
Mallikarjun Kharge attack PM modi: देश आज अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस मौके पर कांग्रेस मुख्यालय में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा नीत केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने सरकार पर मौलिक अधिकार देने में विफल रहने, संसदीय जवाबदेही से बचने और विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।
सोनिया गांधी और राहुल गांधी की मौजूदगी में पार्टी मुख्यालय में तिरंगा फहराने के बाद, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पीएम मोदी के लाल किले से दिए गए संबोधन पर निशाना साधा। उन्होंने सरकार के बदलाव के दावों को चुनौती देते हुए जोर देकर कहा कि प्रमुख अधिकार-आधारित कल्याणकारी कार्यक्रम संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के नेतृत्व में बनाए गए थे। उन्होंने आगे कहा, 'लाल किले से पीएम हर चीज का श्रेय लेते हैं; यह तो गनीमत है कि वे यह दावा नहीं करते कि दुनिया सिर्फ उन्हीं की वजह से चल रही है।'
मल्लिकार्जुन खरगे ने भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और काम का अधिकार (मनरेगा) सहित ऐतिहासिक अधिकारों की शुरुआत करने का श्रेय यूपीए सरकार को दिया। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि वर्तमान सरकार ने ऐसा एक भी काम नहीं किया है। वर्तमान सरकार ने किसी को कोई 'अधिकार' नहीं दिया है। लोग भी जानते हैं कि कौन-सा कानून कब, किसके लिए और कैसे बना।
उन्होंने आर्थिक स्थिति में सुधार का श्रेय कांग्रेस पार्टी की सरकार को देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आईआईटी, आईआईएम और पीएसयू की स्थापना में योगदान को याद किया। इसके अलावा उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री द्वारा हरित और श्वेत क्रांति को बढ़ावा देने तथा 1971 के युद्ध व सिक्किम के एकीकरण के दौरान इंदिरा गांधी के रणनीतिक नेतृत्व जैसे प्रमुख मील के पत्थरों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए स्वतंत्रता का मतलब सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि हर नागरिक के लिए शिक्षा, अवसर और सम्मान सुनिश्चित करना है।
स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने दिल्ली के लाल किले से 'दिमागी नक्सल' शब्द का इस्तेमाल किया, जिसको लेकर कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सरकार को घेरा।
उन्होंने कहा, 'दो-तीन साल पहले, उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों को 'अर्बन नक्सल' कहा था; उस समय संसद में यह सवाल उठा था कि 'अर्बन नक्सल' की परिभाषा क्या है? गृह मंत्री ने जवाब दिया था कि 'अर्बन नक्सल' जैसी कोई चीज नहीं है, और न ही इसकी कोई परिभाषा है। आज, प्रधानमंत्री लाल किले से अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए 'मेंटल नक्सल' (दिमागी नक्सल) शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं। हकीकत यह है कि जिन लोगों को वे 'अर्बन नक्सल' कहते हैं, अंततः वे उन्हीं के द्वारा उठाए गए मुद्दों और मांगों को स्वीकार कर लेते हैं। उन्होंने जातिगत जनगणना के विचार को 'अर्बन नक्सल' की सोच बताकर खारिज कर दिया था, फिर भी एक साल पहले उन्होंने जाति-आधारित जनगणना की घोषणा की। पहले, आप अपमानजनक टिप्पणियां करते हैं - उन्हें 'अर्बन नक्सल' या 'मेंटल नक्सल' कहते हैं, लेकिन बाद में, आप अपने राजनीतिक विरोधियों की उन्हीं मांगों को स्वीकार कर लेते हैं… 12 साल बाद भी, उनके राजनीतिक भाषण में कुछ भी नया नहीं था…'
उन्होंने यह भी कहा, '28 अक्टूबर 1937 को कलकत्ता में 'वंदे मातरम' के संबंध में कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक आयोजित की गई थी… गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने सलाह दी थी कि बैठकों में 'वंदे मातरम' की केवल शुरुआती पंक्तियां ही गाई जानी चाहिए…'