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टीएन शेषन के खिलाफ तेज हुआ था महाभियोग का शोर तो पीएम ने देश से बाहर भेजने का बना लिया था प्लान

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष हमलावर हो गया है। उन पर बीजेपी के पक्ष में काम करने के आरोप लग रहे हैं। 1991 में जब कुछ ऐसा ही टीएन शेषन के साथ हुआ था तो उन्होंने किस तरह मामले से निपटा था और सरकार के खिलाफ खड़े हो गए थे, पढ़िए। पीएम ने विपक्ष को उन्हें हटाने तक का आश्वासन दे दिया था, लेकिन शेषन अडिग रहे थे।
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Gyanesh Kumar vs TN Seshan, 1991 Election Commission controversy and current SIR row
तब के प्रधानमंत्री ने महाभियोग का शोर शांत कराने के लिए टीएन शेषन को विदेश में नौकरी का ऑफर दिया था, लेकिन वह पूरे समय चुनाव आयोग में जमे रहे। (इमेजिंग: एआई)

टीएन शेषन अब तक के सबसे चर्चित और विवादित चुनाव आयुक्तों में से एक रहे। हालांकि, उनकी चर्चा या उनसे जुड़े विवाद गलत कारणों या पक्षपात आदि के ठोस आरोपों की वजह से नहीं थे। ज़्यादातर मामलों में उनके सख्त और बेबाक निर्णय व चुनाव सुधार से जुड़े फैसले लागू करवाने जैसे कदम चर्चा या विवाद के कारण बनते थे। इन पर खूब राजनीति होती थी।

इन दिनों चुनाव आयोग काफी विवादों में है और विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। महाभियोग प्रस्ताव लाने तक की बात हो रही है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से जो कुछ भी कहा है, उससे विवाद ठंडा होने के बजाय बढ़ गया है। ऐसा ही कुछ करीब 35 साल पहले (1991) भी हुआ था। तब भाजपा सहित पूरे विपक्ष के निशाने पर थे टीएन शेषन। उस समय पीएम थे चंद्रशेखर। वह अल्पमत की मिली-जुली सरकार चला रहे थे। उनकी सरकार विपक्ष के दबाव के आगे झुक गई थी, लेकिन शेषन अपने रुख पर अड़े रहे थे। उन्होंने अपने आगे सरकार की एक नहीं चलने दी थी। उस समय क्या और कैसे हुआ था इसका पूरा ब्योरा शेषन आत्मकथा में लिख कर गए हैं।

जब पीएम चाहते थे चुनाव हो, सीईसी बिना पर्याप्त सुरक्षा के नहीं कराने पर अड़े रहे

1991 के लोक सभा चुनाव के दौरान टीएन शेषन ने एक बड़ा फैसला लिया था। मार्च 1991 में चुनाव की अधिसूचना जारी हुई। शेषन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वह जम्मू कश्मीर सहित पूरे देश में चुनाव कराने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उन्हें इस बात का भरोसा हो कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान कराने लायक स्थिति है। उस समय पंजाब, जम्मू कश्मीर और असम में बहुत हिंसा हो रही थी। पंजाब के बारे में 25 मार्च को गृह मंत्रालय ने खुफिया रिपोर्ट्स के आधार पर राय दी थी कि वहां चुनाव कराने लायक माहौल नहीं है। लेकिन, प्रधानमंत्री वहां चुनाव करवाना चाहते थे। 1 अप्रैल को अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि पंजाब और असम में चुनाव कराना ठीक नहीं होगा। सीपीएम-सीपीआई की भी यही राय थी। स्थिति यह थी कि पंजाब के राज्यपाल ने केंद्र से अर्धसैनिक बलों की 400 अतिरिक्त कंपनियां मांगी। 300 कंपनियां वहां पहले से मौजूद थीं। इस तरह करीब 35 प्रतिशत अर्धसैनिक बल अकेले पंजाब में तैनात हो जाते।

