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9.30 बजे सुबह इंदिरा की हत्या, शाम 6.45 बजे राजीव बने पीएम, जानिए नौ घंटे की पूरी कहानी

मां की हत्या के चार घंटे बाद, दिल्ली से दूर, विमान यात्रा के दौरान ही हो गया था राजीव को पीएम बनाने का फैसला। नौ घंटे बाद हो गया शपथ! इस दौरान क्या-क्या हुआ, जानिए पूरी कहानी। राजनीति में भी अचानक ही आए थे राजीव।
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Updated: 30 Oct 2026, 11:01 AM IST
Know how Rajiv Gandhi became PM immediately after Indira Gandhi assassination, Story of Rajiv Gandhi becoming PM
31 अक्तूबर, 1984 की शाम पीएम पद की शपथ लेते हुए राजीव गांधी। (फोटो सोर्स- प्रसार भारती आर्काइव)

1984 में 31 अक्तूबर वह मनहूस तारीख थी, जब 'आयरन लेडी' कही जाने वालीं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके ही बॉडीगार्ड्स ने गोलियों से छलनी कर ढेर कर दिया था। इससे उपजे सत्ता संकट को खत्म करने के लिए आनन-फानन में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर राजीव गांधी की ताजपोशी कराई गई थी।

इंदिरा गांधी पर हमला हुआ है, तुरंत दिल्ली पहुंचें- पश्चिम बंगाल दौरे पर गए राजीव गांधी तक प्रणब मुखर्जी के जरिए पहुंचा संदेश

पश्चिम बंगाल कांग्रेस में गुटबाजी बढ़ी हुई थी। पार्टी में नई जान फूंकने के मकसद से राजीव गांधी ने अक्तूबर के अंत में राज्य का दौरा किया। वह 29 अक्तूबर, 1984 को बागडोगरा हवाई अड्डे पर पहुंचे और उसी दिन से अलग-अलग जगह सभाओं को संबोधित करना शुरू किया। 31 अक्तूबर को राजीव रामनगर में पहली सभा को संबोधित कर चुके थे और दूसरी कोंटाई में कर रहे थे। सुबह करीब 9.30 बजे का वक्त था। प्रणब मुखर्जी के पास पुलिस वायरलेस के जरिए एक मैसेज पहुंचा, 'इंदिरा गांधी पर हमला हुआ है। तुरंत दिल्ली पहुंचें।'

मुखर्जी ने राजीव के पास एक नोट भिजवाया और भाषण जल्दी खत्म करने के लिए कहा। भाषण खत्म होने के बाद राजीव जैसे ही बैठे, उन्हें वायरलेस मैसेज वाली बात बताई गई। आगे के सारे कार्यक्रम रद किए गए और दिल्ली रवानगी की तैयारी कर ली गई।

9.30 पर मैसेज आया था और 9.40 बजे राजीव गांधी, उनके पीएसओ (निजी सुरक्षा अफसर), गनी खान चौधरी और प्रणब मुखर्जी कोंटाई से रवाना हो चुके थे। गनी खान के पास निजी मर्सडीज कार थी। पार्टी की ओर से मिली एंबेसडर कार छोड़ बाकी तीनों भी मर्सडीज में ही बैठ गए थे, ताकि विमान तक जल्दी से पहुंच सकें। विशेष विमान भिजवाने का संदेश दिल्ली पहले ही भिजवा दिया गया था।

राजीव ने कहा कि वह मर्सडीज चला कर ले चलते हैं, लेकिन प्रणब मुखर्जी ने मना किया। वह ड्राइवर की बगल में बैठे और बाकी तीनों पीछे की सीट पर। राजीव ने पूरे रास्ते बीबीसी लगा कर ट्रांजिस्टर रेडियो ऑन रखा। बीबीसी पर प्रसारित खबर से ही उन्हें पता चला कि इंदिरा को 16 गोलियां लगी थीं। राजीव ने पीछे मुड़ कर पीएसओ से पूछा- वीआईपी सुरक्षा में लगे कर्मियों की गोलियां कितनी ताकतवर होती हैं? पीएसओ ने बताया-बहुत। अब राजीव ने पीछे बैठे नेताओं से पूछा- उन्हें इतनी गोलियां मारनी चाहिए थी क्या?

प्रणब मुखर्जी अपनी किताब The Turbulent Years 1980-86 में लिखते हैं, 'मैंने राजीव से कहा कि हमारे पास सिर्फ हमले की खबर आई है, उनके मृत होने की नहीं। बीबीसी अपनी खबर में बता रहा है कि प्रणब मुखर्जी और राजीव गांधी दिल्ली लौट चुके हैं, जबकि हम तो अभी बंगाल में ही हैं। समाचार में जब यह गलत सूचना दी जा सकती है तो बाकी बात भी गलत हो सकती है।'

राजीव को विमान में मिली इंदिरा के नहीं रहने की खबर, तुरंत शुरू हुआ अगले कदम पर मंथन

