आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि ईरान युद्ध से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा है। तेल बाजार में उथल-पुथल, महंगाई में बढ़ोतरी और गरीब देशों में खाद्य संकट का खतरा बढ़ गया है। संघर्ष लंबा खिंचा तो आर्थिक हालात और बिगड़ सकते हैं।
Iran Israel America War: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव को लेकर अब वैश्विक संस्थाएं भी खुलकर चिंता जताने लगी हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने सोमवार को साफ कहा कि ईरान से जुड़े युद्ध ने न सिर्फ इलाके के देशों को हिलाकर रख दिया है, बल्कि दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर दिखने लगा है। IMF के शीर्ष अर्थशास्त्रियों ने एक ब्लॉग में लिखा कि 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा शुरू किए गए हमलों के बाद जो हालात बने हैं, वे किसी एक देश तक सीमित नहीं हैं। इसका असर अलग-अलग देशों पर अलग तरीके से पड़ रहा है। कहीं महंगाई बढ़ रही है, तो कहीं विकास की रफ्तार धीमी पड़ रही है। कुल मिलाकर माहौल अनिश्चितता से भरा हुआ है।
IMF का कहना है कि अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि यह संघर्ष कितने समय तक चलता है और क्या यह और ज्यादा देशों तक फैलता है। अगर बुनियादी ढांचे या सप्लाई चेन को ज्यादा नुकसान हुआ, तो इसका असर और गंभीर हो सकता है। संस्था ने देशों को सलाह दी है कि वे जल्दबाजी में फैसले न लें। आर्थिक नीतियां सोच-समझकर बनाई जाएं, ताकि इस झटके से उबरना आसान हो सके। साथ ही, जहां जरूरत होगी वहां आईएमएफ मदद के लिए तैयार है।
इस पूरे संकट का सबसे बड़ा असर ऊर्जा क्षेत्र पर दिख रहा है। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक, ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने और क्षेत्र में हुए नुकसान की वजह से तेल बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई है। दरअसल, दुनिया के कुल तेल का करीब 25 से 30 प्रतिशत इसी रास्ते से गुजरता है। इसके अलावा, करीब 20 प्रतिशत LNG (द्रवीकृत प्राकृतिक गैस) भी यहीं से भेजी जाती है। ऐसे में इस रास्ते का बंद होना पूरी दुनिया के लिए चिंता की बात है। इसी बीच, जी-7 देशों के वित्त मंत्रियों ने भी स्थिति को गंभीर मानते हुए ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए हर जरूरी कदम उठाने की बात कही है।
आईएमएफ की रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक हिस्सा गरीब देशों को लेकर है। खाद्य पदार्थों और उर्वरकों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में कम आय वाले देशों में खाद्य संकट गहरा सकता है। समस्या यह भी है कि कई विकसित देश अपनी अंतरराष्ट्रीय सहायता कम कर रहे हैं। ऐसे में कमजोर अर्थव्यवस्थाओं को बाहरी मदद की जरूरत और बढ़ सकती है।