बकाया राशि की वसूली विधवा की पारिवारिक पेंशन से करने का आदेश दिया। हाई कोर्ट में रेलवे ने दलील दी कि यह वसूली सार्वजनिक खजाने को हुए नुकसान की भरपाई के लिए उचित है और विधवा अपने पति के बकाया को चुकाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है। रेलवे ने यह भी कहा कि वसूली महंगाई राहत से की जा रही है, न कि मूल पारिवारिक पेंशन से। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि नियम 15 के तहत रेलवे केवल कर्मचारी के अपने पेंशन लाभों से ही बकाया वसूल सकता है, न कि उसके कानूनी वारिस को मिलने वाली पारिवारिक पेंशन से। कोर्ट ने नियम 98 का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि मृत कर्मचारी का कोई भी बकाया केवल परिवार को देय ग्रेच्युटी (DCRG) से ही वसूला जा सकता है, पारिवारिक पेंशन से नहीं।
खंडपीठ ने कहा कि पारिवारिक पेंशन जीवित आश्रितों के भरण-पोषण के लिए दी जाती है और इसे बकाया वसूली के लिए उपलब्ध धन नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि पारिवारिक पेंशन को मृत कर्मचारी द्वारा छोड़ी गई संपत्ति नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिससे कानूनी वारिसों को कर्मचारी के बकाया के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने CAT के आदेश को सही ठहराया और कहा कि पारिवारिक पेंशन, जिसमें महंगाई राहत भी शामिल है, किसी भी प्रकार की वसूली से पूरी तरह सुरक्षित है। आखिर में अदालत ने रेलवे की याचिका खारिज कर दी और निर्देश दिया कि मामले के लंबित रहने के दौरान वसूली गई कोई भी राशि विधवा को वापस की जाए।