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पानी की वजह से लोग मरें, यह तो गलत है- इंदौर में मौतों पर बोला हाई कोर्ट

Bhagirathpura Indore Water Tragedy: इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी की सप्लाई के चलते सैकड़ों लोगों के बीमार और 8-10 की मौत होने के बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने टिप्पणी की है।

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Jan 02, 2026
इंदौर में मल-मूत्र मिला पानी पीने से कई परिवारों को अपनों की मौत का सदमा झेलना पड़ रहा है। (Photo-IANS)

मध्य प्रदेश का चमकता-दमकता शहर इंदौर। सात बार ‘देश का सबसे साफ शहर’ के सरकारी तमगे से चमकता शहर। उसी शहर पर ‘मल वाला जल’ पीकर कम से कम आठ लोगों के मरने का दाग लगा है। वह भी तब जब लोगों को साफ पानी पिलाने के लिए ‘अमृत’ योजना चल रही है। शहर को साफ दिखा कर सर्टिफिकेट लेने की होड़ में योजना और सिस्टम के अंदर की गंदगी पर किसी का ध्यान ही नहीं गया। लोगों के ध्यान दिलाने के बावजूद नहीं!

सैकड़ों लोगों की बीमार होने और कम से कम आठ मौतों के बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने टिप्पणी की है और प्रशासन से तुरंत पानी के टैंकर की व्यवस्था करने के लिए कहा है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जज ने कहा- पानी के चलते लोगों की मौत हो, यह सही नहीं है। इंदौर की खूबसूरती को बर्बाद मत होने दीजिए।

लगातार बढ़ रहा पानी में 'जहर'

कोर्ट ने गंदे पानी से मौतों को भले ही अब गलत बताया हो, लेकिन सच है कि जहरीला पानी हम लगातार पीते आ रहे हैं। 2024 की ग्राउंड वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट और जल शक्ति मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक देश में भूमिगत जल के करीब 20 प्रतिशत नमूनों में हानिकारक तत्वों की मात्रा तय सीमा से ज्यादा पाई गई।

मध्य प्रदेश में 22.58 फीसदी सैंपल्स में नाइट्रेट की मात्रा तय सीमा (45 मिलीग्राम प्रति लीटर) से ज्यादा पाई गई थी। राज्य के 40 जिलों के अनेक इलाकों में फ्लोराइड की मात्रा भी ज्यादा (1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर) पाई गई। यूरेनियम का भी यही हाल रहा।

ऐसा नहीं है कि यह समस्या हाल की है। दस साल पीछे चलें, तब भी यही हाल था। 2015 के आंकड़ों के मुताबिक मध्य प्रदेश के 23 जिलों में पानी में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा पाई गई थी। अब संख्या 40 तक पहुंच गई है। पानी में अधिक नाइट्रेट होने की बात करें तो 2015 में मुख्य रूप से मालवा में यह समस्या थी। वहां भी इसे मौसमी समस्या माना जाता था। लेकिन, आज राज्य में भूमिगत जल के करीब एक-चौथाई नमूनों में सालों भर यह समस्या रहती है।

सरकार सीरियस नहीं

इन दस सालों में समस्या का स्वरूप भी भयानक रूप से बदला है। पहले जहां कुछ हद तक समस्या कुदरती थी, वहीं अब यह मानव निर्मित हो गई है। पानी में नाइट्रेट की समस्या को बढ़ाने में खाद का ज्यादा इस्तेमाल और गंदा पानी निकासी की कमजोर व्यवस्था की प्रमुख भूमिका रही है। जिस स्तर पर समस्या बढ़ रही है, क्या उस स्तर पर समाधान के लिए सरकार तत्पर है? नहीं।

ऐसी समस्याओं को लेकर सरकार की संवेदनहीनता का नमूना इंदौर के ताजा मामले में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की प्रतिक्रिया में देखा जा सकता है। नाले की गंदगी मिला पानी पीने से लोगों के बीमार होने और मर जाने पर जब एक पत्रकार ने विजयवर्गीय से सवाल पूछा तो उन्होंने ‘फोकट का सवाल’ और ‘घंटा’ जैसे शब्दों के साथ इसका जवाब दिया।

आंकड़े देख कर भी ऐसा ही लगता है कि सरकारें सच में साफ पानी के मुद्दे को ‘फोकट का मुद्दा’ ही मानती रही हैं। लेकिन, क्या लोगों की मौत भी ‘फोकट का सवाल’ होगा! तभी तो लोगों की शिकायतों पर भी ध्यान नहीं दिया गया। कई मौतें हो जाने के बाद अब कुछ अफसरों पर कार्रवाई हुई है।

पाइपलाइन पर बना दिया शौचालय

इंदौर के भागीरथपुरा की समस्या भी अचानक नहीं आ गई है। कहते हैं, पाइपलाइन के ऊपर किसी ने बिना सेप्टिक टैंक के शौचालय बना लिया था। सबसे साफ शहर में भी लोग ऐसी गंदी हरकत कर बैठे और सब सोए रहे। 26 दिसंबर से गंदा पानी पीकर 1400 से ज्यादा लोग बीमार हो गए हैं। चार मौतों की बात प्रशासन भी मान रहा है। गैर आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 8-10 बताई जा रही है।

शिकायत के बाद भी नहीं जागा प्रशासन

इस मामले में खतरे की पहली घंटी 15 अक्टूबर को ही बजा दी गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि इंदौर मेयर की हेल्पलाइन पर 15 अक्टूबर को ही भागीरथपुरा में गंदे पानी की सप्लाई की पहली शिकायत कराई गई थी। करीब एक महीने बाद फिर किसी ने शिकायत की और कहा कि पानी में गंदगी के साथ तेजाब भी है। 18 दिसंबर को फिर पानी से बदबू आने की शिकायत दर्ज कराई गई। दस दिन बाद बताया गया कि वार्ड नंबर 11 (जिसमें भागीरथपुरा आता है) के 90 प्रतिशत लोग बीमार पड़ गए। 29 दिसंबर को जब मौत की खबर आने लगी तब प्रशासन की नींद खुली।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 2025 में देश के 'सबसे स्वच्छ' शहर इंदौर में खराब पानी को लेकर 226 शिकायतें आईं। जो 16 शिकायतें जोन 4 (भागीरथपुरा इसी जोन में आता है) के असिस्टेंट इंजीनियर को सौंपी गईं, उनमें से सिर्फ पांच का हल निकाला गया। भागीरथपुरा इलाके में नर्मदा का पानी सप्लाई करने वाली पाइपलाइन बदलने की भी मांग उठ चुकी है। अब इलाके के कॉरपोरेटर ने सीएम मोहन यादव को चिट्ठी लिख कर बताया है कि इस मसले पर एक साल से अफसर टाल -मटोल कर रहे हैं। अफसर अब यह कह कर जान बचा रहे हैं कि भले ही स्थानीय या राज्य प्रशासन के स्तर पर कुछ काम नहीं किया गया हो, लेकिन केंद्र सरकार की अमृत 2.0 योजना के तहत पाइपलाइन को ठीक करने पर काम हुआ है।

Updated on:
02 Jan 2026 05:46 pm
Published on:
02 Jan 2026 04:41 pm
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