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चुनाव आयोग की बात मानने से सरकार ने किया था इंकार तो टीएन शेषन ने इस्तेमाल किया था अपना अधिकार

अधिसूचना जारी होने और पीएम के न चाहने के बावजूद टाल दिए थे चुनाव। टीएन शेषन ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि चुनाव टालने के लिए मिले इस अधिकार का प्रयोग उनसे पहले किसी चुनाव आयुक्त ने किया ही नहीं था। पंजाब में अशांति के बावजूद केंद्र सरकार वहां चुनाव कराने पर अड़ी थी। चुनाव आयोग की सलाह को दरकिनार करते हुए उसने अधिसूचना भी जारी करवा दी। लेकिन, शेषन अपने फैसले पर अडिग रहे थे।
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TN Seshan and Chandrashekhar political history, PM ko bhi dikha di thi power, Election Commission controversy in India

चुनाव आयोग के दबंग मुखिया के तौर पर टीएन शेषन के कई किस्से मशहूर हैं। (इमेजिंग: एआई)

1991 के लोक सभा चुनाव के दौरान टीएन शेषन ने एक बड़ा फैसला लिया था। मार्च 1991 में चुनाव की अधिसूचना जारी हुई। शेषन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वह जम्मू कश्मीर सहित पूरे देश में चुनाव कराने के लिए तैयार हैं, बशर्ते उन्हें इस बात का भरोसा हो कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान कराने लायक स्थिति है। उस समय पंजाब, जम्मू कश्मीर और असम में बहुत हिंसा हो रही थी। पंजाब के बारे में 25 मार्च को गृह मंत्रालय ने खुफिया रिपोर्ट्स के आधार पर राय दी थी कि वहां चुनाव कराने लायक माहौल नहीं है। लेकिन, प्रधानमंत्री वहां चुनाव करवाना चाहते थे। 1 अप्रैल को अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा कि पंजाब और असम में चुनाव कराना ठीक नहीं होगा। सीपीएम-सीपीआई की भी यही राय थी। स्थिति यह थी कि पंजाब के राज्यपाल ने केंद्र से अर्धसैनिक बलों की 400 अतिरिक्त कंपनियां मांगी। 300 कंपनियां वहां पहले से मौजूद थीं। इस तरह करीब 35 प्रतिशत अर्धसैनिक बल अकेले पंजाब में तैनात हो जाते।

इन सब के बावजूद 11 अप्रैल को गृह सचिव की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त को चिट्ठी आ गई, जिसमें लिखा था कि पंजाब में लोक सभा चुनाव के साथ ही विधान सभा चुनाव कराए जा सकते हैं। बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त शेषन ने अपनी ओर से कहा कि पंजाब में चुनाव नहीं करवाए जाएं, लेकिन सरकार ऐसा नहीं चाहती थी। अंततः अधिसूचना जारी हो गई। इसके मुताबिक पंजाब व असम में लोक सभा के साथ विधान सभा चुनाव भी होने थे।

जिस दिन अधिसूचना जारी हुई, उसी दिन पंजाब के राज्यपाल की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त को एक नोट भेजा गया। इसमें सुरक्षाकर्मियों की उपलब्धता की समस्या बता कर विधान सभा चुनाव की तारीख कम से कम तीन-चार हफ्ते आगे (15 या 20 जून) बढ़ाने का अनुरोध था। शेषन ने चुनाव रीशेड्यूल करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया और 22 जून की तारीख तय कर दी।

राजीव गांधी की हत्या और पंजाब में अनेक कत्ल के बावजूद सरकार कराना चाहती थी चुनाव

इस बीच स्थिति बहुत खराब हो गई। पहले चरण के मतदान के अगले ही दिन, 21 मई को रात में राजीव गांधी की हत्या हो गई थी। इसके बाद 23 और 26 मई को होने वाला मतदान रोक दिया गया। उधर पंजाब में भी कई उम्मीदवारों की हत्या हो चुकी थी और हो ही रही थी। शेषन ने गृह मंत्रालय को स्थिति की जानकारी दी और केंद्र सरकार व पंजाब के राज्यपाल से राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा करने के लिए कहा। साथ ही चुनाव टालने का भी अनुरोध किया। सरकार 22 जून को चुनाव कराने पर अड़ी थी। इस बीच पंजाब के राज्यपाल शेषन से मिलने आए। उन्होंने भी यही संदेश दिया कि 22 जून को भी चुनाव टालना ही अच्छा रहेगा। लेकिन, जब वह प्रधानमंत्री से मिल कर लौटे तो उनके विचार बदल चुके थे। लेकिन, शेषन ने अपने स्तर पर हालात की समीक्षा की और सभी स्थितियों के मद्देनजर चुनाव तीन महीने के लिए टाल दिया। नई तारीख 25 सितंबर तय हुई।

चुनाव टालने के लिए शेषन ने पहली बार इस्तेमाल किया सीईसी को संविधान में मिला अधिकार

टीएन शेषन ने आत्मकथा 'थ्रू द ब्रोकेन ग्लास' में लिखा है कि चुनाव आयोग के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था कि चुनाव आयुक्त ने जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 30 और 153 का इस्तेमाल कर चुनाव को टाला हो। लेकिन, यह निर्णय शेषन को बड़ा भारी पड़ा। आगे चल कर उनके ऊपर महाभियोग चलाए जाने के लिए इसी फैसले को सबसे बड़ा आधार बनाया गया। उन पर आरोप लगा कि कांग्रेस को फायदा पहुंचाने के लिए चुनाव टाला गया है।

