
Justice Yashwant Varma Case Update: न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से नकदी बरामद होने के मामले में जांच समिति ने आरोपों को सही पाया है। बुधवार को लोकसभा में समिति की रिपोर्ट पेश की गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायमूर्ति वर्मा के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में बिना हिसाब की नकदी मिली थी। समिति ने अपनी जांच में यह भी कहा कि इस मामले में न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ किसी साजिश के कोई सबूत नहीं मिले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इतनी बड़ी मात्रा में नकदी का मौजूद होना ऐसी बात नहीं है, जिसे नजरअंदाज किया जा सके।
जांच समिति की रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा में सदन के पटल पर रखी गई। रिपोर्ट में नकदी बरामदगी से जुड़े विभिन्न पहलुओं का उल्लेख किया गया है और जांच के दौरान सामने आए निष्कर्षों को दर्ज किया गया है। समिति ने मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध सामग्री की समीक्षा के बाद आरोपों को सही पाया। रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ किसी तरह की साजिश रचे जाने के कोई सबूत जांच के दौरान नहीं मिले। समिति ने इस पहलू की भी जांच की थी कि क्या बरामदगी के पीछे किसी तरह की साजिश हो सकती है, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार ऐसा साबित करने वाला कोई साक्ष्य सामने नहीं आया।
आपको बताते हैं इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील आर्यमा सुंदरम (Aryama Sundaram) का क्या कहना है? CNNnews18 से बातचीत के दौरान इस सवाल पर चर्चा हुई कि अगर किसी जज के खिलाफ जांच चल रही हो और वह पद से इस्तीफा दे दे, तो क्या उसके खिलाफ FIR दर्ज कर आपराधिक कार्रवाई आगे बढ़ाई जानी चाहिए? इस पर सीनियर वकील आर्यमा सुंदरम ने यह तर्क दिया कि किसी पद से इस्तीफा देने से किसी व्यक्ति के खिलाफ संभावित आपराधिक कार्रवाई खत्म नहीं होती। अगर जांच में कानून के उल्लंघन के तथ्य सामने आते हैं तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ सामान्य नागरिक की तरह आपराधिक मुकदमा चल सकता है।
सीनियर वकील आर्यमा सुंदरम ने कहा कि अगर कोई नागरिक किसी आरोप में पकड़ा जाता है और इसके बाद वह अपनी नौकरी या पद छोड़ देता है, तो केवल पद छोड़ने से उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई खत्म नहीं हो जाती। उसके खिलाफ कानून के तहत आपराधिक मुकदमा चल सकता है। इसी आधार पर जज के मामले में भी ये सवाल उठाया गया।
सीनियर वकील आर्यमा सुंदरम ने कहा कि जज वर्मा के मामले में आरोपों और जांच को लेकर स्थिति पहले ही सार्वजनिक हो चुकी है। पैनल के निष्कर्ष सार्वजनिक हुए हैं और इसी वजह से इस मुद्दे पर सार्वजनिक स्तर पर चर्चा हो रही है। सीनियर वकील आर्यमा सुंदरम ने कहा कि अगर किसी जज को यह डर हो कि कोई भी व्यक्ति उन पर आरोप लगाकर उन्हें आपराधिक कार्रवाई के खतरे में डाल सकता है, तो इससे उनके स्वतंत्र रूप से काम करने पर असर पड़ सकता है। यही बात सरकार के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों पर भी लागू होती है।
उन्होंने कहा कि आमतौर पर किसी उच्च पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज करने के लिए संबंधित संस्था या शाखा के प्रमुख की मंजूरी की आवश्यकता हो सकती है। उदाहरण के तौर पर जज वर्मा के मामले में मुख्य न्यायाधीश की मंजूरी की बात उन्होंने कही। हालांकि, इस मामले में जज वर्मा का इस्तीफा हो चुका है।
उन्होंने कहा कि किसी जज को इस डर से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में हिचकना नहीं चाहिए कि किसी फैसले या कदम के कारण उस पर झूठा आरोप लगाया जा सकता है। इसी वजह से जज को पद से हटाने की प्रक्रिया को सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई से अलग रखा गया है। उन्होंने कहा कि जज को राष्ट्रपति या कैबिनेट की इच्छा मात्र से नहीं हटाया जा सकता, बल्कि इसके लिए महाभियोग की प्रक्रिया और संसद की भूमिका होती है।
सीनियर वकील आर्यमा सुंदरम ने कहा कि इस व्यवस्था का उद्देश्य न्यायिक पद की सुरक्षा और कार्यकाल की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है। यानी केवल किसी आरोप के आधार पर जज को हटाया ना जा सके और यह देखा जाए कि आरोपों के पीछे पर्याप्त आधार है या नहीं। बातचीत में कहा गया कि संबंधित मामले में एक पैनल का गठन किया गया था और पैनल ने जज वर्मा के व्यवहार में दोषपूर्ण आचरण का आधार पाया है।