राष्ट्रीय

हाशिए पर पारंपरिक फसलें: कहां से मिलेंगे पोषक तत्त्व! दुनिया में फल-सब्जी की 6 हजार किस्में, उगा रहे सिर्फ 48

"दुनिया के 54% फल बाजार पर सिर्फ 5 फसलों का कब्जा! आखिर कहाँ गायब हो गए आंवला, बेल और करोंदा? जानिए कैसे हरित क्रांति के बाद भारत ने अपनी 75% कृषि जैव-विविधता खो दी और इसे कैसे वापस पाया जा सकता है।"

4 min read
Jan 25, 2026
विश्व ने एक सदी में कृषि जैव विविधता का 75 फीसदी हिस्सा खो दिया, लेकिन भारत में यह बदलाव मुख्यरूप से 1960 के दशक में हरित क्रांति के बाद आया।(Photo- Patrika)

आपने कभी गौर किया कि जो मक्के का भुट्टा आप बचपन से खाते आए, उसकी जगह दुकानों पर चुपके से ‘स्वीट कॉर्न’ ने ले ली है, जो शुद्ध रूप से मानकीकृत अमेरिकी किस्म है। स्थानीय जलवायु में तैयार होने वाली अनगिनत फल-सब्जी और अनाज की प्रजातियों को फूड इंडस्ट्री ने हमसे दूर कर दिया, जिन्हें खाकर पीढ़ियां पोषण पाती रहीं। अब सिर्फ चुनिंदा किस्मों का ही बाजार पर कब्जा है, बाकी या तो अतीत का हिस्सा बन गई या उनका प्रयोग सिमट कर रह गया।

राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी (एनएएस) ने हाल ही देश की ऐसी उपेक्षित फल-सब्जियों को मुख्यधारा में लाने की रूपरेखा पेश की है, जिन्हें ‘भविष्य की फसलें’ कहा जा रहा है। एनएएस की रिपोर्ट में दुनिया में फलों की 5400 में से 28 और सब्जियों की 1097 किस्मों में सिर्फ 20 ही करीब 95 प्रतिशत ही मुख्यरूप से उगाई जा रही हैं। जबकि संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार सिर्फ 9 फसलें ही वैश्विक उत्पादन में 66 प्रतिशत हिस्सा रखती हैं।

ये भी पढ़ें

Explain: मॉरीशस को चागोस द्वीप सौंपने पर यूटर्न! क्या डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में आया ब्रिटेन?

भारत की बात करें तो आम, केला और सेब जैसे फल 72 प्रतिशतक उत्पादन क्षेत्र को कवर करते हैं। इस वैश्विक बदलाव से कुछ लोगों के लिए खेती ज्यादा लाभदायक हो गई, जबकि छोटे किसानों को स्थानीय फसलें छोड़नी पड़ी। जो पीढ़ियों से ऐसी फसलों को करते आ रहे थे।

खाद्य प्रणाली पर गहरा असर

कृषि विविधता में यह कमी जलवायु परिवर्तन को बढ़ाने के साथ ही पोषण, आजीविका और वैश्विक खाद्य प्रणालियों की स्थिरता पर भी गहरा असर डालती हैं। एएएफओ के मुताबिक इससे दुनिया में लगभग दो अरब लोग पारंपरिक पोषक तत्त्वों की कमी का सामना कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर कुछ ही फसलों पर निर्भर रहने से खाद्य प्रणालियां जलवायु परिवर्तन के अप्रत्याशित प्रभावों के प्रति अत्यंत संवेदनशील हो जाती हैं। आनुवांशिक रूप से तैयार फसलें कीटों, बीमारियों और जलवायु चिंताओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं, जबकि स्वदेशी फसलें जरूरी पोषक तत्त्वों से भरपूर होती हैं।

