
आजादी के समय भारत को अंग्रेजों से तिब्बत में कुछ विशेषाधिकार विरासत में मिले थे। भारत को तिब्बत की राजधानी ल्हासा में एक मिशन रखने का अधिकार, ग्यांत्से और यातुंग में सैन्य एस्कॉर्ट, व्यापारिक एजेंसियां, डाक-बंगले और टेलीग्राफ लाइनें मिली थी। लिहाजा, तिब्बत में भारतीय प्रशासनिक दस्ते की मौजूदगी भारत की एकमात्र ठोस रणनीतिक चौकी थी, लेकिन कुछ ही समय बाद परस्थितियां पूरी तरह से बदल गईं। 1949 में चीन में साम्यवादी क्रांति की वजह से च्यांग काई-शेक की राष्ट्रवादी सरकार बेदखल हो गई। माओ के नेतृत्व में नया निजाम कायम हुआ। इसके बाद कम्युनिस्ट चीन की नजर तिब्बत पर पड़ी।
अक्टूबर 1950 में चीनी सेना ने तिब्बत में प्रवेश किया। इस पर भारत की शुरुआती प्रतिक्रिया बेहद नरम रही। तिब्बत की सरकार ने जब मदद के लिए भारत की ओर देखा, तो नेहरू असमंजस में दिखे। उन्होंने मदद की अपीलें ठुकरा दीं और तिब्बतियों को शांतिपूर्ण समाधान की सलाह दी। संयुक्त राष्ट्र में भी भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने चीन की निंदा वाले प्रस्ताव को आगे बढ़ने से रोका।
इस पर कांग्रेस नेता व देश के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल समेत कुछ नेताओं ने चेतावनी दी थी कि कम्युनिस्ट चीन का तिब्बत कब्जा भारत की उत्तरी सुरक्षा के लिए खतरा है। हालांकि, कुछ रिपोर्टों में यह बात भी सामने आई है कि तिब्बत पर चीनी आक्रमण को लेकर पंडित नेहरू ने उस समय भारतीय सेना प्रमुख जनरल के.एम. करिअप्पा से पूछा था कि क्या भारत सैन्य रूप से हस्तक्षेप कर सकता है। इस पर जनरल करिअप्पा का जवाब नकारात्मक था। उन्होंने भारतीय सेना की क्षमता पाकिस्तान मोर्चे की प्रतिबद्धता के कारण प्रधानमंत्री को बताया कि सिर्फ एक बटालियन जैसी सीमित ताकत ही वहां भेजी जा सकती है, जोकि व्यवहारिक नहीं था। इसके साथ ही, ब्रिटेन और अमेरिका भी सैन्य सहायता के लिए तैयार नहीं थे।
उधर, तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने नेहरू को लिखे पत्र में कहा था कि चीनी सरकार ने शांतिपूर्ण इरादों का दिखावा करके भारत को धोखे में रखा। भारतीय राजदूत में एक झूठा भरोसा पैदा किया। उन्होंने यह भी चेताया कि भले ही भारत खुद को चीन का मित्र मानता हो, चीन भारत को मित्र नहीं मानता। नेहरू को इस पत्र में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने चीनी खतरे का गहन सैन्य व खुफिया आकलन कराने की सलाह दी।
इसके बाद साल 1954 में अप्रैल की 29 तारीख को पंडित नेहरू ने चीन की राजधानी बीजिंग में तिब्बत क्षेत्र और भारत के बीच व्यापार व आवागमन समझौता साइन किया। जिसे बाद में पंचशील समझौता का नाम दिया गया। इसमें भारत ने सहमति दी कि वह यातुंग और ग्यांत्से में तैनात अपने सैन्य एस्कॉर्ट को पूरी तरह वापस बुलाएगा। साथ ही टेलीग्राफ लाइनें, डाक-बंगले व संचार तंत्र चीन को सौंप दिए गए।
लेखक व भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी अवतार सिंह भसीन अपनी पुस्तक Nehru, Tibet and China में बताया है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद (UNSC) की सदस्यता दिलवाने को लेकर उतावले थे और उसके साथ लगने वाली अपनी सीमा पर बातचीत को लेकर उतने ही बेपरवाह भी थे।
भसीन ने टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में बताया था कि आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत ने एशियाई देशों को एकजुट करने के लिए मकसद से चीन का दिल जीतने की कोशिश की। उस वक्त तक भारत को चीन से कोई खतरा महसूस नहीं हो रहा था। यूएन सिक्यॉरिटी काउंसिल में कुओमिंतांग चीन की जगह कम्युनिस्ट चीन को लाने की नेहरू की चाहत के पीछे कारण यह था कि माओ त्से तुंग के नेतृत्व में हुई 1949 की सशस्त्र क्रांति में चीन की केंद्रीय भूमि पर कम्युनिस्टों का कब्जा हो गया था जिसे भारत ने भी मान्यता दी थी।
भसीन ने कहा कि नेहरू ने तो बातचीत से पहले ही तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री झाउ एन लाइ को कहा कि हमारी सरकारों के अपने-अपने विचार इतने जुदा और एक-दूसरे के इतने विरोधी हैं कि उपयोगी बातचीत की जगह ही नहीं बची है। वहीं, विजय गोखले ने अपनी किताब The Long Game: How China Negotiates with India में लिखा कि प्रधानमंत्री नेहरू जब चीनी समकक्ष से झाउ एन लाइ से बात करने गए तो मुद्दे पर रिसर्च करके तथ्य जुटाने की तो बात ही दूर, आपस में सामान्य बातचीत भी नहीं की। नतीजतन, उन्होंने तिब्बत की राजधानी ल्हासा में भारतीय दूतावास का दर्ज घटाकर कॉन्स्युलर पोस्ट कर दिया। ऐसा करते हुए उन्होंने इसका कानूनी और राजनीतिक नतीजों पर विचार भी नहीं किया।
झाउ जब अपने विदेश मंत्री चेन यी, 29 अधिकारियों और सात पत्रकारों के दल के साथ अप्रैल 1960 में भारत पहुंचे, लेकिन कई दौर तक चली बातचीत के बाद भी सीमा विवाद पर कोई हल नहीं निकला। झाउ अक्साइ चीन को छोड़ने के बदले अरुणाचल प्रदेश देने का ऑफर लेकर आए थे। नेहरू अड़े रहे। नेहरू ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि सीमा विवाद का हल नहीं निकलने पर चीन भारत पर आक्रमण भी कर सकता है। चीन ने 20 अक्टूबर, 1962 को नॉर्थ ईस्टर्न फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) के पूर्वी और लद्दाख के पश्चिमी छोर पर बेहद सुनियोजित हमला कर दिया। सिर्फ तीन दिनों में ही चीनी सेना नेफा को फतह करते हुए अक्साई चिन के बड़े इलाके पर कब्जा कर लिया। फिर जो हुआ वो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। भारतीय सेना को इतिहास में पहली बार पीछे हटना पड़ा।