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LPG और पेट्रोल-डीजल की छुट्टी! न्यूक्लियर फ्यूजन पर काम कर रहे भारतीय वैज्ञानिक

ईरान और US-इजरायल युद्ध (Iran and the US-Israel War) की वजह से वैश्विक स्तर पर ईंधन संकट की परिस्थिति उत्पन्न हो गई है। इस गंभीर परिस्थिति के बीच भारत में न्यूक्लियर फ्यूजन (Nuclear Fusion) तकनीकि पर रिसर्च चल रही है।

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Apr 05, 2026
न्यूक्लियर फ्यूजन पर रिसर्च करते वैज्ञानिक (सांकेतिक AI इमेज)

ईरान और US-इजरायल जंग की वजह से वैश्विक स्तर ईंधन संकट (Global Fuel Crisis) के बादल छाए हैं। ऐसी परिस्थिति में भारत में न्यूक्लियर फ्यूजन तकनीकि पर रिसर्च चल रही है। यह रिसर्च सफल होती है तो LPG और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम हो जाएगी। न्यूक्लियर फ्यूजन (Nuclear Fusion) अब सिर्फ वैज्ञानिक कल्पना नहीं, बल्कि भारतीय प्रयोगशालाओं में आकार लेती हकीकत बनता दिख रहा है। जिस प्रक्रिया से सूरज अरबों वर्षों से चमक रहा है, उसी ऊर्जा को धरती पर उतारने की कोशिश जारी है।

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LPG और पेट्रोल-डीजल पर कम होगी निर्भरता

बेंगलूरु स्थित प्रानोस फ्यूजन लैब में न्यूक्लियर फ्यूजन को उपयोग में लाने के लिए रिसर्च चल रही है। न्यूक्लियर फ्यूजन पर चल रही रिसर्च सफल होती है तो LPG और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम हो जाएगी। भारत, फ्रांस में चल रहे वैश्विक फ्यूजन प्रोजेक्ट ITER का भी सहयोगी है।

प्रानोस लैब के इंजीनियर कॉम्पैक्ट और किफायती रिएक्टर डिजाइन पर काम कर रहे हैं। बता दें कि परंपरागत परमाणु ऊर्जा में परमाणुओं को तोड़कर ऊर्जा निकाली जाती है, जिससे खतरनाक रेडियोधर्मी कचरा बनता है। इसके उलट, फ्यूजन में हल्के तत्व जैसे हाइड्रोजन आपस में जुड़ते हैं। इस प्रक्रिया में हानिकारक कचरा नहीं निकलता है।

फ्यूजन रिएक्टरों का दिमाग बनेगा जेंगा

भारत में जेंगा नाम का सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म तैयार किया गया है, जिसे भविष्य के फ्यूजन रिएक्टरों का दिमाग माना जा रहा है। इसी तरह एक डिवाइस प्रज्ञा विकसित किया गया है। यह मध्यम आकार का टोकामैक डिवाइस है, जो शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों से सुपरहीटेड प्लाज्मा को नियंत्रित करता है। फिलहाल यह डिवाइस अभी जरूरी डेटा जुटा रहा है। न्यूक्लियर फ्यूजन पर रिसर्च सफल होती है तो फ्यूजन ऊर्जा की लागत 6 से 8 रुपए प्रति यूनिट के आसपास रह सकती है। अनुमान है कि 2040 के दशक तक यह सबसे सस्ते ऊर्जा स्रोतों में शामिल हो सकती है।

क्या है न्यूक्लियर फ्यूजन?

न्यूक्लियर फ्यूजन को नाभिकीय संलयन कहते हैं। इस प्रक्रिया में हल्के परमाणु, जैसे ड्यूटीरियम और ट्रिटियम, आपस में टकराते और जुड़ते हैं तो एक भारी नाभिक बनता है। यह प्रक्रिया आइंस्टीन के ऊर्जा के नियम सिद्धांत पर होती है। नाभिकीय संलयन, विखंडन की तुलना में बहुत अधिक ऊर्जा पैदा करता है। सूर्य और अन्य तारे इसी प्रक्रिया से लगातार ऊर्जा और प्रकाश उत्सर्जित करते हैं। वैज्ञानिक इसे पृथ्वी पर स्वच्छ, सुरक्षित और असीमित ऊर्जा स्रोत (जैसे कि ITER परियोजना) के रूप में विकसित करने पर काम कर रहे हैं।

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