हरित क्रांति से बदली दिशा

विश्व ने एक सदी में कृषि जैव विविधता का 75 फीसदी हिस्सा खो दिया, लेकिन भारत में यह बदलाव मुख्यरूप से 1960 के दशक में हरित क्रांति के बाद आया। उस वक्त अकाल और भुखमरी के कारण खाद्यान्न उत्पादन में निर्भरता जरूरी थी। इसलिए उर्वरक, सिंचाई और कीटनाशकों के इस्तेमाल से उत्पादन में कई गुना बढ़ोतरी हुई, लेकिन इसके बाद मोटे अनाज की जगह गेहूं और चावल की खेती ही होने लगी।

ऐसा क्यों?

दुनिया के बाजारों ने न्यूट्रिशन नहीं बल्कि सुविधाओं के आधार पर इन किस्मों का चुनाव किया है। ज्यादातर उगाई जाने वाली फसलें ज्यादा लंबे समय तक सुरक्षित रहती हैं। उन्हें दूर तक बिना खराब हुए सप्लाई किया जा सकता है।

इन पारंपरिक फलों को बिसराया

  1. आंवला: विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर। सूखा सहिष्णु।
  2. बेल: शुष्क/अर्ध-शुष्क क्षेत्रों का कठोर फल; चिकित्सीय-पोषण लाभ।
  3. जामुन: एंथोसायनिन और आयरन का स्रोत; मधुमेह के लिए श्रेष्ठ।
  4. बेर: सूखे के अनुकूल; विटामिन-सी और आयरन से भरपूर।
  5. सीताफल : सीमांत मिट्टी में उगता; पोषक गूदा और बीज।
  6. करोंदा : आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर, अचार में उपयोग।
  7. फालसा : एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर; गर्म, शुष्क परिस्थितियों में पनपता।
  8. इमली : बहु-उद्देशीय फल; गूदा टार्टारिक एसिड और खनिजों से भरपूर।
  9. वुड एप्पल: सूखा प्रतिरोधी; आहार फाइबर-सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर।
  10. शहतूत: पोषक बेरी; रेशम उत्पादन और विविध आजीविका का समर्थन।

इन सब्जियों का प्रयोग भी सिमटा

  1. अमरैंथ : आयरन, कैल्शियम और विटामिन -ए से भरपूर।
  2. मोरिंगा: पत्तियां, फलियां व फूल खनिज-ग्लूकोसिनोलेट्स से भरपूर।
  3. बसेला : आयरन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर।
  4. विंग्ड बीन : उच्च प्रोटीन बहु-उद्देशीय फली; पत्तियां और बीज।
  5. फाबा बीन : प्रोटीन व प्रतिरोधी स्टार्च का स्रोत; ठंडी जलवायु सहिष्णु।
  6. परवल: पाचन और आंत स्वास्थ्य के लिए मूल्यवान।
  7. राउंड मेलन/टिंडा : सूखा सहिष्णु ककड़ी; शुष्क क्षेत्रों में व्यापक।
  8. क्लस्टर बीन : ग्वार गम का स्रोत; रेगिस्तानी भूमि में अच्छी पैदा।
  9. याम बीन: भूमिगत कंद स्टार्च, पानी और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर।
  10. जूट मालो : पत्तेदार सब्जी पॉलीफेनॉल्स, म्यूसिलेज और आयरन से भरपूर; पारंपरिक आहार में महत्वपूर्ण।

6 सब्जियों का दुनिया के 57% बाजार पर कब्जा

आलू (17%), टमाटर (14 %), प्याज (9%), गोभी (7%), खीरा (6 %) और शिमला मिर्च (4%)

इन 5 फलों का 54% बाजार पर कब्जा

केला (20), सेब (11), संतरा (10), अंगूर (7) और आम (6)

कैसे फिर से पुनर्जीवित हों ‘भूली हुई फसलें’

