Assembly Election 2026: देश में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM भले ही मुस्लिम आधार पर चुनाव लड़ती है, लेकिन राज्यों में भी पार्टियां हैं जो कि मुस्लिम वोट बैंक को आधार बनाकर चुनाव लड़ती हैं।
Muslim Vote Bank: देश के पांच राज्यों में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले सभी राजनीतिक पार्टियों ने तैयारी भी शुरू कर दी है। इन पांच राज्यों में से तीन राज्यों (असम, बंगाल और केरल) में सरकार बनाने के लिए मुस्लिम वोटर का अहम रोल है। इन तीनों राज्यों में मुस्लिम आबादी करीब 27 प्रतिशत बताई जा रही है। इसके अलावा कई विधानसभा सीटों पर बहुसंख्यक मुस्लिम वोटर हैं। ऐसे में इस साल विधानसभा चुनावों में मुस्लिम राजनीति की भी असली परीक्षा होगी।
देश में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM भले ही मुस्लिम आधार पर चुनाव लड़ती है, लेकिन इन राज्यों में भी पार्टियां हैं जो कि मुस्लिम वोट बैंक को आधार बनाकर चुनाव लड़ती हैं। पश्चिम बंगाल में अब्बास सिद्दीकी की इंडियन सेकुलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी चुनाव में उतरेगी।
केरल में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और असम में मौलाना बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ पार्टी चुनावी मैदान में अपना दमखम दिखाएगी। दरअसल, इन सभी पार्टियों की राजनीति मुस्लिम वोटर के इर्द-गिर्द ही सिमटी हुई है।
ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी से बाहर होने के बाद नई पार्टी बनाने वाले हुमायूं कबीर का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 सियासी टेस्ट होगा। प्रदेश में हुमायूं कबीर बड़े मुस्लिम नेता माने जाते हैं। टीएमसी से बाहर होने के बाद उन्होंने जनता उन्नयन पार्टी बनाई। नई पार्टी के तौर पर हुमायूं कबीर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। वे मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की भी नींव रखने के बाद देशभर में चर्चा का विषय बने।
हुमायूं कबीर के अलावा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेकुलर फ्रंट के लिए भी यह विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण है। दरअसल, अब्बास सिद्दीकी की पार्टी की राजनीति भी मुस्लिमों के इर्द-गिर्द ही घूमती है।
पश्चिम बंगाल में करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो ज्यादातर मुस्लिम सीएम ममता बनर्जी की पार्टी को वोट देते हैं। यही कारण है कि ममता बनर्जी लगातार बंगाल का किला फतह कर रही हैं। ऐसे में हुमायूं कबीर और अब्बास सिद्दीकी अल्पसंख्यक वोटों को अपने पाले में कैसे करते हैं, यह तो आगामी विधानसभा चुनाव में ही देखने को मिलेगा।
दरअसल, असम में मुस्लिम राजनीतिक अहमियत को देखते हुए मौलाना बदरुद्दीन ने 2005 में एआईयूडीएफ का गठन किया। इसके बाद प्रदेश में लगातार पार्टी का जनाधार बढ़ता गया और यही कारण है कि 2021 का चुनाव कांग्रेस और AIUDF ने मिलकर लड़ा था। बता दें कि बदरुद्दीन की असली ताकत मुस्लिम वोटर ही है।
2010 के विधानसभा चुनाव में मौलाना बदरुद्दीन की पार्टी AIUDF ने 10 सीटों पर जीत हासिल की थी। इसके बाद 2011 में 18, 2016 में 13 और 2021 में 16 सीटों पर जीत दर्ज की। हालांकि लोकसभा चुनाव 2024 में मौलाना बदरुद्दीन को हार का सामना पड़ा।
प्रदेश में मुस्लिम वोटबैंक पर कांग्रेस की भी नजर है। वहीं दूसरी तरफ बीजेपी सीएम हिमंत बिस्व सरमा भी मुस्लिमों को लेकर विवादित बयान देते रहे हैं। ऐसे में मौलाना बदरुद्दीन अजमल के मुस्लिम वोटबैंक में कांग्रेस भी सेंध लगाना चाह रही है।
2021 के विधानसभा चुनाव में 31 मुस्लिम नेता चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। हालांकि इस बार परिसीमन ने सीटों का पूरा समीकरण बदल दिया है। माना जा रहा है कि इस बार 22 सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका बना सकते हैं।
केरल में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटर अहम भूमिका निभा सकते हैं। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के बीच अच्छी पकड़ बनाई हुई है और यही कारण है कि UDF के साथ मिलकर IUML चुनाव लड़ती है।
केरल की 140 सीटों में से 32 मुस्लिम विधायक हैं। इसमें से 15 इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के हैं। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 1962 से लेकर अब तक प्रत्येक लोकसभा चुनाव में पार्टी के कम से कम दो सांसद रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रदेश की करीब 43 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर समीकरण बिगाड़ सकते हैं। बताया जाता है कि प्रदेश में अधिकतर मुस्लिम वोट कांग्रेस नेतृत्व गठबंधन को जाता है।