
Punjab Assembly Election 2027: पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले सभी राजनीतिक दल अपनी तैयारी में जुट गए है। साथ ही चुनाव को लेकर सियासी रणनीति भी बनाना शुरू कर दिया है। इसी बीच जेल में बंद सिख उग्रवादियों का मुद्दा एक बार फिर से प्रदेश की राजनीति में आ गया है। पंथिक वोट बैंक को अपनी तरफ करने के लिए आम आदमी पार्टी ने भी सियासी चाल चल दी है।
दरअसल, AAP द्वारा सिख उग्रवादी जगतार सिंह हवारा की पैरोल के मुद्दे पर अपना रुख बदलने के बाद पंथिक वोट को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। माना जा रहा है कि यह मुद्दा पंजाब में सिख समुदाय के वोटों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
जगतार सिंह हवारा को 1995 में तत्कालीन पंजाब मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। वह फिलहाल दिल्ली की मंडोली जेल में बंद है।
बता दें कि कुछ दिन पहले जगतार सिंह हवारा के परिवार और समर्थकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री भगवंत मान से मुलाकात की थी। प्रतिनिधिमंडल ने हवारा के लिए 10 दिन की पैरोल की मांग को आगे बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री का आभार जताया।
मुख्यमंत्री भगवंत मान ने हवारा की पैरोल के मामले में राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया को पत्र लिखा था और उनसे मुलाकात भी की थी।
हवारा की चचेरी बहन पुष्पिंदर कौर और 1998 के बुड़ैल जेल षड्यंत्र मामले में सह-आरोपी रहे जसवंत सिंह इस प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे। बुड़ैल जेल मामले में जसवंत सिंह को 2003 में बरी कर दिया गया था।
सिख उपदेशक बलदेव सिंह वडाला ने हवारा के परिवार और सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। उन्होंने पैरोल की मांग को राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि मानवीय मामला बताया। उनका कहना है कि हवारा की मां की तबीयत खराब है और इसी आधार पर परिवार पैरोल चाहता है।
वडाला ने यह भी कहा कि इससे पहले कई अन्य सिख बंदियों को पैरोल मिली है और वे बिना किसी अप्रिय घटना के वापस जेल लौटे हैं। हवारा के परिवार ने भी सुरक्षा से जुड़े सभी नियमों और शर्तों का पालन करने का आश्वासन दिया है।
हवारा के साथ बेअंत सिंह हत्याकांड में दोषी ठहराए गए परमजीत सिंह भ्योरा और जगतार सिंह तारा की पैरोल को लेकर भी सरकार के रुख पर निगाहें टिकी हैं।
जसवंत सिंह के मुताबिक सरकार इन दोनों की पैरोल अर्जियों पर भी विचार कर रही है। उनका दावा है कि भ्योरा की फाइल फिलहाल पटियाला के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के पास है और हवारा के मामले में फैसला होने के बाद भ्योरा तथा तारा की फाइलों को भी आगे बढ़ाया जा सकता है।
हवारा को लेकर पंजाब की राजनीति में दलों का रुख हमेशा एक जैसा नहीं रहा है। हवारा को शिरोमणि अकाली दल से भी समर्थन नहीं मिला। नवंबर 2015 में कुछ SAD-विरोधी सिख संगठनों ने सरबत खालसा का आयोजन किया था, जिसमें हवारा को अकाल तख्त का जत्थेदार नियुक्त किया गया था। उस समय तत्कालीन उपमुख्यमंत्री और वर्तमान SAD अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने हवारा को आतंकवादी बताया था।
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जब अकालियों की पंथिक वोट पर पकड़ कमजोर होने लगी, तब AAP ने इस मुद्दे पर अपना आधार बनाने की कोशिश की थी।
अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने 1993 के दिल्ली बम विस्फोट मामले में दोषी ठहराए गए देविंदर पाल सिंह भुल्लर की मौत की सजा कम करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
हालांकि 2020 में दिल्ली सरकार के सजा समीक्षा बोर्ड (SRB) ने भुल्लर की समय से पहले रिहाई की मांग को तीन बार खारिज किया। 2024 में भी उनकी अर्जी लगातार सातवीं बार खारिज कर दी गई।
इसके बाद SAD ने केजरीवाल सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि AAP भुल्लर की रिहाई का विरोध कर रही है।
बता दें कि 2009 में SAD के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में भुल्लर को “खूंखार और अनुभवी अपराधी” बताया था।
वहीं 2024 में भुल्लर की अर्जी खारिज होने के बाद अकालियों ने AAP की पंजाब और दिल्ली सरकार पर उसे जेल में रखने की साजिश का आरोप लगाया। सुखबीर बादल ने इसे मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध तक करार दिया था।
पंजाब में पंथिक वोट का राजनीतिक समीकरण अब पहले के मुकाबले कहीं अधिक जटिल हो गया है। वारिस पंजाब दे ने हाल के दिनों में पंथिक राजनीति में अपनी जगह मजबूत करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों के परिवारों को भी राजनीतिक मंच दिया है।
संगठन ने सतवंत सिंह के बेटे को अगले विधानसभा चुनाव के लिए अपना पहला उम्मीदवार बनाया है। सतवंत सिंह उन दो हत्यारों में शामिल था जिन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या की थी।
वहीं फरीदकोट से सांसद सरबजीत सिंह खालसा बेअंत सिंह के बेटे हैं, जो इंदिरा गांधी की हत्या करने वाले दो लोगों में से एक थे। वारिस पंजाब दे की संसदीय बोर्ड के सदस्य सुखविंदर सिंह अघवां, सतवंत सिंह के भतीजे हैं।