भारत के पास कच्चे तेल के बड़े भंडार नहीं हैं, लेकिन उसके पास ऊर्जा का एक ऐसा खजाना है, जिसे अभी तक ठीक से इस्तेमाल ही नहीं किया गया।
Middle East Tension: मिडिल ईस्ट में तनाव जब भी बढ़ता है, तेल और गैस को लेकर इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। इसकी वजह भी साफ है, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए काफी हद तक दूसरे देशों पर निर्भर है। देश के पास कच्चे तेल के बड़े भंडार नहीं हैं और अच्छे क्वालिटी वाले घरेलू यूरेनियम के भंडार भी बहुत सीमित हैं। इसलिए तेल-गैस और न्यूक्लियर फ्यूल के लिए भारत को भारी मात्रा में आयात करना पड़ता है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि भारत के पास ऊर्जा का एक ऐसा खजाना है, जिसे अभी तक ठीक से इस्तेमाल ही नहीं किया गया है, उसका नाम है थोरियम।
भारत में दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक मौजूद है, जो सैकड़ों साल तक साफ और स्थायी परमाणु ऊर्जा दे सकता है। अगर भारत थोरियम आधारित न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी को पूरी तरह विकसित कर ले, तो वह ऊर्जा के मामले में काफी हद तक आत्मनिर्भर बन सकता है। थोरियम भारत के लिए ऐसा ही एक दीर्घकालिक समाधान हो सकता है, जो अगले करीब 250 साल तक स्वच्छ और स्थिर ऊर्जा दे सकता है।
अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण भारत के न्यूक्लियर एनर्जी प्रोग्राम को फिर से चर्चा में ला दिया है। फ्यूल की कमी, लंबी अवधि की ऊर्जा सुरक्षा और थोरियम को लेकर फैसलों में देरी ने इस बहस को और तेज कर दिया है। इस बीच
एटॉमिक एनर्जी कमीशन (AEC) के मेंबर और न्यूक्लियर साइंटिस्ट डॉ. अनिल काकोडकर ने चेतावनी दी है कि थोरियम प्रोग्राम को छोड़ना (Abandoning The Thorium Programme) देश के भविष्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
भारत की असली चुनौती यूरेनियम की कमी से शुरू होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया में यूरेनियम का उत्पादन बढ़ेगा, लेकिन कुछ समय तक इसकी सप्लाई कम पड़ सकती है। ऐसे में अगर भारत ने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो बढ़ती मांग के साथ उसे परमाणु ईंधन की कमी का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए भारत लंबे समय से क्लोज्ड फ्यूल साइकिल यानी इस्तेमाल हुए परमाणु ईंधन को दोबारा प्रोसेस करके उपयोग करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
न्यूक्लियर साइंटिस्ट का साफ कहना है कि अगर भारत ने थोरियम को छोड़ दिया, तो उसका न्यूक्लियर भविष्य कमजोर पड़ सकता है। थोरियम ऐसा फ्यूल है जो न्यूक्लियर मटेरियल के गलत इस्तेमाल के खतरे को भी कम करता है और लंबे समय की ऊर्जा सुरक्षा भी देता है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसके पास दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इस संसाधन का सही इस्तेमाल किया जाए, तो भारत आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में उसी तरह मजबूत बन सकता है, जैसे आज तेल उत्पादन वाले देश हैं।
थोरियम भारत की तकनीकी क्षमता के लिए भी अनुकूल है, क्योंकि यह हेवी वॉटर रिएक्टरों में अच्छी तरह काम करता है, और इस तकनीक में भारत पहले से ही अग्रणी है। हालांकि थोरियम प्रोग्राम में तकनीकी चुनौतियां हैं, लेकिन डॉ. काकोडकर का मानना है कि इन्हें हल किया जा सकता है और भारत को इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ना चाहिए।