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BRICS समिट 2026 पर दुनिया की नजर, चीन और अमेरिका के दबदबे के बीच ग्लोबल साउथ की आवाज बनेगा मेजबान भारत

BRICS Summit 2026: भारत में होने वाला BRICS समिट ग्लोबल पॉलिटिक्स का बड़ा मंच होगा। यहां भारत, चीन के दबदबे और अमेरिका की टैरिफ नीति को कैसे मंच पर रखेगा? यह किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
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भारत

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Saurabh Mall

Sep 08, 2026

BRICS Summit 2026

BRICS समिट 2026 (इमेज सोर्स: एक्स /@India in Indonesia)

BRICS Summit 2026 Latest Update: भारत 12-13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में ब्रिक्स समिट 2026 (BRICS) की मेजबानी यानी की होस्ट करेगा। बता दें ये वही जगह है, जब 2023 में G-20 समिट का आयोजन किया गया था। इस बार भी दुनिया की नजर भारत पर होगी। वजह साफ है। भारत इस समिट के जरिए ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करना चाहता है। साथ ही उसकी कोशिश चीन के बढ़ते प्रभाव और अमेरिका के दबाव के बीच संतुलन बनाने की होगी।

BRICS में भारत की बढ़ती भूमिका

यह ब्रिक्स (BRICS) का 18वां सम्मेलन होगा। ग्रुप में 11 प्रमुख देश शामिल हैं। इनमें भारत, चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, मिस्र, सऊदी अरब, UAE, इथियोपिया और इंडोनेशिया शामिल हैं। इनके साथ 10 पार्टनर देश भी जुड़े हैं।

बता दें BRICS देश दुनिया की करीब 49 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैश्विक GDP में इनकी हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भी इनका बड़ा हिस्सा है।

भारत के लिए BRICS रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। इससे उसे अपनी मल्टी-अलाइनमेंट नीति को आगे बढ़ाने का मौका मिलता है। यानी भारत एक ही समय में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ रिश्ते मजबूत कर सकता है। वहीं रूस, चीन और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी बातचीत जारी रख सकता है। भारत BRICS के जरिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, IMF और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थानों में सुधार की मांग भी तेज करना चाहता है। साथ ही अपनी प्रभावी मौजूदगी और वर्चस्व दर्ज करना चाहता है।

चीन और अमेरिका के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती

ब्रिक्स शिखर सम्म्मेलन (BRICS) में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन है। चीन की आर्थिक ताकत इस ग्रुप में काफी ज्यादा है। व्यापार, निवेश, मैन्युफैक्चरिंग और जरूरी खनिजों के क्षेत्र में उसका प्रभाव बड़ा है। भारत नहीं चाहता कि BRICS चीन के नेतृत्व वाला मंच बन जाए। उसकी कोशिश है कि संगठन में सभी देशों की बराबर भूमिका बनी रहे।

दूसरी तरफ अमेरिका भी BRICS को लेकर सतर्क है। खासकर डॉलर के विकल्प और डी-डॉलराइजेशन की चर्चा को लेकर। भारत ने साफ किया है कि वह किसी साझा BRICS करेंसी के पक्ष में नहीं है। वह स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और बेहतर क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट सिस्टम का समर्थन करता है। यानी भारत को दोनों तरफ संतुलन बनाना होगा। हालांकि ये एक बड़ी चुनौती होगी।

BRICS से भारत की बड़ी उम्मीदें

भारत इस समिट को सिर्फ बातचीत का मंच नहीं बनाना चाहता। उसका जोर ठोस नतीजों पर है। भारत सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स, स्टार्टअप, डेवलपमेंट फाइनेंस और डिजिटल पेमेंट जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना चाहता है। साथ ही UNSC सुधार और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग जैसे मुद्दे भी एजेंडे में रहेंगे। भारत के लिए एक साझा BRICS घोषणा हासिल करना भी बड़ी चुनौती होगी। खासकर पश्चिम एशिया के मुद्दे पर सदस्यों के बीच मतभेद हैं।

इसके बावजूद भारत की कोशिश एक ऐसी BRICS व्यवस्था बनाने की है, जो किसी एक देश के प्रभाव में न हो। अगर नई दिल्ली इसमें सफल होती है, तो यह समिट भारत की वैश्विक कूटनीतिक भूमिका को और मजबूत कर सकता है।

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