Supreme Court: न्यायमूर्ति नागरत्ना ने याचिकाओं की सुनवाई करते हुए कहा कि सबरीमाला के संदर्भ में अनुच्छेद 17 पर बहस कैसे की जा सकती है, यह मुझे समझ नहीं आता।
Justice Nagarathna Sabarimala Case: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। शीर्ष कोर्ट की न्यायाधीश बी.वी. नागरत्ना ने धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई की। न्यायाधीश नागरत्ना ने कहा कि किसी महिला को महीने में तीन दिन 'अछूत' की तरह नहीं माना जा सकता और फिर चौथे दिन से उसे यह दर्जा मिलना बंद हो जाना चाहिए। याचिकाओं में विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें केरलम का सबरीमाला मंदिर भी शामिल है। उनका इशारा मासिक धर्म की अवधि की ओर था।
न्यायमूर्ति नागरत्ना नौ न्यायाधीशों की पीठ में एकमात्र महिला हैं, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने याचिकाओं की सुनवाई करते हुए कहा कि सबरीमाला के संदर्भ में अनुच्छेद 17 पर बहस कैसे की जा सकती है, यह मुझे समझ नहीं आता। एक महिला होने के नाते, मैं कह सकती हूं कि हर महीने तीन दिन तक अछूत नहीं हो सकती।' न्यायमूर्ति नागरत्ना इस मामले में अनुच्छेद 17 के लागू होने पर संदेह व्यक्त कर रहे थे और कह रहे थे कि इसे अस्पृश्यता के लंबे इतिहास के संदर्भ में एक मौलिक अधिकार बनाया गया था।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह टिप्पणी तब की जब केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें 2018 के सबरीमाला फैसले में की गई एक टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति है। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने इस तर्क पर आपत्ति जताई कि 10-50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से वंचित रखना अस्पृश्यता का एक रूप है, जो संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन करता है।