इन सब के बावजूद 11 अप्रैल को गृह सचिव की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त को चिट्ठी आ गई, जिसमें लिखा था कि पंजाब में लोक सभा चुनाव के साथ ही विधान सभा चुनाव कराए जा सकते हैं। बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त शेषन ने अपनी ओर से कहा कि पंजाब में चुनाव नहीं करवाए जाएं, लेकिन सरकार ऐसा नहीं चाहती थी। अंततः अधिसूचना जारी हो गई। इसके मुताबिक पंजाब व असम में लोक सभा के साथ विधान सभा चुनाव भी होने थे। जिस दिन अधिसूचना जारी हुई, उसी दिन पंजाब के राज्यपाल की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त को एक नोट भेजा गया। इसमें सुरक्षाकर्मियों की उपलब्धता की समस्या बता कर विधान सभा चुनाव की तारीख कम से कम तीन-चार हफ्ते आगे (15 या 20 जून) बढ़ाने का अनुरोध था। शेषन ने चुनाव रीशेड्यूल करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया और 22 जून की तारीख तय कर दी। इससे पहले इस अधिकार का इस्तेमाल किसी सीईसी ने नहीं किया था।

राजीव गांधी की हत्या और पंजाब में अनेक कत्ल के बावजूद सरकार कराना चाहती थी चुनाव

इस बीच स्थिति बहुत खराब हो गई। पहले चरण के मतदान के अगले ही दिन, 21 मई को रात में राजीव गांधी की हत्या हो गई थी। इसके बाद 23 और 26 मई को होने वाला मतदान रोक दिया गया। उधर पंजाब में भी कई उम्मीदवारों की हत्या हो चुकी थी और हो ही रही थी। शेषन ने गृह मंत्रालय को स्थिति की जानकारी दी और केंद्र सरकार व पंजाब के राज्यपाल से राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा करने के लिए कहा। साथ ही चुनाव टालने का भी अनुरोध किया। सरकार 22 जून को चुनाव कराने पर अड़ी थी। इस बीच पंजाब के राज्यपाल शेषन से मिलने आए। उन्होंने भी यही संदेश दिया कि 22 जून को भी चुनाव टालना ही अच्छा रहेगा। लेकिन, जब वह प्रधानमंत्री से मिल कर लौटे तो उनके विचार बदल चुके थे। लेकिन, शेषन ने अपने स्तर पर हालात की समीक्षा की और सभी स्थितियों के मद्देनजर चुनाव तीन महीने के लिए टाल दिया। नई तारीख 25 सितंबर तय हुई।

चुनाव टालने के लिए शेषन ने पहली बार इस्तेमाल किया सीईसी को संविधान में मिला अधिकार

टीएन शेषन ने आत्मकथा 'थ्रू द ब्रोकेन ग्लास' में लिखा है कि चुनाव आयोग के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 30 और 153 का इस्तेमाल कर चुनाव को टाला हो। लेकिन, यह निर्णय शेषन को बड़ा भारी पड़ा। आगे चल कर उनके ऊपर महाभियोग चलाए जाने के लिए इसी फैसले को सबसे बड़ा आधार बनाया गया। उन पर आरोप लगा कि कांग्रेस को फायदा पहुंचाने के लिए चुनाव टाला गया है।

जब चुनाव की तारीख नजदीक आई तो एक बार फिर चुनाव टालने की मांग आई। इस बार सरकार की तरफ से ही आई। 21 अगस्त को पहले पंजाब के राज्यपाल ने यह मांग की। फिर सितंबर की शुरुआत में प्रधानमंत्री ने भी इसके संकेत दे दिए। 18 सितंबर को संसद ने पंजाब में राष्ट्रपति शासन छह महीने और बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। अंततः फरवरी 1992 में चुनाव कराए गए।

कांग्रेस थी नरम, बाकी सभी पार्टियां हुईं गरम

इस बार भले ही चुनाव सरकार ने टाला था, लेकिन विपक्षी पार्टियां सीईसी की पीछे हाथ धो कर पड़ गए। कांग्रेस का रुख थोड़ा नरम था, लेकिन बीजेपी सहित बाकी पार्टियां बड़ी आक्रामक हो गई थीं। विपक्षी पार्टियां इस चुनाव से पहले शेषन ने जब चुनाव टाला था तो नरसिम्हा राव ने उनसे कहा था- आपने पंजाब को बचा लिया। लेकिन, इसे लेकर बाकी दलों की प्रतिक्रिया बड़ी तल्ख थी। बीजेपी ने चुनाव आयोग पर 'एक राजनीतिक दल' की कठपुतली के तौर पर काम करने का आरोप लगाया। पंजाब बीजेपी ने चुनाव टालने के फैसले को 'लोकतंत्र की हत्या' करार दिया। बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने राष्ट्रपति से मिल कर शेषन को बर्खास्त करने की मांग की। जनता दल के प्रवक्ता जयपाल रेड्डी ने कहा था, 'उन पर महाभियोग चलाने के लिए हमें सत्ता में आने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस और कानून मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी को छोड़ कर मुख्य चुनाव आयुक्त के रवैये से कोई खुश नहीं है।' 15 जून को जनता दल का एक प्रतिनिधिमंडल अपनी शिकायत लेकर राष्ट्रपति से भी मिला।

