
CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की विपक्ष कर रहा मांग (Photo-AI)
इंडियन एक्सप्रेस की इनवेस्टिगेटिव रिपोर्ट में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision यानी SIR) को लेकर बड़ा खुलासा होने के बाद राजनीतिक हंगामा शुरू हो गया। दरअसल, रिपोर्ट में बताया गया कि निर्वाचन आयोग (EC) के दो सदस्यों ने बीते कुछ महीनों के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से असहमति जताई है। रिपोर्ट में SIR को लेकर खुलासा होने के बाद विपक्ष ने मोदी सरकार पर निशाना साधा और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। वहीं CEC के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी नेताओं द्वारा सड़क पर भी आंदोलन किया जा रहा है।
लेकिन इस पूरे विवाद में एक सवाल उठ रहा है- क्या सुप्रीम कोर्ट सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटा सकता है? इसका उत्तर है- नहीं। बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया संसद के जरिए पूरी होती है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह CEC को हटाने के लिए भी संविधान में विशेष प्रक्रिया निर्धारित है।
इसका अर्थ है कि सुप्रीम कोर्ट सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश देने वाली सामान्य अपीलीय संस्था की भूमिका में नहीं है। अदालत अपने अधिकार क्षेत्र में चुनाव आयोग के फैसलों और सरकारी कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा कर सकती है, लेकिन CEC को पद से हटाने के लिए संविधान में निर्धारित संसदीय प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
राज्य सभा के 63 सांसदों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया।
राज्य सभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सीईसी के हटाने के प्रस्ताव के नोटिस को खारिज कर दिया। इसलिए उस प्रयास से आगे की जांच और संसदीय मतदान की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई।
CEC ज्ञानेश कुमार के एकतरफा फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कोर्ट ने केंद्र और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया। तत्काल निलंबन की मांग स्वीकार नहीं की गई।
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के आह्वान पर विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकाला। इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, नेहा बोरा समेत विपक्ष के कई नेता मौजूद थे। विपक्षी नेताओं ने एक संयुक्त याचिका भी दायर की।
सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने संयुक्त याचिका में 14 कमियां बताईं। इनमें कुछ दस्तावेजों की कमी, पहचान पत्र की अस्पष्ट प्रति और कोर्ट फीस में 220 रुपये की कमी शामिल थी। इन आपत्तियों के दूर होने तक याचिका सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई।
देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की निर्वाचन आयोग को जिम्मेदारी सौंपी गई है। बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों से जुड़े प्रावधान हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। इसके लिए तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश ली जाती है। इस समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। इसके अलावा इसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री होते हैं।
कानून के मुताबिक, चयनित व्यक्ति को भारत सरकार में सचिव स्तर के पद पर काम करने का अनुभव होना चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल छह साल या 65 वर्ष की आयु तक होता है। इनमें से जो भी अवधि पहले पूरी होती है, उसी के आधार पर कार्यकाल समाप्त होता है।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 124(4) के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए दो आधार निर्धारित हैं…
1- सिद्ध कदाचार (Proved Misbehaviour): जब जांच में गंभीर गलत आचरण साबित हो।
2- अक्षमता (Incapacity): जब संबंधित पदाधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो।
इसके अलावा संविधान में अन्य चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय आयुक्तों के लिए अलग व्यवस्था है। उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटाया जा सकता।
मुख्य चुनाव आयुक्त हटाने के लिए संसद के किसी सदन में प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है। इसके लिए न्यूनतम समर्थन की शर्त निर्धारित है। यदि नोटिस लोकसभा में दिया जाता है तो कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक है। वहीं राज्य सभा में दिया जाता है तो कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक है।
इसके साथ ही नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कदाचार या अक्षमता से जुड़े आरोप स्पष्ट रूप से दर्ज होने चाहिए।
नोटिस मिलने के बाद लोकसभा अध्यक्ष या राज्य सभा के सभापति यह तय करते हैं कि प्रस्ताव स्वीकार किया जाए या नहीं। वे प्रस्ताव को स्वीकार कर सकते हैं या निर्धारित प्रक्रिया के तहत अस्वीकार कर सकते हैं।
यदि प्रस्ताव को स्वीकार किया जाता है, तो सीईसी के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए एक समिति का गठन किया जाता है। यह समिति आरोपों, उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों की जांच करती है।
समिति द्वारा जांच करने के बाद प्रस्ताव को संसद के संबंधित सदन में आवश्यक बहुमत से पारित कराना होता है। इइसके लिए दो शर्तें पूरी होनी चाहिए…
1- सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत प्रस्ताव के समर्थन में हो।
2- सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई सदस्य प्रस्ताव के पक्ष में वोट दें।
ये दोनों शर्तें लोकसभा और राज्य सभा में अलग-अलग पूरी करनी होती हैं। केवल एक सदन में प्रस्ताव पारित होना पर्याप्त नहीं है।
यदि संसद के दोनों सदन निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव पारित कर देते हैं, तो राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आदेश जारी करते हैं।
Updated on:
14 Oct 2026 07:53 pm
Published on:
14 Oct 2026 07:53 pm
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