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Indira Gandhi Death Anniversary: कैसे पुत्रमोह में इंदिरा गांधी ने लिए ये फैसले, वफादार मंत्री लगे किनारे! प्रणब मुखर्जी का बढ़ा कद

1975 Emergency in India: 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान संजय गांधी की बढ़ती राजनीतिक ताकत, वरिष्ठ नेताओं से उनके टकराव और कांग्रेस में उनके प्रभाव की अनसुनी कहानियां। जानिए कैसे उनके फैसलों ने देश की राजनीति को प्रभावित किया।
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Updated: 31 Oct 2026, 3:41 PM IST
Indira Gandhi and Sanjay Gandhi
इंदिरा गांधी और संजय गांधी (Photo-AI)

Emergency in India 1975: जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने का फैसला लिया, तब उनके अपने सहयोगियों को भी इसकी भनक नहीं थी। इंदिरा ने 25 जून 1975 को संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल का ऐलान किया। उसी रात अपने सहयोगी आर. के. धवन को राष्ट्रपति भवन भेजा। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने रात 11:45 बजे आपातकाल के आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए। अगली सुबह कैबिनेट की मंजूरी ली गई, जबकि इतना बड़ा फैसला लेने से पहले इंदिरा गांधी को कैबिनेट को पहले ही विश्वास में लेना चाहिए था। 26 जून 1975 को सुबह 5-6 बजे इंदिरा ने कैबिनेट सहयोगियों, कैबिनेट सचिव बी. डी. पांडे और प्रधान सचिव पी. एन. धर को आपातकाल के बारे में बताया। 25-26 जून की रात को इंदिरा गांधी के आदेश पर देश के ज्यादातर प्रमुख विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

इनमें जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, एल. के. आडवाणी, चंद्रशेखर और कई अन्य नेता शामिल थे। इनमें से कई नेताओं ने 25 जून की शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में एक रैली को संबोधित किया था। इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग करते हुए, जेपी ने मशहूर हिंदी कवि रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियों को दोहराते हुए कहा था - 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।'

सीनियर का कद घटाया, जूनियर को किया प्रमोट

ऐसा कहा जाता है कि इंदिरा गांधी का आपातकाल का फैसला बेटे संजय गांधी के विचारों से प्रेरित था। उन दिनों इंदिरा, संजय गांधी की लगभग हर बात मानती थीं। ये भी एक वजह थी कि संजय खुद को सबसे ऊपर समझने लगे थे। वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने अपनी किताब How Prime Ministers Decide में लिखा है कि आपातकाल के दौरान, इंदिरा गांधी की ओर से सारा कामकाज संजय गांधी ही संभालते थे और उनका व्यवहार काफी रूखा था। संजय को जब गुस्सा आता था, तो उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता था कि सामने कौन है। अधिकांश कांग्रेसी नेता संजय गांधी से मिले अपमान पर खामोश रह जाते थे, लेकिन कुछ ऐसे नहीं थे। संजय ने यूथ कांग्रेस के कुछ सदस्यों को अपने 'शॉक ट्रूप्स' (हमलावर दस्ते) की तरह इस्तेमाल किया।

उनकी मुख्य टीम में कमल नाथ, जगमोहन, वी. सी. शुक्ला, बंसी लाल, ओम मेहता, जगदीश टाइटलर और नवीन चावला शामिल थे। बाद में अहमद अकबर 'डंपी' भी उनके साथ जुड़ गए। संजय की मनमानी से वरिष्ठ नेता भी नहीं बच पाए। उन्होंने वित्त मंत्री सी.सुब्रमण्यम का कद घटा दिया, जो 1969 में पार्टी के बंटवारे के समय इंदिरा गांधी के साथ डटे रहे थे। उन्होंने सुब्रमण्यम के जूनियर प्रणब मुखर्जी को आगे बढ़ाया। ये शायद उस समय आपातकाल का समर्थन करने का उनका इनाम था।

इंदिरा ने गुजराल का नहीं, बेटे का दिया साथ 

इंदिरा गांधी के लंबे समय तक वफादार रहे आई. के. गुजराल के साथ संजय का बर्ताव पार्टी के अन्य नेताओं के लिए एक संदेश था– आदेश मानो, वरना कार्रवाई झेलो। अदालत के एक फैसले के बाद संजय ने सूचना और प्रसारण मंत्री रहे गुजराल को बुलाया। उन्होंने रूखेपन से गुजराल से कहा - ऑल इंडिया रेडियो इंदिरा गांधी को पर्याप्त रूप से नहीं दिखा रहा है। आप ऑल इंडिया रेडियो को ठीक से नहीं संभाल रहे हैं। ऑल इंडिया रेडियो के सभी न्यूज़ बुलेटिन पहले मेरे पास भेजे जाने चाहिए। गुजराल को संजय का यह अंदाज पसंद नहीं आया। उन्होंने पलटकर जवाब दिया- मैं इन्हें आपको नहीं भेज सकता, केवल आपकी मां को भेजूंगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आप मेरे बेटे की उम्र के हैं। अगर आप मुझसे बात करना चाहते हैं, तो आपको सम्मान के साथ बात करनी होगी।

