2005 से अब तक बिहार की सियासत नीतीश कुमार के ईर्द गिर्द घूम रही है। 2025 के चुनावी नतीजे भी यही साबित करते हैं कि बिहार में नीतीश का पर्याय कोई नहीं है, लेकिन अब नीतीश राज्यसभा जा रहे हैं, जाहिर हैं बिहार को नया सीएम जल्द मिलेगा। पढ़िए जब पत्नी से उधार लेकर नीतीश ने साल 1985 में चुनाव लड़ा था। यह चुनावी राजनीति में उनकी पहली जीत थी।
Nitish Kumar: नीतीश कुमार अब राज्य सभा जा रहे हैं। बीते गुरुवार को उन्होंने बिहार विधानसभा में राज्य सभा उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन पर्चा दाखिल किया। उनके नामांकन पर्चा दाखिल करते समय बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मौजूद थे। शाह उसी दिल्ली से पटना विशेष तौर पर पहुंचे थे। नीतीश ने नामांकन पर्चा दाखिल करने से पहले X पर पोस्ट करते हुए कहा था कि मैं तीन सदनों का सदस्य यानि लोकसभा, बिहार विधानसभा और बिहार विधान मंडल का सदस्य रह चुका हूं और अब राज्य सभा जाना चाहता हूं।
उनके इस ट्वीट से ही साफ हो गया कि बिहार की राजनीति में 'नीतीशकाल' का अंत होने जा रहा है, लेकिन नीतीश अध्याय की शुरुआत औपचारिक रूप से 1985 से शुरू होती है, जब वह चुनाव जीतकर पहली बार बिहार विधानसभा पहुंचे थे। यह चुनाव उनके लिए बेहद अहम था। उन्होंने अपनी पत्नी मंजू से वादा किया था कि ये आखिरी चुनाव है। अगर इस बार चुनाव हार गए तो राजनीति से सन्यास ले लेंगे।
1985 के बिहार विधानसभा चुनाव में कूदना आसान नहीं था, क्योंकि राजीव- इंदिरा लहर अभी तक चढ़ाव पर थी। वह इससे पहले 1977 में जनता पार्टी के लहर में भी चुनाव हार चुके थे, जबकि साल 1980 के चुनाव में भी उनको जीत नसीब नहीं हुई थी। साल 1985 में अब हरनौत सीट से तीसरी बार मैदान में थे। लोकदल के उम्मीदवार नीतीश कुमार की घर की माली हालत कुछ ठीक नहीं थी। नीतीश के पास पैसा न के बराबर था, जबकि विरोधी नीतीश का पुराना विरोधी, कुर्मी अधिकारी का तरफदार, अरुण चौधरी धनबल से मजूबत थे।
दिवंगत पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब Single Man: The Life & Times of Nitish Kumar of Bihar में लिखा है कि नीतीश ने साल 1984 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। वह सियासी हवा को भांप चुके थे। उनका मानना था कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में कांग्रेस की लहर है। उनकी यह राजनीतिक समझदारी काम आई। उस चुनाव में कांग्रेस को अभूतपूर्व बहुमत मिला था। हालांकि, कांग्रेस की यह लहर साल 1985 के बिहार विधानसभा चुनाव तक बरकार थी।
इधर, साल 1985 के बिहार विधानसभा चुनाव आते आते नीतीश कुमार राजनीतिक तौर पर परिपक्व हो चुके थे। उन्होंने आदर्शवाद के ऊपर वास्तविकता को तरजीह दी, क्योंकि उनके लिए यह करो या मरो का सवाल बन चुका था। संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब में लिखा है कि नीतीश कुमार ने अपनी पत्नी मंजू को वचन दिया था कि इस बार यदि वह चुनाव हार गए, तो राजनीति हमेशा के लिए त्याग देंगे। दूसरा कोई काम धंधा ढूंढकर अपने गृहस्थ जीवन में रम जाएंगे। इस वादे पर उनकी पत्नी मंजू ने उदारता के साथ 20 हजार रुपये का इनाम उनकी झोली में चुनाव प्रचार के लिए डाल दिया। ये राशि लगभग उस दहेज की रकम के बराबर थी, जिस पर नीतीश ने अपने पिता और ससुर के सामने बवाल खड़ा कर दिया था।
वहीं, लोकदल के उम्मीदवार होने के नाते भी उन्हें साधनों की कमी नहीं हुई। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और डिप्टी पीएम देवीलाल का वरदहस्त होने की वजह से भी संसाधनों का अभाव नहीं था। नीतीश का इलेक्शन मैनेजमेंट इस बार बेहतर था। चुनाव में अधिक लोग लगे हुए थे। खूब पोस्टर झंडे लगाए गए थे। तब तक इलेक्ट्रॉनिक मशीन नहीं आई थीं। बैलेट बॉक्स के जरिए ही चुनाव होता था। पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने लिखा कि इस बार नीतीश के चुनाव प्रबंधकों ने अवैध रूप से बंदूकें और गोला बारूद खरीदा और मतदान केंद्रों को विरोधियों के हाथों लुटने से बचाने की जिम्मेदारी संभालने वालों में वितरित कर दिया।
संकर्षण ठाकुर 'सिंगल मैन' पुस्तक में बताया कि चुनाव प्रचार के दौरान कुछ गुंडों को नीतीश कुमार के गुंडे जबरन पकड़कर ले गए, ताकि उनसे बूथों की रखवाली कराई जा सके। ये दंड भेद वाला चुनाव था। जिसमें सब जायज था। साम दाम दंड भेद का प्रयोग सफल रहा। नीतीश को 22 हजार से भी अधिक वोटों से जीत मिली और फिर उन्हें कभी विधानसभा में सीट के लिए तरसना नहीं पड़ा। नीतीश एक शानदार वक्ता थे, लिहाजा जल्द ही उन्हें पूरे बिहार में भी प्रसिद्धि मिल गई। उसके ठीक 2 दशक बाद बिहार में नीतीशकाल का उदय हुआ। जो 2005 से 2026 तक जारी रहा।