
दिल्ली हाईकोर्ट (सोर्स-IANS)
Delhi High Court: दिल्ली हाई कोर्ट में एक प्रेग्नेंसी से संबंधित गंभीर मामले की सुनवाई हुई, जिसमें एक 29 साल की महिला ने 27 हफ्ते की प्रेग्नेंसी खत्म कराने की मांग रखी थी। मामले की सुनवाई जस्टिस पुरुषेंद्र कौरव की बेंच ने की। महिला ने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को देखते हुए अपनी प्रेग्नेंसी खत्म करने की मांग की थी, जिसे देखते हुए कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड से रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन रिपोर्ट देखने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने डॉक्टरों को कड़ी फटकार लगाई। बेंच ने डॉक्टरों के अपनी जिम्मेदरी ठीक से नहीं निभाने पर सख्त रुख अपनाया।
29 साल की शादीशुदा महिला ने 1 मई को दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। महिला ने कहा था कि उसकी दूसरी प्रेग्नेंसी में गर्भ में पल रहे बच्चे में कई गंभीर दिक्कतें हैं। निजी डॉक्टरों ने भी बताया था कि बच्चे के बचने की उम्मीद बहुत कम है और गर्भ में ही उसकी अचानक मौत हो सकती है। महिला का कहना था कि इस वजह से वह मानसिक और शारीरिक रूप से काफी परेशान है।
4 मई को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि मामले की जांच के लिए मेडिकल बोर्ड बना दिया गया है। इसके बाद कोर्ट ने ABVIMS और RML अस्पताल को महिला की जांच कर साफ-साफ बताने को कहा था कि गर्भपात हो सकता है या नहीं और इससे क्या असर पड़ सकते हैं। कोर्ट चाहता था कि मेडिकल बोर्ड हर पहलू को ध्यान में रखकर साफ रिपोर्ट दे।
बुधवार को मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल की गई, लेकिन उसमें गर्भपात की संभावना पर कोई साफ जवाब नहीं दिया गया। रिपोर्ट में सिर्फ इतना कहा गया कि महिला को प्रेग्नेंसी जारी रखने की सलाह दी जाती है। इस पर जस्टिस कौरव नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड से स्पष्ट राय मांगी थी, लेकिन रिपोर्ट में महिला की परेशानी और भ्रूण की गंभीर स्थिति पर ठीक से विचार ही नहीं किया गया।
सुनवाई के दौरान जस्टिस कौरव ने कहा कि मेडिकल बोर्ड ने MTP Act (Medical Termination of Pregnancy Act) और कोर्ट के आदेशों की अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि डॉक्टरों को साफ बताना चाहिए था कि गर्भपात हो सकता है या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि डॉक्टर अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकते। साथ ही चेतावनी दी गई कि आगे से कोर्ट के आदेशों का पूरी गंभीरता से पालन होना चाहिए। मामले को गंभीर मानते हुए हाई कोर्ट ने AIIMS दिल्ली को महिला की दोबारा जांच करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि AIIMS साफ-साफ बताए कि गर्भपात संभव है या नहीं और इससे क्या खतरे हो सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही साफ कर चुका है कि महिला को अपने शरीर और प्रेग्नेंसी को लेकर फैसला लेने का पूरा अधिकार है।
Updated on:
07 May 2026 08:12 am
Published on:
07 May 2026 08:12 am