20 जून को बीजेपी ने चुनाव पर चर्चा के लिए पार्टी की बैठक बुलाई थी। उस बैठक में बाकायदा प्रस्ताव पारित किया गया। इसमें कहा गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के मनमानापूर्ण रवैये से हम काफी दुखी हैं। उन्होंने अपने पद की गरिमा गिराई है। 27 जून को भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी राष्ट्रपति के पास गए और वहां पंजाब के चुनाव टालने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग की। 2 जुलाई को बीजेपी ने कहा कि वह शेषन के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाने के प्रयास में समन्वय करने के लिए तैयार है। इस बीच अफवाह ऐसी भी उड़ गई कि मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दे देंगे, लेकिन शेषन लिखते हैं कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं था। 29 जून को जनता दल ने एक नोटिस भेजकर मांग की कि शेषन या तो इस्तीफा दें या महाभियोग के लिए तैयार रहें। 30 जून को जनता दल के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में एक प्रस्ताव जारी करके यह चेतावनी दोहराई भी गई। लेकिन शेषन अडिग थे। उन्हें पता था कि विपक्ष अगर महाभियोग प्रस्ताव ले भी आता है तो उसे पारित करवाने लायक बहुमत उसके पास नहीं है।

सरकार ने विपक्ष से कर लिया समझौता

इसके बाद संसद का सत्र शुरू हुआ तो उसमें चुनाव आयोग, य=मुख्य चुनाव आयुक्त और पंजाब के चुनाव को टालने के उनके फैसले को लेकर हंगामेदार बहस हुई। हालांकि इस बीच महाभियोग की मांग कमजोर पड़ गई थी। लेकिन 20 से 26 अगस्त के बीच जनता दल ने महाभियोग का प्रस्ताव लाने की तैयारी बड़ी गंभीरता से शुरू की। इस बीच भाजपा का मन बदल गया था। 24 अगस्त को सत्ताधारी समाजवादी जनता पार्टी ने भी तय कर लिया कि महाभियोग नहीं लाया जाएगा। लेकिन, दो दिन बाद ऐसी खबर आई कि वाम मोर्चा और राष्ट्रीय मोर्चा महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे थे। वाम मोर्चा प्रधानमंत्री पर इस बात के लिए दबाव बना रहा था कि शेषन इस्तीफा दे दें।

इस बीच सीईसी देश में नहीं थे। उनके लौटने के बाद एक बार फिर इस्तीफे की अटकलें लगने लगीं। इसी बीच सरकार से उन्हें सोवियत संघ या अमेरिका का राजदूत बनाने का ऑफर दिया गया। अखबारों में यह तक चर्चा होने लगी कि अगला सीईसी कौन होगा? रमा देवी का नाम आगे किया गया। 20 सितंबर को एक और नाम (एम एम राजेंद्रन) हवा में तैरने लगा। राजेंद्रन उस समय खेल सचिव हुआ करते थे। इस बीच महाभियोग को लेकर बात नरम पड़ने लगी थी। 4 सितंबर को राष्ट्रीय मोर्चा और वाम मोर्चा में इस बात पर सहमति बनी कि महाभियोग की बात पर अब ज्यादा जोर नहीं दिया जाए। सरकार की ओर से उन्हें यह आश्वासन मिला था कि जल्द ही कोई ना कोई रास्ता निकाल लिया जाएगा, जिससे शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर नहीं रहें। लेकिन शेषन को इन बातों से कोई मतलब नहीं था। वह अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद ही चुनाव आयोग से हटे।

Updated on:
01 Oct 2026 03:52 pm
Published on:
01 Oct 2026 03:46 pm