
कांग्रेस (Congress) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद मल्लिकार्जुन खरगे (Mallikarjun Kharge) ने कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) को पत्र लिखा और कहा कि 13 अगस्त 2026 को संसद का मानसून सत्र अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया था। तब से अब तक 64 दिन बीत चुके हैं, लेकिन संसद के दोनों सदनों का सत्रावसान अभी तक नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं देखी गई है। खरगे ने इस पत्र में सरकार की संभावित योजनाओं पर भी सवाल उठाते हुए एक सर्वदलीय बैठक बुलाने की भी मांग की। खरगे के इस पत्र का अब केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू (Kiren Rijiju) ने पत्र के साथ ही जवाब दिया है।
रिजिजू ने खरगे को पत्र लिखते हुए जवाब दिया, "आपने 16 अक्टूबर 2026 को माननीय प्रधानमंत्री जी को एक पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि संसद में 'परिसीमन संवैधानिक संशोधन' पर विचार करने से पहले एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए। मैं आपको कुछ बातें स्पष्ट करने और इस विषय पर विपक्ष के साथ बातचीत करने के लिए सरकार द्वारा किए गए प्रयासों के तथ्यों को रिकॉर्ड पर लाने के लिए यह पत्र लिख रहा हूं।"
"सबसे पहले, आपकी इस टिप्पणी के संबंध में कि 13 अगस्त 2026 को सदन के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने के बाद 64 दिन बीत जाने पर भी संसद का सत्र सत्रावसान नहीं किया गया है। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि संविधान में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है जो यह तय करे कि सदन के अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने के बाद उसे कितने समय के भीतर सत्रावसान करना होगा। सिर्फ इस आधार पर कि इस दौरान सदन का सत्रावसान नहीं किया गया, इसे कोई संवैधानिक या प्रक्रियात्मक अनियमितता या गलती नहीं माना जा सकता। अतीत में ऐसे कई उदाहरण हैं जब सदन लंबे समय तक, यहाँ तक कि 87 दिनों तक भी सत्रावसान के बिना रहे हैं। वर्ष 2008 में, लोकसभा 21 और 22 जुलाई को विश्वास प्रस्ताव के लिए बैठी थी; इसके बाद सदन का सत्रावसान नहीं किया गया, फिर 17 अक्टूबर 2008 को सदन की बैठक बुलाई गई और 24 अक्टूबर को इसे स्थगित कर दिया गया जिससे अगली बैठक 10 दिसंबर को हो सके। ऐसे कई अन्य उदाहरण भी हैं - 1987 (76 दिन), 1989 (54 दिन), 2006 (49 दिन), 2013 (49 दिन) और 1963 (41 दिन)।"
"दूसरी बात, सरकार ने 'परिसीमन संशोधन विधेयक' पर विचार करने और उसे पारित कराने के लिए लगातार विपक्ष का समर्थन और सहयोग मांगा है। सरकार ने मुख्य विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस पार्टी से कई मौकों पर संपर्क किया है। इस संबंध में मैंने आपको 16 मार्च 2026, 26 मार्च 2026 और 12 अप्रैल 2026 को पत्र लिखे थे। इन लिखित संदेशों के अलावा मैंने आपसे व्यक्तिगत रूप से भी इस मामले पर चर्चा की थी और आपका समर्थन व सहयोग मांगा था। मानसून सत्र के दौरान मैंने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से भी व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर चर्चा की और इस विषय पर उनका सहयोग मांगा।"
"हालांकि बार-बार अनुरोध करने के बाद भी कांग्रेस पार्टी ने चर्चा के लिए कोई तारीख नहीं दी, जिसके बाद सरकार ने अन्य राजनीतिक दलों से संपर्क किया। प्रस्तावित कानून के समर्थन में बातचीत को आगे बढ़ाने और व्यापक सहमति बनाने के उद्देश्य से डीएमके, समाजवादी पार्टी, वाईएसआरसीपी, एनसीपी, शिवसेना (उद्धव गुट), एआईएमआईएम और बीजेडी सहित कई दलों के प्रतिनिधियों के साथ परामर्श किया गया। ऐसे में यह समझ नहीं आता कि बार-बार परामर्श की मांग क्यों की जा रही है, जबकि सरकार पहले ही बातचीत के लिए लगातार प्रयास कर चुकी है। अब ज़रूरत इस बात की है कि विपक्षी दल रचनात्मक सहयोग दें, न कि पहले हो चुके परामर्शों को नज़रअंदाज़ करते हुए बार-बार वही पुरानी मांग दोहराते रहें।"
"ये प्रयास परामर्श करने और संसद में रचनात्मक रूप से जुड़ने की सरकार की दृढ़ इच्छा को दर्शाते हैं। मैं फिर दोहराता हूं कि सरकार संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों और संसद के प्रभावी कामकाज के ज़रिए सार्थक बातचीत को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। हम राष्ट्रीय महत्व के सभी मुद्दों पर होने वाली चर्चाओं और विचार-विमर्श में सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी को महत्व देते हैं। मुझे यह भी उम्मीद है कि कांग्रेस पार्टी एक रचनात्मक भूमिका निभाएगी और भविष्य में आने वाले महत्वपूर्ण कानूनों के रास्ते में कोई बाधा नहीं डालेगी।"
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