
महात्मा गांधी की मातृभाषा गुजराती-काठियावाड़ी थी, हिंदी-उर्दू नहीं। दक्षिण अफ्रीका में वकालत के दौरान उन्होंने खुद 'हिंदुस्तानी' सीखी। यही अनुभव उन्हें जीवन भर एक ऐसी सरल हिंदुस्तानी का पक्षधर बना गया। उन्होंने कहा था, "गांव की हिंदी में जो मिठास है, वो न प्रयाग के पंडितों की संस्कृतनिष्ठ हिंदी में है, न लखनऊ के उर्दू-भाषी अभिजात्य वर्ग की भाषा में।" वायसराय चेम्सफोर्ड के युद्ध सम्मेलन में उन्होंने हिंदुस्तानी में बोलने की अनुमति मांगी थी। वह हैरान थे कि किसी हिंदुस्तानी सम्मेलन में 'हिंदुस्तानी' बोलना असाधारण बात मानी गई।
जर्मन भाषी इलाका सदियों तक बवेरियन, सैक्सन, स्वाबियन जैसी दर्जनों बोलियों में बंटा था। 16वीं सदी में मार्टिन लूथर ने बाइबिल का अनुवाद एक ऐसी बोली में किया, जो पूरे क्षेत्र में समझी जा सके। यही 'होखडॉएत्श' आगे चलकर 1871 के राजनीतिक एकीकरण के बाद स्कूल-मीडिया में अनिवार्य साझा भाषा बनी और जर्मनी के औद्योगिक एकीकरण की नींव बनी।
इटली में 1861 में एकीकरण के वक्त मुश्किल से 2.5% आबादी ही टस्कन भाषा (जो बाद में मानक इतालवी बनी) बोल पाती थी। बाकी सिसिलियन, नेपोलिटन, लोम्बार्ड जैसी अलग-अलग बोलियां बोलते थे। स्कूलों में अनिवार्य इतालवी-शिक्षा शुरू हुई। असली बदलाव 1950-60 के दशक में टेलीविज़न से आया, जब पूरा देश एक साथ एक भाषा में समाचार-शिक्षा-मनोरंजन देखने लगा।
फ्रांस में क्रांति के दौर में विद्वान आबे ग्रेगोआर के सर्वे में पता चला कि देश के पांच में से सिर्फ एक व्यक्ति ही फ्रेंच बोल पाता था। बाकी ब्रेतों, ओक्सितां, अल्सेशियन बोलते थे। इसी रिपोर्ट के आधार पर 1880 के दशक में जूल फेरी के शिक्षा कानूनों के तहत स्कूलों में फ्रेंच के अलावा हर क्षेत्रीय भाषा पर रोक लगाकर राष्ट्रीय एकता की भाषा गढ़ी गई।
जापान में होक्काइदो से क्यूशू तक इतनी भाषाएं थीं कि मेइजी काल (1868-1912) से पहले एक क्षेत्र का व्यक्ति दूसरे को समझ नहीं पाता था। आधुनिकीकरण की दौड़ में शामिल होने के लिए सरकार ने टोक्यो की शिक्षित मध्यम-वर्गीय बोली को आधार बनाकर 'ह्योजुंगो' खड़ी की और इसे स्कूली शिक्षा में अनिवार्य किया। फिर पूरा देश एक भाषा में तेजी से आगे बढ़ा और आर्थिक चमत्कार हो गया।
सोवियत संघ में 90 से ज़्यादा जातीय समूह और 130 से अधिक भाषाएं थीं। 1938 में पहली कक्षा से रूसी अनिवार्य कर दी गई और गैर-रूसी भाषाओं को दबा दिया गया। इससे एक भाषा में राष्ट्रीय संवाद तो हुआ, पर गहरा असंतोष भी पनपा। दबाव ढीला होते ही यही दबा हुआ भाषाई-राष्ट्रवाद सोवियत संघ को 15 टुकड़ों में बांट गया। आज पूर्व-सोवियत देश जानबूझकर रूसी भाषा से दूरी बना रहे हैं।
चीन ने 1956 में पुटोंगहुआ (मानक मंदारिन) को राष्ट्रभाषा बनाया, ताकि आपस में न समझ आने वाली प्रांतीय भाषाओं के बीच पुल बने। इससे श्रम बाजार और उद्योग को फायदा हुआ। पर तिब्बत, शिनजियांग (उइगर) और इनर मंगोलिया जैसे क्षेत्रों में यह नीति और सख्ती से लागू की गई। विरोधी इसे 'सांस्कृतिक आत्मसातीकरण' कहते हैं, तो वहीँ सरकार इसे 'राष्ट्रीय एकता' बताती है।