1.अमृत फसल के रूप में मिले पहचान

    • सरकार क्या करे?अमत फसल ब्रांडिंग : जैसे मोटे अनाज को श्रीअन्न के रूप में वैश्विक पहचान दिलाई, उसी तरह इन फसलों को ‘अमृत फसल’ के रूप में प्रचारित कर उपभोक्ताओं की धारणा बदली जाए।नीतिगत सुरक्षा : कम उगाई जाने वाली फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), सब्सिडी और फसल बीमा के दायरे में लाया जाए।सार्वजनिक स्वास्थ्य : इन्हें मिड-डे मील और राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रमों का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए।वर्चुअल जीन बैंक: विभिन्न संस्थानों के संसाधनों को जोडकऱ एक राष्ट्रीय डिजिटल डेटाबेस तैयार किया जाए। पुरानी फसलों के बीजों का संरक्षण भी किया जाए।

    2.खेती और उत्पाद बदलने से बढ़ेगी आय

      • उच्च उत्पादकता : भारत में ये फसलें अभी सिर्फ 0.437 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में हैं, लेकिन इनकी उत्पादकता (11.47 टन/ हेक्टेयर) काफी अच्छी है।
      • बंजर भूमि का सदुपयोग : इन्हें बेकार और निम्नीकृत भूमि (वेस्टलैंड) पर उगाकर अनुत्पादक क्षेत्रों को आय के स्रोत बदला जा सकता है।
      • आय वृद्धि : मार्केटिंग के माध्यम से छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है। बेल का शरबत, आंवले का पाउडर और सहजन की पत्तियों के चूर्ण जैसे उत्पाद बनाकर किसान आय कई गुना बढ़ा सकते हैं।

      ‘खोई हुई फसलों’ को ‘भविष्य की फसलों’ के रूप में पहचान मिले

      जयपुर के जोबनेर स्थित श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. पुष्पेंद्र सिंह चौहान कहते हैं- 'खेती में यह बदलाव बाजार-केन्द्रित कृषि और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं की वजह से आया है, जहां अधिक उपज, एकरूपता और लंबी शेल्फ-लाइफ को पोषण और स्थानीय अनुकूलता से ऊपर रखा गया। इसका नतीजा यह हुआ कि पारंपरिक, पोषक और जलवायु-सहिष्णु फसलों का उपयोग लगातार सिमटता चला गया। जब हम विविधता खोते हैं, तो हम न केवल स्वाद खोते हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और नई बीमारियों के खिलाफ अपनी लड़ने की क्षमता भी खो देते हैं।

      उन्होंने आगे कहा, भारत जैसे देश में, जहां कुपोषण और एनीमिया एक बड़ी चुनौती है, वहां सहजन (मोरिंगा), जामुन, आंवला और बथुआ जैसी पारंपरिक फसलों को 'अमृत फसल' बनाना समय की मांग है। ये फसलें न केवल 'न्यूट्री-बास्केट' हैं, बल्कि कम पानी और खराब मिट्टी में भी जीवित रहने वाली 'क्लाइमेट स्मार्ट' फसलें भी हैं। अब जरूरत है कि इन ‘खोई हुई फसलों’ को पोषण सुरक्षा और जलवायु समाधान के रूप में दोबारा स्थापित किया जाए। इसके लिए सरकारों को न्यूनतम समर्थन मूल्य, बीज संरक्षण, अनुसंधान और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही मिड-डे मील, आंगनवाड़ी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में इन्हें शामिल कर स्थायी मांग पैदा करनी होगी, ताकि किसान और उपभोक्ता दोनों लाभान्वित हों। 'भविष्य की फसलें' प्रयोगशालाओं में नहीं, बल्कि हमारे खेतों और जंगलों में सुरक्षित हैं, जिन्हें मुख्यधारा में लाना समय की आवश्यकता है।

      Updated on:
      25 Jan 2026 01:41 am
      Published on:
      25 Jan 2026 01:39 am
      Also Read
      View All

      अगली खबर