
बिद्ययुम मेधी, भाषाविद् स्कॉ, जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय
मेरी पीढ़ी अपनी बातचीत में असमिया के भीतर अंग्रेजी शब्द बड़ी संख्या में अपना चुकी है। लेकिन असली कमाल मेरे बाद की पीढ़ी दिखा रही है। उसमें भाषा का यह होमोजेनाइजेशन और भी ज्यादा व तेज है। उनकी बातचीत में केवल इंग्लिश ही नहीं, हिंदी और दूसरी भाषाओं के शब्द भी घुल चुके हैं। आज बच्चे हिंदी और दूसरी भाषाओं के गाने सुनते हैं, फिल्में देखते हैं, दूसरे प्रदेशों के बच्चों के साथ बातचीत करते हैं, सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर जुड़ते हैं, तो कहना चाहिए कि हिंदुस्तानी की यह ग्रोथ पूरी तरह ऑर्गेनिक तरीके से हो रही है। यकीन है कि संवाद कायम करने में नई जनरेशन को देश में कहीं भी हम जैसी दिक्कतें नहीं होंगी।
नगालैंड में जनजातीयों के 16 प्रमुख समूह और 40 से ज्यादा सह-समूह हैं। उन्होंने आवश्यकतावश अपनी भाषाओं के शब्दों को मिलाते हुए एक पिरामिड की तरह नगामीज भाषा बना दी। एक अंगामी जनजाति का व्यक्ति दूसरे क्षेत्र के अंगामी व्यक्ति से नगामीज में संवाद करता है। इसमें असमिया और नगा के शब्द तो हैं ही, हिंदी, इंग्लिश और उर्दू के शब्द भी मिल जाते हैं। यहां कोई व्यक्ति सुबह को फजर कहता मिल जाए तो हैरान मत हो जाना। बीते 20 वर्षों में नगामीज में कई भाषाओं के शब्द शामिल हुए हैं, शामिल होते जा रहे हैं। यह बताता है कि किस तरह भाषा का विकास धीरे-धीरे लोगों को जोड़ता है।
नव-वैष्णव काल में 1449 में जन्मे शंकर देव ने असम में 15वीं सदी में भाषा के मामले में अनूठा काम किया। उन्होंने लोगों को आकर्षित करने के लिए विवाह संस्कार में भी संस्कृत के बजाय असम की स्थानीय भाषा में मंत्रोच्चार सिखाने शुरू किए। जब अनुवाद किया तो मैथिली और असमिया का सहारा लिया। यह भाषा न असमिया रही न संस्कृत, बल्कि यह कहलाई ब्रजावली। करीब दो हजार किमी दूर से ब्रज भाषा और भोजपुरी का भी समावेश किया।
प्रो. गीता दुरईराजन (भाषाविद्, इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेजेज यूनिवर्सिटी हैरराबाद से सेवानिवृत)
दक्षिण भारतीय राज्यों में भाषा को लेकर इस वक्त राजनीति हावी है। जो लोग स्थानीय भाषाओं की राजनीति कर रहे हैं, वे खुद अपने बच्चों को सीबीएसई या विदेशों में पढ़ा रहे हैं। मुझे यह उम्मीद कम ही लगती है कि निकट कुछ दशकों में भारत में हिंदुस्तानी के रूप में एक लिंक भाषा विकसित हो सकेगी। इसके पीछे कई वजहें हैं, जिन पर एक देश के रूप में विचार करना जरूरी है। महात्मा गांधी ने भाषा को लेकर जो सोचा था, उससे अलग हट कर हमें मौजूदा हालात को भी देखना होगा। हमारे सामने भाषायी अस्मिता का प्रश्न सबसे पहले खड़ा है। इसे मुद्दा बनाया गया।
आजादी के बाद दक्षिण में हिंदी की लोकप्रियता बढ़ रही थी। लेकिन फिर राजनीतिक कारणों से इस प्रक्रिया पर नाकारात्मक असर पड़ा। यह नहीं होता तो शायद आज देश में भाषा की तस्वीर दूसरी होती। इसके अलावा उपनिवेशवादी सोच से भी लड़ना है, जिसकी वजह से भी भारत में संपर्क भाषा की बाधाएं पैदा हुईं। हमारे सामने इंडोनेशिया का जीता जागता उदाहरण है, जहां 'भाषा इंडोनेशिया' पूरे देश में आधिकारिक तौर पर एकता की भाषा बनी। जबकि यह सबसे अधिक बोली जाने वाली मातृभाषा नहीं थी। भारत में लोगों के बीच एक भाषा स्वयं लोकप्रिय होने देना चाहिए। इसे थोपने से बचना चाहिए।