हर व्यक्ति से कभी न कभी सवाल पूछा जाता है कि उसकी मातृभाषा क्या है? जवाब एक ही भाषा होता है। लेकिन आंकड़े दिखाते हैं कि भारत की भाषाई तस्वीर एक पिरामिड जैसी है। भाषाओं का पिरामिड केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं बनता, बल्कि हर बड़ी भाषा के भीतर भी अपना एक छोटा पिरामिड छिपा है। राज्य दर राज्य इसकी शक्ल भी बदलती रहती है। शहरीकरण, राज्यों के बीच नागरिकों के शिफ्ट होने, फिल्म और संगीत आदि ज़रियों से धीरे-धीरे यह पिरामिड आपस में जुड़ने लगे हैं। देश में हिंदी बोलने वालों की संख्या जनगणना 2011 में 52.83 करोड़ आंकी गई। उस वक्त यह कुल आबादी का 43.63% था, लेकिन केवल 32.22 करोड़ नागरिक ही हिंदी को अपनी मातृभाषा मानते हैं। बाकी 20.61 करोड़ के लिए हिंदी के कई नाम हैं। भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, मगही, हरियाणवी, खोरठा, मारवाड़ी, बुंदेली, मालवी, सादरी, मेवाड़ी, अवधी जैसे पचास से अधिक नाम इनमें शामिल हैं। जनगणना ने इन्हें प्रशासनिक तौर पर हिंदी की छतरी तले गिना।
संविधान में अनुच्छेद 351 हिंदी के संदर्भ में कहता है कि इसे अन्य भाषाओं के शब्द भंडार से शब्द लेकर समृद्ध किया जा सकता है। इसी विचार के साथ देश में भाषाओं का विकास हो रहा है। न केवल हिंदी, बल्कि कई राज्यों की प्रमुख भाषाएं भी राज्य स्तर पर मौजूद सैकड़ों अन्य भाषाओं व बोलियों से शब्द लेकर समृद्ध हुई हैं। यही विचार देश में एक संपर्क भाषा के विकास में अहम भूमिका निभा सकता है। इसी पिरामिड से एक साझी हिंदुस्तानी जुबान विकसित हो सकती है।
ओडिशा में 3.75 करोड़ ओड़िया भाषियों के बीच 26.3 लाख सांबलपुरी और 2.27 लाख देसिया बोलने वाले भी हैं। गुजराती को 5.55 करोड़ लोग बोलते हैं, जिनमें सौराष्ट्री बोलने वाले 2.48 लाख भी गिने जाते हैं। करीब 70 लाख कश्मीरी बोलने वालों में भी सवा लाख शिराजी बोलने वाले गिने जाते हैं। मैथिली की बात करें, तो यहाँ भी थारू व थाती जैसी मातृभाषाएं जुड़ कर पिरामिड बनाती हैं। पूर्वोत्तर का अलग अंदाज़ है। नागालैंड में सिर्फ 11.87% आबादी किसी अनुसूचित भाषा को मातृभाषा बताती है, बाकी 88.13% वो भाषाएं बोलते हैं जो आठवीं अनुसूची में हैं ही नहीं। मिजोरम में आंकड़ा 12.35% बनाम 87.65% है। मेघालय में 14.65% अनुसूचित और 85.35% गैर अनुसूचित भाषा (खासी, गारो) बोलते हैं। अरुणाचल प्रदेश में यह अनुपात 27.87% व 72.13% है। दक्षिण भारत की बात करें तो आंध्र प्रदेश की 83% आबादी तेलुगु बोलती है जिनकी संख्या 7 करोड़ से अधिक है। बाकी आबादी में उर्दू, तमिल, कन्नड़ बोली जाती है। तमिलनाडु में 6.38 करोड़ लोगों की मातृभाषा तमिल है, जो आबादी का 88% से अधिक हिस्सा है। लेकिन तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम बोलने वाले भी लाखों में हैं। कर्नाटक में 4 करोड़ से ज़्यादा लोग कन्नड़ बोलते हैं, जो आबादी का 66.56% है। बाकी नागरिक तेलुगु, मराठी, उर्दू बोलते हैं। केरल में मलयालम को 97% लोग मातृभाषा बताते हैं। यह एकभाषीयता दक्षिण भारतीय राज्यों में सर्वाधिक है।
देश के नागरिक जो भाषाएं और बोलियां बोलते हैं, उनके 19,569 नाम पिछली जनगणना में दर्ज हुए थे। गहन जांच के बाद 1,369 मातृभाषाओं को विशिष्ट मानते हुए आंकड़ों में शामिल किया गया। सभी मातृभाषाएं 121 भाषाओं में बांटी गईं। 22 भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में जगह मिली, तो 99 गैर-अनुसूचित कहलाईं।