इस बीच विमान का इंतजाम हो गया था, लेकिन वहां तक पहुंचने में एक बज गए थे। एयरपोर्ट पर कांग्रेस के कई और नेता आ गए थे। वे भी उसी विमान से दिल्ली लौटे। विमान के उड़ते ही राजीव कॉकपिट में गए। कुछ देर बाद वापस लौटे और खबर दी कि मां नहीं रहीं! सब सन्न रह गए। विमान में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

थोड़ी देर बाद नेताओं में आगे के कदम पर चर्चा होने लगी। बलराम झाखड़, गनी खान चौधरी, श्यामलाल यादव, उमा शंकर दीक्षित और शीला दीक्षित इसी मसले पर चर्चा कर रहे थे। बाद में प्रणब मुखर्जी भी शामिल हुए। उन्होंने नेहरू (27 मई, 1964) और शास्त्री (11 जनवरी, 1966) का उदाहरण दिया, जिनकी प्रधानमंत्री पद पर रहते मौत हुई थी और मौत के तुरंत बाद गुलजारी लाल नंदा के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी थी। हालांकि, इन दोनों मामलों में मौत प्राकृतिक थी, लेकिन ये मामला प्रधानमंत्री की हत्या का था। इसलिए केवल राजनीतिक शून्यता नहीं बनी थी, कई और अनिश्चितताएं भी पैदा हो गई थीं।

प्रणब मुखर्जी लिखते हैं, 'चर्चा के अंत में मैंने निष्कर्ष दिया कि हमें राजीव गांधी से प्रधानमंत्री का पद संभालने का आग्रह करना चाहिए। किसी ने सुझाव दिया कि उनके सामने औपचारिक रूप से यह प्रस्ताव लेकर मैं ही जाऊं और इसके अमल पर काम शुरू करवाऊँ। मैं राजीव को विमान के पिछले हिस्से में ले गया और उनसे प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने का अनुरोध किया। उन्होंने छूटते ही सवाल किया कि आपको लगता है मुझसे हो पाएगा? मैंने कहा- जरूर होगा। और आपकी मदद के लिए हम सब हैं। आपको हर किसी का साथ मिलेगा।'

इंदिरा की मौत की खबर सार्वजनिक नहीं करने का हुआ फैसला

फैसला हो चुका था। प्रणब मुखर्जी ने राजीव से कहा कि कॉकपिट में जाइए और दिल्ली को संदेश दीजिए कि नई सरकार बनने से पहले श्रीमती गांधी की मौत की खबर सार्वजनिक नहीं की जाए। तय हुआ कि राजीव को प्रधानमंत्री बनाए जाने और इंदिरा की हत्या की खबर एक साथ सार्वजनिक की जाए, ताकि भ्रम या अनिश्चितता जैसी कोई स्थिति नहीं बने। हालांकि, उपराष्ट्रपति आर वेंकटरमन पहले ही इस तरह का निर्देश दे चुके थे।

दिल्ली पहुंचे राजीव गांधी, उसके बाद क्या-क्या हुआ?

दोपहर बाद तीन बजे राजीव गांधी का विमान दिल्ली में लैंड किया। कैबिनेट सचिव कृष्णास्वामी राव साहिब, गृह सचिव व अन्य अफसरों के साथ वहां मौजूद थे। राजीव गांधी के रिश्तेदार और परिवार के वफादार अरुण नेहरू भी वहां थे। वह राजीव को लेकर तुरंत एम्स चले गए, जहां इंदिरा को रखा गया था।

कैबिनेट सचिव ने प्रणब मुखर्जी को हालात से अवगत कराया और सलाह दी कि गुलजारी लाल नंदा की तरह आप इस समय कमान संभालें। उन्हें बताया गया कि राजीव गांधी शपथ लेने जा रहे हैं। इसके बाद प्रणब मुखर्जी भी एम्स चले गए। वह 3.25 पर एम्स पहुंच चुके थे। उनसे दस मिनट पहले राजीव पहुंचे थे।

एम्स में आठवीं मंजिल पर ऑपरेशन थिएटर के बाहर वारामदे में कई केंद्रीय मंत्री, बड़े अफसर, राज्यों के मुख्यमंत्री पहले से मौजूद थे। राजीव ऑपरेशन थिएटर से सटे एक कमरे में थे और सोनिया गांधी को सांत्वना दे रहे थे।

दिल्ली में भी राजीव को पीएम बनवाने पर ही बनी थी सहमति

वहां पहले से मौजूद प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीसी अलेक्जंडर ने प्रणब मुखर्जी को देखा तो उन्हें बाहर ले गए और बताया कि यहां मौजूद सभी लोगों की राय है कि राजीव को तुरंत प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलवाई जाए। मुखर्जी ने बताया कि विमान में मौजूद सारे नेताओं की भी यही राय थी। इसके बाद अलेक्जंडर ने प्रणब मुखर्जी से कहा कि वे कांग्रेस संसदीय दल (सीपीपी) का नेता चुने जाने जैसी आगे की प्रक्रिया करवाने में मदद करें। मुखर्जी ने सुझाव दिया कि इतना वक्त नहीं है कि सीपीपी की बैठक बुलाई जा सके। पार्टी में निर्णय लेने वाली सबसे बड़ी इकाई संसदीय बोर्ड (सीपीबी) है। सीपीबी निर्णय ले लेगी, जिसे बाद में सीपीपी से मंजूर करा लिया जाएगा। वहां मौजूद सभी नेताओं ने इस पर हामी भरी। इस बीच राजीव की भी सहमति ले ली गई थी।

