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कश्मीर के वो गहरे जख्म: ऑपरेशन सिंदूर के 1 साल बाद भी अपने मासूमों के लिए तड़प रहा है ये पिता

Poonch Tragedy को एक साल बीत चुका है। पुंछ में अपने मासूम जुड़वां बच्चों को खोने वाले बेबस पिता का दर्द आज भी ताजा है, वे खुद से पूछते हैं कि आखिर वे वहां गए ही क्यों थे।
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May 07, 2026
Poonch tragedy affected family
पुंछ त्रासदी से प्रभावित परिवार । ( फोटो : AI Generated)

Poonchh Tragedy ने एक हंसते-खेलते परिवार को हमेशा के लिए उजाड़ दिया। ऑपरेशन सिंदूर को अब एक साल का लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन जिन लोगों ने इस खौफनाक मंजर में अपनों को खोया, उनके लिए समय जैसे वहीं ठहर गया है। यह कहानी एक ऐसे बेबस पिता की है, जिसने पुंछ में अपने जुड़वां बच्चों को खो दिया। आज भी वह पिता हर रोज खुद से यही सवाल पूछता है, 'आखिर हम पुंछ क्यों गए थे?' यह रमीज खान और उनकी पत्नी उरुसा की दर्दनाक दास्तान है। ध्यान रहे कि पिछले साल मई में पुंछ में सीमा पर हुई गोलाबारी में 14 लोग मारे गए थे।

भयानक वाकये ने एक ऐसे पिता को जिंदगी भर का घाव दे दिया

आज एक साल का लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन जिन परिवारों ने इस दर्दनाक हादसे में अपने करीबियों को खोया, उनके आंसू आज भी नहीं सूखे हैं। 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान हुए इस भयानक वाकये ने एक ऐसे पिता को जिंदगी भर का घाव दे दिया है, जिसने अपने जुड़वां बच्चों को हमेशा के लिए खो दिया। हादसे की पहली बरसी पर जब इस पिता से बात की गई, तो उनका दर्द एक ही वाक्य में सिमट कर रह गया-'मैं अक्सर सोचता हूं कि आखिर हम पुंछ क्यों गए थे?'

पुंछ शिफ्ट होने का वह मनहूस फैसला और पहलगाम का हादसा

कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि यह परिवार मूल रूप से कहीं और का था। बेहतर भविष्य और रोजगार की तलाश में इन्होंने पुंछ जाने का फैसला किया था। पिता को आज भी यही बात सालती है कि अगर उन्होंने पुंछ शिफ्ट होने का वह फैसला न लिया होता, तो शायद हालात कुछ और होते और उनके बच्चे आज जिंदा होते। पुंछ में बसने के बाद ही परिस्थितियों का वह चक्र शुरू हुआ, जिसका खौफनाक अंत उस हादसे के रूप में हुआ। जुड़वां बच्चों की किलकारियां एक ही झटके में खामोश हो गईं।

एक साल बाद भी आंसुओं से भीगी हैं आंखें

आमतौर पर कहा जाता है कि वक्त बड़े से बड़े जख्म भर देता है, लेकिन इस अभागे पिता के लिए समय जैसे उसी दिन ठहर गया है। यह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि बच्चों के बिना घर अब काटने को दौड़ता है। उनके पुराने कपड़े, खिलौने और घर के कोने आज भी उन मासूमों की याद दिलाते हैं। बच्चों की अर्थी उठाने वाले इस पिता का कहना है कि पुंछ जाने का वह एक कदम उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल बन गया, जिसकी सजा वे रोज घुट-घुट कर भुगत रहे हैं।

ऑपरेशन सिंदूर की वो काली परछाई

ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद, सुरक्षा और हालात को लेकर कई बातें हो रही हैं, लेकिन उन परिवारों का क्या जिनके घर उजड़ गए? पुंछ का वह इलाका आज भी उस खौफनाक दिन की गवाही देता है। मासूम जुड़वां बच्चों की मौत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। आज, एक साल बाद भी, वह घटना सिस्टम और सुरक्षा पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। पिता का यह दर्द सिर्फ उनका नहीं, बल्कि उन सभी परिवारों का प्रतिनिधित्व करता है जो किसी न किसी रूप में इस हिंसा का शिकार हुए हैं।

Updated on:
07 May 2026 09:07 am
Published on:
07 May 2026 09:04 am
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