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जातीय सर्वेक्षण रिपोर्ट स्वीकारने के बाद सिद्धारमैया ने दिया इस्तीफा, DKS से लिया साइलेंट रिवेंज

Karnataka CM Siddaramaiah Resigns: सिद्धारमैया ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है, लेकिन जाते-जाते उन्होंने जातीय सर्वे की रिपोर्ट स्वीकार कर ली है। इसे सियासत के जानकार कांग्रेस हाईकमान और डीके शिवकुमार के लिए टाइम बम बता रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर...

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सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार(फोटो-ANI)

सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। गुरुवार को कैबिनेट मंत्रियों संग ब्रेकफास्ट मीटिंग के बाद उन्होंने इस्तीफे का ऐलान किया था। मुख्यमंत्री पद छोड़ने से पहले उन्होंने ऐसा कदम उठाया, जिसे डीके शिवकुमार के खिलाफ सिद्धारमैया का खामोश बदला बताया जा रहा है।

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इस्तीफे की गूंज दिल्ली तक सुनाई दे

सिद्धारमैया ने यह सुनिश्चित किया कि उनका सीएम पद त्यागना कोई खामोशी भरा कदम न हो, बल्कि इसकी आवाज दिल्ली तक सुनाई दे। उन्होंने आखिरी समय में पिछड़ा वर्ग आयोग की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण (जाति जनगणना) रिपोर्ट को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया है। जो अब एक टाइम बम की तरह अगली सरकार के सामने बजती रहेगी। रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर डीके शिवकुमार की सरकार को कई समूहों का दबाव झेलना पड़ सकता है। शिवकुमार को उन्हीं के वोकालिग्गा समुदाय के लोगों की नाराजगी भी झेलनी पड़ सकती है।

सिद्धारमैया के कार्यकाल के दौरान 2 बार जातीय सर्वे रिपोर्ट तैयार

कर्नाटक में जाति सर्वेक्षण की रिपोर्ट दो बार तैयार की गई। दोनों ही समय में सिद्धारमैया की सरकार थी। साल 2017 में सिद्धारमैया के सीएम रहते पहली बार राज्य में जाति सर्वेक्षण की रिपोर्ट तैयार की गई, फिर 2023 में सत्ता में वापसी के बाद, सिद्धारमैया ने एक नए जाति सर्वेक्षण का आदेश दिया। जिसकी रिपोर्ट 2025 में तैयार हो गई। लेकिन, दोनों ही रिपोर्टों को सार्वजनिक नहीं किया गया।

साल 2017 की रिपोर्ट को लेकर भी राज्य में बवाल मचा था। राजनीतिक संवेदनशीलता, लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे दबदबे वाले समुदायों के विरोध के चलते रिपोर्ट लागू नहीं की गई। साल 2018 में बीजेपी की सरकार आने के बाद उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। 2023 में सत्ता में लौटने के बाद सिद्धारमैया ने नए जाति सर्वे का आदेश देते हुए कहा कि पिछले सर्वे में मूल रिपोर्ट की कमी थी।

क्यों कराई जातीय सर्वे?

सिद्धारमैया चाहते हैं कि ये जातीय सर्वे रिपोर्ट उनकी राजनीतिक विरासत का अहम हिस्सा बन जाए, लेकिन DK शिवकुमार के लिए, यह उनके राजनीतिक करियर का सबसे मुश्किल मुद्दा साबित हो सकता है। कन्नड़ मीडिया ने नौकरशाहों के हवाले से रिपोर्ट किया कि 2025 के संशोधित सर्वे में लगभग 5.9 करोड़ लोगों को शामिल किया गया था, जोकि अब तक किसी भी भारतीय राज्य द्वारा किया गया सबसे बड़ा जाति-गणना अभियान है।

यह जातीय सर्वे राज्य की राजनीतिक समीकरणों को सीधे तौर पर प्रभावित करती है, क्योंकि लीक हुई रिपोर्ट की जानकारियों के अनुसार कर्नाटक की कुल आबादी में OBC समुदायों की हिस्सेदारी लगभग 69.6% है। मुस्लिमों की आबादी 14 फीसदी है। वहीं, लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों की आबादी का हिस्सा क्रमशः लगभग 11% और 10-12% होने का अनुमान है। ऐसे में पार्टी ने एक ऐसे नेता को सीएम पद से हटाया है, जो 85 फीसदी का प्रतिनिधित्व करता है। वहीं, 10 फीसदी वाले वोक्कालिग्गा समुदाय से आने वाले को सीएम बनाने जा रही है।

वोक्कालिग्गा और लिंगायत के बरक्स अहिंदा

कर्नाटक की राजनीति दशकों तक वोक्कालिग्गा और लिंगायत समुदाय के ईर्द-गिर्द घुमती रही, लेकिन सिद्धारमैया ने अहिंदा का गठजोड़ तैयार किया। सिद्धारमैया की 'अहिंदा' (AHINDA) अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों और दलितों के गठबंधन ने दोनों प्रभुत्व वाले समुदाय को राजनीतिक रूप से चुनौती दी। यहीं से कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री, डी.के. शिवकुमार (DKS) के लिए मुश्किलें शुरू होती हैं। सियासत के जानकारों का कहना है कि पद छोड़ने से ठीक पहले सिद्धारमैया द्वारा सर्वेक्षण रिपोर्ट को स्वीकार करने के इस कदम को उनके अंतिम रणनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना ​​है कि सिद्धारमैया कर्नाटक के सबसे बड़े पिछड़ा वर्ग के नेता के तौर पर अपनी छवि की गहरी छाप छोड़कर पद छोड़ना चाहते हैं। लेकिन इस मौके पर रिपोर्ट को स्वीकार करके, उन्होंने यह भी सुनिश्चित कर दिया है कि इसके नतीजों को संभालने का पूरा बोझ अब डी.के. शिवकुमार के कंधों पर आ जाए।

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Updated on:
29 May 2026 08:04 am
Published on:
29 May 2026 08:03 am
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