
त्रिपुरा के पूर्व शाही परिवार के सदस्य और टिपरा मोथा पार्टी के संस्थापक प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मा की एक पोस्ट के बाद त्रिपुरा के इतिहास और 1947 के बंटवारे को लेकर एक नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है। इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए गोड्डा (झारखंड) से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कहा कि 1947 के बंटवारे के दौरान पाकिस्तान ने कश्मीर के साथ टिपरा के भी एक हिस्से पर कब्जा कर लिया था। उन्होंने कहा कि अब इतिहास को सही करने का समय है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रद्योत देबबर्मा के पोस्ट को शेयर करते हुए निशिकांत दुबे ने लिखा, "आपके पूर्वजों ने भारत के लिए बलिदान दिया और उन्हीं की वजह से आज त्रिपुरा भारत का एक अभिन्न अंग बना हुआ है। पूरा टिपरा राज्य ही विकसित भारत 2047 का रास्ता है। 1947 में पाकिस्तान ने केवल कश्मीर के एक हिस्से पर ही अवैध कब्जा नहीं किया था, बल्कि त्रिपुरा के एक हिस्से पर भी जबरन कब्जा कर लिया था। अब समय आ गया है कि इतिहास को सुधारा जाए।"
इससे पहले प्रद्योत देबबर्मा ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखकर 1947 के बंटवारे के दौरान सीमाओं के निर्धारण पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा कि बंटवारे के समय उनकी दादी यानी महारानी कंचन प्रभा देवी को पूरी तरह अंधेरे में रखा गया था और तत्कालीन त्रिपुरा राज्य का एक बड़ा हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में मिला दिया गया था। प्रद्योत ने इसे देश के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया।
प्रद्योत ने आगे कहा कि अगर उस समय इन ऐतिहासिक क्षेत्रों को अलग न किया गया होता और त्रिपुरा की समुद्र तक पहुंच बनी रहती, तो आज देश को चिकन नेक (सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर इतनी चिंता नहीं करनी पड़ती। उन्होंने कहा कि तत्कालीन भारत सरकार की इस रणनीतिक भूल का खामियाजा त्रिपुरा, पूर्वोत्तर और पूरे देश को भुगतना पड़ा है।
इसके अलावा, प्रद्योत ने अपने पोस्ट में ग्रेटर टिपरालैंड आंदोलन का बचाव करते हुए कहा कि अक्सर इसे गलत तरीके से पेश किया गया है। उनके अनुसार, इस आंदोलन का असली मकसद उन क्षेत्रों को फिर से एक करना है, जो ऐतिहासिक गलतियों की वजह से अलग हो गए थे।
प्रद्योत देबबर्मा जिस इलाके और समुद्र तक पहुंच की बात कर रहे हैं, वह ऐतिहासिक रूप से तत्कालीन त्रिपुरा रियासत के मैदानी इलाकों का हिस्सा था, जिसे चकला रोशनबाद कहा जाता था। अविभाजित बंगाल के कोमिला, नोआखली और सिलहट जिलों से सटे ये मैदानी इलाके राजस्व और व्यापार के लिहाज से बहुत समृद्ध थे और यहीं से चटगांव बंदरगाह तक पहुंच मिलती थी।
1947 के बंटवारे के दौरान जब रेडक्लिफ लाइन खींची गई, तो ये उपजाऊ मैदानी इलाके तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में चले गए, जबकि केवल पहाड़ी इलाका भारत का हिस्सा बना। 1947 में महाराजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य के निधन के बाद महारानी कंचन प्रभा देवी ने रीजेंट के तौर पर राज्य की बागडोर संभाली और भारतीय संघ में शामिल होने के समझौते पर हस्ताक्षर किए।