
One Nation One Election: देश भर में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने यानी 'वन नेशन वन इलेक्शन' को लागू करने के कानूनी पहलुओं और समय-सीमा को लेकर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए हैं। JPC के चेयरमैन और BJP सांसद पी.पी. चौधरी ने कानूनी विशेषज्ञों के समर्थन और 2029 में इसे लागू करने की संभावना का जिक्र किया था, जिसके जवाब में कांग्रेस सांसद और समिति के सदस्य मनीष तिवारी ने पलटवार किया। मनीष तिवारी ने कहा कि समिति के विचाराधीन बिल में केवल 2034 की समय-सीमा का जिक्र है और 2029 की बात महज अटकलें हैं।
JPC चेयरमैन के बयानों पर सवाल उठाते हुए कमेटी के सदस्य और कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि संसद में अभी जिस संविधान संशोधन बिल पर विचार हो रहा है, वह बिल्कुल स्पष्ट है। उन्होंने बताया कि अगर यह बिल संसद के दोनों सदनों से दो-तिहाई बहुमत से पास भी हो जाता है और कम से कम आधे राज्यों से इसे मंजूरी भी मिल जाती है, तब भी 'वन नेशन वन इलेक्शन' के लिए 2034 की समय-सीमा तय की गई है, न कि 2029 की।
मनीष तिवारी ने कहा कि बिल में 2029 का कोई जिक्र नहीं है और और उन्हें समझ नहीं आ रहा कि जेपीसी चेयरमैन 2029 को लेकर किस आधार पर कयास लगा रहे हैं।
संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के चेयरमैन पी.पी. चौधरी ने कहा था कि अगर संविधान संशोधन बिल को 2028 तक संसद की मंजूरी मिल जाती है, तो उसी साल ''वन नेशन वन इलेक्शन' की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार किसी राज्य को अपनी विधानसभा समय से पहले भंग करने का निर्देश नहीं दे सकती। इसलिए, अगर राज्य अपनी सहमति और इच्छा जाहिर करते हैं, तो यह सिस्टम 2029 में लागू किया जा सकता है।
JPC चेयरमैन पी.पी. चौधरी ने कमेटी की प्रोग्रेस के बारे में जानकारी देते हुए बताया था कि 'वन नेशन वन इलेक्शन' को लेकर अब तक 20 से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं, जिनमें देश के जाने-माने कानूनी विशेषज्ञों के साथ विस्तार से चर्चा की गई है। उन्होंने बताया कि कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट के छह पूर्व मुख्य न्यायाधीशों जस्टिस यू.यू. ललित, रंजन गोगोई, संजीव खन्ना, जे.एस. खेहर और डी.वाई. चंद्रचूड़ के साथ-साथ दिल्ली हाई कोर्ट के तीन पूर्व चीफ जस्टिस, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों और लॉ कमीशन के चेयरमैन जस्टिस दिनेश माहेश्वरी के साथ भी विस्तार से बातचीत की है।
पी.पी. चौधरी के मुताबिक, चर्चा में शामिल 12 विशेषज्ञों में से 11 इस बात पर सहमत थे कि 'एक देश, एक चुनाव' देश के हित में है। उन्होंने कहा कि यह सिस्टम संविधान के बुनियादी ढांचे या फेडरलिज्म के खिलाफ नहीं है। पी.पी. चौधरी ने कहा कि प्रस्तावित कानून राज्यों की संवैधानिक शक्तियों या स्टेट लिस्ट में दखल नहीं देगा, बल्कि यह विकास कार्यों, निवेश और शासन-व्यवस्था को गति देने के लिए चुनाव कार्यक्रम को व्यवस्थित करेगा।