जब चुनाव की तारीख नजदीक आई तो एक बार फिर चुनाव टालने की मांग आई। इस बार सरकार की तरफ से ही आई। 21 अगस्त को पहले पंजाब के राज्यपाल ने यह मांग की। फिर सितंबर की शुरुआत में प्रधानमंत्री ने भी इसके संकेत दे दिए। 18 सितंबर को संसद ने पंजाब में राष्ट्रपति शासन छह महीने और बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। अंततः फरवरी 1992 में चुनाव कराए गए।

कांग्रेस थी नरम, बाकी सभी पार्टियां हुईं गरम

इस बार भले ही चुनाव सरकार ने टाला था, लेकिन विपक्षी पार्टियां सीईसी की पीछे हाथ धो कर पड़ गए। कांग्रेस का रुख थोड़ा नरम था, लेकिन बीजेपी सहित बाकी पार्टियां बड़ी आक्रामक हो गई थीं। विपक्षी पार्टियां इस चुनाव से पहले शेषन ने जब चुनाव टाला था तो नरसिम्हा राव ने उनसे कहा था- आपने पंजाब को बचा लिया। लेकिन, इसे लेकर बाकी दलों की प्रतिक्रिया बड़ी तल्ख थी।

बीजेपी ने चुनाव आयोग पर 'एक राजनीतिक दल' की कठपुतली के तौर पर काम करने का आरोप लगाया। पंजाब बीजेपी ने चुनाव टालने के फैसले को 'लोकतंत्र की हत्या' करार दिया। बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने राष्ट्रपति से मिल कर शेषन को बर्खास्त करने की मांग की। जनता दल के प्रवक्ता जयपाल रेड्डी ने कहा था, 'उन पर महाभियोग चलाने के लिए हमें सत्ता में आने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस और कानून मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी को छोड़ कर मुख्य चुनाव आयुक्त के रवैये से कोई खुश नहीं है।'

15 जून को जनता दल का एक प्रतिनिधिमंडल अपनी शिकायत लेकर राष्ट्रपति से भी मिला। तमाम पार्टियां शेषन पर वैसे ही हमलावर थीं, जैसे आज ज्ञानेश कुमार पर हैं। वे शेषन के खिलाफ महाभियोग लाना चाहती थीं, लेकिन इसके लिए जरूरी बहुमत नहीं था। प्रधानमंत्री भी दबाव में आ गए थे। उन्होंने शेषन को अमेरिका या सोवियत संघ में राजदूत बनने की पेशकश कर दी, लेकिन शेषन ने इसे ठुकरा दिया और अपना कार्यकाल पूरा कर ही चुनाव आयोग से निकले।

1950 से अब तक मुख्य चुनाव आयुक्त कब, कौन, कितने समय रहे- पूरी सूची

क्र.मुख्य चुनाव आयुक्त का नामकार्यकाल का आरंभकार्यकाल का अंत
1सुकुमार सेन21 मार्च 195019 दिसंबर 1958
2के. वी. के. सुंदरम20 दिसंबर 195830 सितंबर 1967
3एस. पी. सेन वर्मा01 अक्टूबर 196730 सितंबर 1972
4डॉ. नागेंद्र सिंह01 अक्टूबर 197206 फरवरी 1973
5टी. स्वामीनाथन07 फरवरी 197317 जून 1977
6एस. एल. शकधर18 जून 197717 जून 1982
7आर. के. त्रिवेदी18 जून 198231 दिसंबर 1985
8आर. वी. एस. पेरी शास्त्री01 जनवरी 198625 नवंबर 1990
9श्रीमती वी. एस. रमादेवी (प्रथम महिला CEC)26 नवंबर 199011 दिसंबर 1990
10टी. एन. शेषन12 दिसंबर 199011 दिसंबर 1996
11डॉ. एम. एस. गिल12 दिसंबर 199613 जून 2001
12जे. एम. लिंगदोह14 जून 200107 फरवरी 2004
13टी. एस. कृष्णमूर्ति08 फरवरी 200415 मई 2005
14बी. बी. टंडन16 मई 200529 जून 2006
15एन. गोपालस्वामी30 जून 200620 अप्रैल 2009
16नवीन चावला21 अप्रैल 200929 जुलाई 2010
17डॉ. एस. वाई. कुरैशी30 जुलाई 201010 जून 2012
18वी. एस. संपत11 जून 201215 जनवरी 2015
19एच. एस. ब्रह्मा16 जनवरी 201518 अप्रैल 2015
20डॉ. नसीम जैदी19 अप्रैल 201505 जुलाई 2017
21अचल कुमार जोती06 जुलाई 201722 जनवरी 2018
22ओ. पी. रावत23 जनवरी 201801 दिसंबर 2018
23सुनील अरोड़ा02 दिसंबर 201812 अप्रैल 2021
24सुशील चंद्रा13 अप्रैल 202114 मई 2022
25राजीव कुमार15 मई 202218 फरवरी 2025
26ज्ञानेश कुमार19 फरवरी 2025वर्तमान (कार्यरत)