पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार (Punjab Bhagwant Mann Government) के साख पर सवाल उठने लगे हैं। बीते आठ महीने में राज्य सरकार ने 4 बड़े फैसले वापस लिए। पढ़ें पूरी खबर...
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार (Punjab Bhagwant Mann Government) को एक बार फिर अपना फैसला वापस लेना पड़ा है। यह कोई पहली बार नहीं है, बल्कि पिछले आठ महीनों में चौथी बार है जब भगवंत मान सरकार को जनता और अदालत के दबाव में अपनी बड़ी नीति पलटनी पड़ी। इस बार निशाने पर था पंजाब यूनिफाइड बिल्डिंग रूल्स 2025, जिसे सरकार ने सोमवार को तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया।
पंजाब सरकार ने 15 दिसंबर 2025 को यह नए बिल्डिंग नियम लागू किए थे। इनके तहत कई बड़ी छूट दी गई थीं। 40 फुट चौड़ी सड़कों पर स्टिल्ट प्लस चार मंजिल तक निर्माण की अनुमति, फ्लोर एरिया रेशियो में बढ़ोतरी, रिहायशी इलाकों में कमर्शियल गतिविधियों को बढ़ावा और सेल्फ सर्टिफिकेशन का प्रावधान शामिल था। यानी बिल्डर खुद ही अपने निर्माण को सही बता सकते थे, बिना किसी सरकारी जांच के।
इन नियमों के आते ही शहरी योजनाकारों, आरडब्लूए और नागरिक संगठनों ने जोरदार विरोध शुरू कर दिया। लोगों का कहना था कि इन छूटों से पंजाब के शहर बेतरतीब बस्तियों में बदल जाएंगे। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 24 दिसंबर 2025 को ही इन नियमों पर रोक लगा दी थी और साफ कहा था कि पुराने नियमों के तहत जो उल्लंघन थे, उन्हें अभी माफ नहीं किया जाएगा। आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा और हाउसिंग विभाग ने नोटिफिकेशन जारी करके पुराने नियम यानी 2021 के बिल्डिंग रूल्स और 2018 के बाय लॉज को फिर से लागू कर दिया।
यह पहला मामला नहीं है। पिछले साल अगस्त में सरकार को लैंड पूलिंग पॉलिसी वापस लेनी पड़ी थी, जिसमें किसानों की 40,000 एकड़ से ज्यादा जमीन को शहरी विकास में लगाने की योजना थी। किसानों के भारी विरोध और हाईकोर्ट की रोक के बाद यह नीति खत्म करनी पड़ी।
उसके बाद PLPA यानी पंजाब लैंड प्रिजर्वेशन एक्ट से बाहर की जमीनों पर फार्महाउस बनाने की नीति भी वापस हुई। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इस पर दिसंबर 2025 में रोक लगाई। आरोप था कि यह नीति सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को नजरअंदाज करके ताकतवर लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए लाई गई थी।
नवंबर 2025 में सरकार ने कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी के करीब 50,000 फ्लैट मालिकों पर पुराने स्टांप और रजिस्ट्रेशन शुल्क थोपने की कोशिश की। इससे 200 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य था, लेकिन लोगों के विरोध और हाईकोर्ट के दरवाजे खटखटाने के बाद यह आदेश भी बदलना पड़ा।
हर बार एक जैसा पैटर्न दिखता है। नीति आती है, विवाद होता है, कोर्ट रोकती है और सरकार पीछे हट जाती है। सवाल यह है कि क्या इन नीतियों को बनाने से पहले जनता की राय ली जाती है? क्या कानूनी पहलुओं की जांच होती है? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, ऐसे यू-टर्न होते रहेंगे।