शाम चार बजे के बाद शुरू हुई राजीव को पीएम बनवाने की प्रक्रिया

शाम 4.10 बजे प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री कार्यालय 1 अकबर रोड के लिए निकले, ताकि सीपीबी की बैठक बुलाने का इंतजाम किया जाए। बाहर आपाधापी में उन्हें अपनी कार ही नहीं मिल रही थी। अरुण नेहरू ने उन्हें अपनी कार में लिफ्ट की पेशकश की। कमलनाथ भी उसी कार में बैठ गए। वे 1 अकबर रोड पहुंचे तो देखा पीवी नरसिंहा राव और जीके मूपनार (जो सीपीबी के महासचिव भी थे) पहले से मौजूद थे। राव और मुखर्जी को छोड़ सीपीबी का कोई सदस्य उस समय दिल्ली में नहीं था। कमलापति त्रिपाठी और एम चंद्रशेखर बाहर थे।

राष्ट्रपति को भेजने के लिए चिट्ठी का ड्राफ्ट तैयार किया जाने लगा। प्रणब मुखर्जी ने पहला ड्राफ्ट बनाया। राव ने इसमें संशोधन किया। इसके बाद आरके धवन ने चिट्ठी टाइप की। बस दो लाइन की चिट्ठी बनाई गई, जिसमें बताया गया कि सीपीबी ने राजीव गांधी को सदन में कांग्रेस पार्टी का नेता चुना है। लिहाजा अनुरोध है कि उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया जाए।

राष्ट्रपति से मिलने अरुण नेहरू को एयरपोर्ट भेज दिया गया

मूपनार ने बतौर सीपीबी महासचिव इस पर दस्तखत किए। राजीव गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नेता चुने जाने के सीपीबी के प्रस्ताव वाली चिट्ठी इसके साथ नत्थी की गई। इस चिट्ठी पर मुखर्जी और राव के दस्तखत थे। लिफाफा तैयार हो चुका था। अब अरुण नेहरू को फौरन एयरपोर्ट पहुंचने के लिए कहा गया। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ओमान गए हुए थे। उनका विमान दिल्ली पहुंचने ही वाला था।

अरुण नेहरू को कहा गया कि राष्ट्रपति के विमान से उतरने से पहले वह खुद विमान में चले जाएं और उन्हें सारी बातों से अवगत कराएं। इस बीच पीसी अलेक्जेंडर भी 1 अकबर रोड पहुंच गए थे। तब तक 4.30 बज चुके थे। प्रणब और पीसी राष्ट्रपति भवन के लिए निकल गए।

राजधानी में सुरक्षा बेहद कड़ी थी। सुरक्षाकर्मियों ने प्रणब और पीसी की कार राष्ट्रपति भवन में नहीं जाने दी, क्योंकि वे बिना अपाइंटमेंट के पहुंचे थे। तब पीसी कार से उतरे और सुरक्षाकर्मियों पर गुस्सा होते हुए कहा- कार में बैठे गृह और वित्त मंत्री को भी तुम नहीं पहचानते हो क्या? आखिरकार कार को अंदर जाने की इजाजत मिली।

उधर, जैल सिंह दिल्ली में उतरे तो सीधे एम्स चले गए। वहां से वह राजीव गांधी के साथ ही राष्ट्रपति भवन पहुंचे। राष्ट्रपति ने इंतजार कर रहे प्रणब मुखर्जी, जीके मूपनार और नरसिंहा राव को तुरंत बुलाया। वह स्टडी रूम में थे। वहीं उन्हें चिट्ठी सौंपी गई। उन्होंने कहा कि वह पहले ही राजीव गांधी को सरकार बनाने के लिए न्योता देने का फैसला कर चुके हैं।

इस बीच राजीव गांधी ने भी तय कर लिया था कि वह तीन मंत्रियों के साथ शपथ लेंगे- नरसिंहा राव, शिव शंकर, प्रणब मुखर्जी। मुखर्जी ने उन्हें सिखों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए बूटा सिंह को भी शामिल करने की सलाह दी, जिसे उन्होंने मान लिया।

इस तरह राजीव गांधी को राष्ट्रपति की ओर से सरकार बनाने का न्योता मिला। उन्होंने शपथ के लिए मंत्रियों की सूची राष्ट्रपति को सौंपी और उसी शाम 6.45 बजे बतौर प्रधानमंत्री उनका शपथ ग्रहण हो गया।

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30 Oct 2026, 11:01 AM IST
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