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली रही इंदिरा गांधी की प्रतिक्रिया। उन्होंने अपने बेटे को सम्मान का पाठ पढ़ाने के बजाए, आई. के. गुजराल को ही सुना दिया। इंदिरा ने गुजराल से कहा, सूचना और प्रसारण मंत्रालय अब आपके बस की बात नहीं है। प्रेस को सख्ती से संभालने की ज़रूरत है। मतलब साफ था कि अब गुजराल को जाना होगा और ऐसा बाकायदा हुआ। जिस दिन इमरजेंसी लागू हुई, उसी दिन गुजराल को सूचना एवं प्रसारण मंत्री के पद से हटा दिया गया। उनकी जगह वी. सी. शुक्ला को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। गुजराल को डिमोट करते हुए एक कम अहमियत वाले मंत्रालय भेज दिया गया और बाद में उन्हें मॉस्को में राजदूत नियुक्त किया गया।

बहुगुणा ने नहीं माना संजय का आदेश

किताब में संजय गांधी से जुड़े एक और दिलचस्प किस्से का जिक्र है। नीरज चौधरी ने लिखा है – कांग्रेस नेता के. डी. मालवीय संजय गांधी का एक मैसेज लेकर लखनऊ गए। मालवीय को सब 'भाईजी' कहकर बुलाते थे। उन्हें पार्टी लीडर एच.एन.बहुगुणा से बात करने के लिए भेजा गया था। बहुगुणा का यूपी कांग्रेस पर अच्छा-खासा दबदबा था। भाईजी ने बहुगुणा से कहा- संजय आपको ऑस्ट्रेलिया में राजदूत बनाकर भेजना चाहते हैं। यह सुनकर बहुगुणा भड़क गए। उन्होंने तुरंत जवाब दिया- जब मैंने कुमाऊं में अपना गांव छोड़ा था, तो मैं राजनीति करने आया था, किसी की नौकरी करने नहीं। अगले दिन संजय ने उनके पास एक और दूत भेजा, जो एक होटल का मालिक था। गुस्से में भरे बहुगुणा का जवाब वही था- उनसे कह देना कि मैं कोई गुजराल नहीं हूं। इसके बाद, बहुगुणा को पार्टी में हाशिए पर धकेल दिया गया।

मीटिंग में खड़ा रखा, कार से ही उतार दिया

संजय गांधी शॉर्ट टेम्पर वाले नेता थे। उनके गुस्से से सभी को डर लगता था। बिहार के कांग्रेसी नेता थे तारिक अनवर। एक बार संजय ने उन्हें दिल्ली तलब किया और उन्हें पहुंचते ही पूछा कि यूथ कांग्रेस चला सकोगे? उन्होंने तारीक से कहा कि मैं तुम्हें बिहार यूथ कांग्रेस का राज्य सचिव बनाना चाहता हूं। दोनों की मीटिंग करीब 2 मिनट चली लेकिन संजय ने उन्हें बैठने तक के लिए नहीं कहा। इसके बाद तारीक एक नई जिम्मेदारी के साथ बिहार लौट गए। संजय गांधी और उनके वफादार नेता वीर बहादुर शाह का किस्सा तो काफी चर्चा में रहा था।

वीर बहादुर को बाद में संजय से वफादारी के इनाम स्वरूप उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री भी बनाया गया। एक बार संजय और वीर बहादुर कार से कहीं जा रहे थे। उनकी कार यूपी के बाहरी इलाके में थी और ड्राइविंग सीट पर खुद संजय थे। संजय रास्ता भटक गए, काफी देर तक यहां-वहाँ घूमने के बाद जब उन्हें कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने गाड़ी रोकी और वीर बहादुर से पूछा - हम कहां हैं? वीर बहादुर खुद नहीं जानते थे कि वे कहां हैं। उन्होंने कहा – समझ नहीं आ रहा। यह सुनते ही संजय इतना नाराज हो गए कि वीर बहादुर से कार से उतार दिया और वहां से चले गए। उस सुनसान इलाके में वीर बहादुर को उतारने से पहले संजय ने एक बार भी नहीं सोचा कि उनके साथ कोई अनहोनी भी हो सकती है।

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31 Oct 2026, 3:41 PM IST
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