
DUSU Election NSUI Defeat: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने अपनी राजनीतिक रणनीति को बदल दिया है। वे जेन-जी वोटरों तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे है। इसको लेकर छात्रों की गूंज कार्यक्रम भी आयोजित हो रहे है। जहां पर मोदी सरकार पर निशाना साधा जा रहा है। राहुल के इन कार्यक्रमों में जेन-जी की काफी भीड़ भी नजर आती है। लेकिन धरातल पर इसका अलग की परिणाम नजर आ रहा है। दरअसल, दिल्ली विश्वविद्यालय में कांग्रेस की छात्र संगठन इकाई एनएसयूआई को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा है। संगठन एक भी पद पर जीत हासिल नहीं कर पाया। वहीं दूसरी तरफ ABVP ने तीन पदों पर जीत दर्ज की। दिल्ली विश्वविद्यालय ही नहीं पंजाब यूनिवर्सिटी में भी NSUI को हार का सामना करना पड़ा है। पीयू में ABVP के अंकित बिढ़ान ने जीत दर्ज की है।
डूसी और पंजाब यूनिवर्सिटी में एनएसयूआई को मिली हार को लेकर जेन-जी का दूर होना माना जा सकता है। क्योंकि कांग्रेस ने हाल के महीनों में युवाओं और छात्रों के मुद्दों को लेकर अपनी सक्रियता बढ़ाई है। राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ पहल और रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, हॉस्टल तथा शिक्षा जैसे मुद्दों पर NSUI की सक्रियता के बावजूद DUSU में उसे सफलता नहीं मिली।
Gen-Z आज का एक बड़ा और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण युवा वर्ग है। यह वर्ग सोशल मीडिया पर सक्रिय होने के साथ-साथ रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और भविष्य की आर्थिक संभावनाओं जैसे मुद्दों को लेकर भी मुखर है। ऐसे में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल युवाओं के मुद्दे उठाने की नहीं, बल्कि उन्हें जमीनी संगठन और कैंपस राजनीति से जोड़ने की भी है। दिल्ली विश्वविद्यालय और पंजाब यूनिवर्सिटी के परिणाम फिलहाल इसी चुनौती की ओर इशारा करते हैं।
जहां एक तरफ कांग्रेस सांसद राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम से छात्रों के बीच पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे है। वहीं दूसरी तरफ दिल्ली विश्वविद्यालय में NSUI की हार से राहुल गांधी नाराज है। बताया जा रहा है कि इसको लेकर प्रभारियों पर भी गाज गिर सकती है।
डूसू चुनाव में टिकट वितरण के समय ही NSUI के हार के चर्चे शुरू हो गए थे। उसका मुख्य कारण दीपांशु शोकिन को प्रत्याशी नहीं बनाना था। बताया जा रहा है कि दिल्ली विश्वविद्यालय का चुनाव NSUI आराम से जीत सकती थी। लेकिन संगठन ने टिकट वितरण में गलती कर दी, जिसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा था।
NSUI ने अपने सबसे मजबूत प्रत्याशी दीपांशु शोकिन को टिकट नहीं दिया। इसके बाद शोकिन ने उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि एनएसयूआई दीपांशु शोकिन और विशेष यादव को टिकट देती तो शायद संगठन क्लीन स्वीप कर लेती।