राष्ट्रीय

जिसके नाम याचिका, उसकी 5 साल पहले हो चुकी थी मौत; कर्नाटक हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

Karnataka High Court: कर्नाटक हाईकोर्ट ने 1993 में दायर एक रिट याचिका को खारिज कर दिया, क्योंकि याचिकाकर्ता सी. मरियप्पा की मृत्यु 1988 में ही हो चुकी थी। कोर्ट ने इसे गंभीर तथ्य छिपाने का मामला माना और कानूनी उत्तराधिकारियों पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। 2001 का आदेश भी निष्प्रभावी कर दिया।
2 min read
Sep 08, 2026
Petitioner died before writ petition
कर्नाटक हाईकोर्ट (File Photo)

Karnataka High Court Mariyappa case: कर्नाटक हाईकोर्ट ने 1993 में दायर एक रिट याचिका को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए उसे खारिज कर दिया है। दरअसल, कोर्ट के सामने यह बात सामने आई कि जिस व्यक्ति के नाम से याचिका दायर की थी, उसकी मौत याचिका दाखिल होने से करीब पांच साल पहले ही हो चुकी थी।

कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस ईएस इंदीरेश ने इस मामले को अजीब बताया। सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा कि 1993 में सी. मरियप्पा के नाम से, उनके पावर ऑफ अटॉर्नी धारक के माध्यम से रिट याचिका दायर की गई, जबकि मरियप्पा की मृत्यु 8 अगस्त 1988 को हो चुकी थी।

क्या है पूरा मामला? 

बता दें कि पूरा मामला श्रीरंगपट्टण तालुक के बेलावड़ी गांव की 4 एकड़ 21 गुंटा जमीन से जुड़ा है। वर्ष 1981 में लैंड ट्रिब्यूनल ने इस जमीन पर सी. निंगम्मा को कब्जेदारी का अधिकार प्रदान किया था। इसके खिलाफ 1993 में मरियप्पा के नाम से कर्नाटक हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की गई।

2001 में हाईकोर्ट ने मामले को वापस भेजा था

वहीं अक्टूबर 2001 में हाईकोर्ट ने उक्त याचिका स्वीकार करते हुए मामले को नए सिरे से विचार के लिए लैंड ट्रिब्यूनल के पास भेज दिया था। बाद में लैंड ट्रिब्यूनल के फैसले को मरियप्पा के कानूनी उत्तराधिकारियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। 

उनका आरोप था कि ट्रिब्यूनल की कार्यवाही उनकी जानकारी के बिना की गई और मार्च 2023 में आदेश पारित करने से पहले उन्हें उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया।

हालांकि, जमीन विवाद में शामिल निजी पक्षकारों यानी निंगम्मा के कानूनी उत्तराधिकारियों ने इस बात पर ही सवाल खड़ा कर दिया कि 1993 में मरियप्पा के नाम से याचिका आखिर दायर कैसे हुई, जबकि उनकी मृत्यु 1988 में हो चुकी थी।

मौत की जानकारी स्पष्ट रूप से नहीं बताई गई- कोर्ट

जस्टिस इंदीरेश ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के वकील की ओर से इस संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। कोर्ट ने पाया कि 1993 की रिट याचिका किसी ऐसे व्यक्ति के नाम से वैध रूप से दायर नहीं की जा सकती थी, जिसकी मृत्यु पहले ही हो चुकी थी। अदालत ने यह भी गौर किया कि बाद की कार्यवाही में भी मरियप्पा की मृत्यु की वास्तविक तारीख को स्पष्ट रूप से सामने नहीं रखा गया।

कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, मरियप्पा की बेटी सुमलम्मा ने लैंड ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर एक हलफनामे में केवल इतना कहा था कि उनके पिता की मृत्यु “बहुत पहले” हो चुकी थी। हालांकि, उसमें उनकी मृत्यु की वास्तविक तारीख नहीं बताई गई थी।

कोर्ट से छिपाए गए महत्वपूर्ण तथ्य

हाईकोर्ट ने माना कि कानूनी उत्तराधिकारियों ने कार्यवाही जारी रखते हुए महत्वपूर्ण तथ्यों का पूरा और स्पष्ट खुलासा नहीं किया। हाईकोर्ट ने मरियप्पा के कानूनी उत्तराधिकारियों की याचिका खारिज कर दी। 

साथ ही कोर्ट ने 10 हजार रुपये का भी जुर्माना भी लगाया। यह राशि कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (KSLSA) को जमा करने का निर्देश दिया गया।

Updated on:
08 Sept 2026 03:17 pm
Published on:
08 Sept 2026 03:17 pm
Also Read
View All
‘एक पिता अपने ही घर के दरवाजे पर भी सुरक्षित नहीं है?’ दिल्ली में मणिपुर के म्यूजिशियन की हत्या पर प्रियंका गांधी का हमला

मणिपुरी संगीतकार हत्याकांड: राहुल गांधी के सवाल पर किरेन रिजिजू का पलटवार, बोले- पूर्वोत्तर के लोग भी भारतीय, न करें राजनीति

मुझे नहीं पता बागेश्वर बाबा कौन हैं, बंगालियों के खान-पान पर टिप्पणी करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं: सौगत रॉय

BRICS समिट 2026 पर दुनिया की नजर, चीन और अमेरिका के दबदबे के बीच ग्लोबल साउथ की आवाज बनेगा मेजबान भारत

Congress: राहुल गांधी अपने हिसाब से बना रहे कांग्रेस की नई टीम, वरिष्ठ नेताओं को दे रहे संदेश