
भारतीय सेना से जुड़ी एक खबर का जिक्र 14 साल बाद फिर आया है। लेखक-पत्रकार जोसी जोसेफ ने हाल में आई अपनी किताब Birth of a Nation: The 21 Days That Made India में इसका जिक्र किया है। खबर भारतीय सेना से जुड़ी है।
जोसेफ ने A Military Coup नाम से लिखे अध्याय में बताया है कि करीब एक दशक पहले उन्हें एक स्टोरी मिली थी। कई सप्ताह छानबीन करने के बाद उन्होंने इससे जुड़ी काफी जानकारी जुटाई थी। जानकारी के मुताबिक उस समय भारतीय सेना के एक जनरल ने सेना की कुछ टुकड़ियों को दिल्ली मार्च के लिए तैयार कर लिया था। उस जनरल के भविष्य के बारे में सरकार और सेना में कुछ बड़ा फैसला होने वाला था।
इस स्टोरी के संबंध में जो भी जानकारी जोसेफ ने जुटाई थी, उन पर बात करने के लिए वह साउथ ब्लॉक में एक बड़े अफसर के दफ्तर गए थे। उन अफसर के पास सुरक्षा से संबंधित बड़ी जिम्मेदारियां थीं। जोसेफ की बात सुन कर कुछ समय के लिए तो वह अफसर सोच में पड़ गए। इसके बाद उन्होंने कहा- अगर आपकी बात सही भी है तो सबूत क्या है? काफी देर चली बातचीत के अंत में उन्होंने यही कहा, 'मुझे उम्मीद है कि आप यह सब रिपोर्ट नहीं करने जा रहे, क्योंकि अगर आप छापेंगे भी तो आप जो कुछ भी लिखेंगे हम आधिकारिक रूप से उसका खंडन कर देंगे।'
इसके बाद जोसेफ ने अपने संपादक से बात की। दोनों इस बात पर सहमत थे कि अभी इस खबर के लिए और सबूत जुटाए जाने जरूरी हैं। लेकिन कुछ ही दिन बाद एक दूसरे अखबार में यह रिपोर्ट छप गई। जोसेफ ने स्पष्ट रूप से न खबर के बारे में कुछ लिखा और न उस अखबार का नाम लिया, जिसमें खबर छपी। उन्होंने इस बात पर अफसोस जरूर जताया कि रक्षा मामलों पर रिपोर्टिंग के करीब दो दशक के कार्यकाल में एक यही सबसे बड़ी स्टोरी रही जो वह छाप नहीं सके।
जोसेफ ने स्टोरी के बारे में जो संकेत दिया है उससे यही लगता है कि वह संभवतः 4 अप्रैल, 2012 को अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' में छपी मुख्य खबर की बात कर रहे हैं। उस समय शेखर गुप्ता इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे और खबर लिखनेवालों में उनका नाम भी छपा था। इस खबर में बताया गया था कि खुफिया एजेंसियों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक उस साल 16 जनवरी की रात हरियाणा के हिसार से सेना की एक अहम टुकड़ी बिना जानकारी और तय कार्यक्रम के दिल्ली की ओर कूच कर गई थी। खुफिया एजेंसियों को पता चला कि आगरा स्थित 50 पारा ब्रिगेड की एक टुकड़ी भी दिल्ली की ओर बढ़ चली थी। 17 जनवरी के तड़के प्रधानमंत्री (मनमोहन सिंह) को इसकी जानकारी दी गई। छानबीन के बाद पता चला कि कुछ भी असामान्य नहीं था।
सेना और सरकार ने इसे 'रूटीन मूवमेंट' बताया था। उस समय जनरल वीके सिंह सेना प्रमुख थे और उनकी उम्र को लेकर विवाद चल रहा था। 16 अक्तूबर को ही वह इस मामले में सुप्रीम कोर्ट गए थे। एक दिन पहले (15 जनवरी) ही सेना दिवस का कार्यक्रम संपन्न हुआ था।
जनरल वीके सिंह ने सेना में बगावत या तख्तापलट जैसी बातों को बकवास बताया था। घटना के 11 साल बाद एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश से बातचीत में भी जनरल सिंह ने कुछ ऐसा ही कहा था।
बता दें कि भारत के कई पड़ोसी देशों में सरकार पर सेना का नियंत्रण और सेना द्वारा तख्तापलट आम बात है, लेकिन भारत के मामले में यह लोगों की कल्पना में भी नहीं आता। जोसेफ ने भी यह बात किताब में लिखी है। साथ ही, उन्होंने एक और घटना का जिक्र किया है, जिसमें सेना द्वारा सत्ता पर नियंत्रण की साजिश रचने की बात कही गई है।
यह घटना आजादी के कुछ दिन पहले की है। इसके मुताबिक लियाकत अली खान ने वायसराय लॉर्ड माउंट बेटन को एक खुफिया जानकारी दी थी। इस जानकारी के मुताबिक उन्होंने बताया कि स्टाफ कॉलेज में भारतीय अफसर आजादी के बाद भारत में सैनिक तानाशाही स्थापित करने की योजना बना रहे हैं। खान ने इस योजना का मास्टरमाइंड ब्रिगेडियर के एम करिअप्पा को बताया। वही करिअप्पा जो भारतीय सेना के पहले कमांडर इन चीफ बने।
लियाकत अली खान ने माउंटबेटन को यह भी बताया कि इस योजना की जानकारी उन्हें खुद करिअप्पा ने ही दी है। कुछ दिन बाद इस बात की पुष्टि भी हो गई और तब वायसराय ने इस बारे में लॉर्ड इस्मे को आगाह किया।
करिअप्पा अपने आप में बड़े असाधारण शख्स थे। जब अंग्रेजों ने यह तय किया कि कुछ भारतीय अफसरों को सेना में कमीशन किया जाए, तो करिअप्पा इकलौते व्यक्ति थे जिन्होंने दिसंबर 1919 में ब्रिटिश सेना में अपने लिए जगह बनाई। जब अंग्रेजों का भारत से जाने का समय करीब आया तो ब्रिगेडियर करिअप्पा और कर्नल जे एन चौधरी को इंपीरियल डिफेंस कॉलेज, इंग्लैंड में लीडरशिप ट्रेनिंग के लिए भेजा गया।
इस दौरान भी करिअप्पा को लेकर एक बात वॉइसरॉय तक पहुंची। लॉर्ड इस्मे ने माउंटबेटन को गुप्त रूप से टेलीग्राम भेजा, जिसमें उन्होंने बताया था कि कल करिअप्पा मुझसे मिलने आए थे और उन्होंने सलाह दी कि हमारे (अंग्रेजों के) जाने के बाद भारतीय सेना पंडित जवाहर लाल नेहरू या मोहम्मद अली जिन्ना में से किसी को कमांडर इन चीफ बना कर सत्ता अपने हाथों में ले सकती है। इस्मे के मुताबिक उन्होंने करिअप्पा को जवाब दिया कि यह प्रस्ताव न केवल पूरी तरह अव्यावहारिक, बल्कि खतरनाक भी है। उन्होंने करिअप्पा से इस तरह के ख्याल अपने दिमाग से निकाल देने और इस तरह की बात दोबारा नहीं करने के लिए कहा। इस्मे द्वारा भेजे गए इस संदेश के बाद माउंटबेटन बड़े सतर्क हो गए थे।
बता दें कि 'वेस्टलैंड बुक्स' से आई जोसफ की इस नई किताब में भारत की आजादी से ठीक पहले की उन घटनाओं का ब्योरा है, जिनका देश की आजादी और उसके बाद का स्वरूप तय करने में अहम रोल रहा है।