आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को डिप्टी लीडर पद से हटाया और संसद में बोलने का वक्त भी रोका। चड्ढा ने वीडियो से जवाब दिया। अब जानें आप के किन-किन नेताओं ने क्यों पार्टी को छोड़ा?
आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने एक वीडियो डाला जिसका टाइटल था 'चुप कराया गया, लेकिन हारा नहीं।'
बस इसी एक वीडियो ने वो सब कह दिया जो महीनों से दबा हुआ था। AAP और राघव चड्ढा के बीच सब ठीक नहीं है, यह अब कोई अंदर की बात नहीं रही।
पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में डिप्टी लीडर के पद से हटाया। फिर सभापति को चिट्ठी लिखकर यह कह गया कि चड्ढा को बोलने का वक्त न दिया जाए। यह कोई साधारण प्रशासनिक फेरबदल नहीं था, बल्कि यह एक साफ संदेश था।
AAP के वरिष्ठ नेता और दिल्ली के पूर्व मंत्री सौरभ भारद्वाज ने शुक्रवार को सीधा आरोप लगाया कि राघव चड्ढा संसद में असली मुद्दे नहीं उठाते। उन्होंने कहा कि चड्ढा छोटे और कम जरूरी मसलों पर बात करते हैं और BJP को कठघरे में नहीं खड़ा करते।
चड्ढा ने इसका जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि वो जो भी संसद में बोलते हैं वो आम लोगों से जुड़े मुद्दे होते हैं। लेकिन पार्टी की नाराजगी साफ दिख रही है।
असली रंजिश की शुरुआत वहां से हुई जब 2024 में केजरीवाल को शराब नीति मामले में गिरफ्तार किया गया था। AAP सड़कों पर उतरी, नेता धरने पर बैठे, कार्यकर्ता आंदोलन कर रहे थे। लेकिन राघव चड्ढा उस वक्त आंख के ऑपरेशन के लिए लंदन में थे।
वो वापस आए लेकिन महीनों तक केजरीवाल की गिरफ्तारी पर कुछ नहीं बोले। पार्टी के अंदर यह बात बहुत खली। करीबियों ने सवाल उठाए कि चड्ढा अपनी सफाई देने में जल्दी थे लेकिन पार्टी के लिए आवाज उठाने में देर लगी।
फरवरी 2026 में जब दिल्ली की अदालत ने केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को उसी कथित भ्रष्टाचार के मामले में बरी किया तो भी चड्ढा चुप रहे। यह चुप्पी पार्टी को और नागवार गुजरी।
अब माना जा रहा है कि राघव चड्ढा केजरीवाल का साथ छोड़कर किसी और पार्टी को ज्वाइन कर सकते हैं। अगर वह ऐसा करते हैं तो आम आदमी पार्टी में इस तरह का कदम उठाने वाले वह पहले नेता नहीं होंगे।
2012 में जब अन्ना आंदोलन की जमीन पर AAP बनी थी तो कई बड़े नाम साथ आए थे। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास, अशुतोष, अलका लांबा, स्वाति मालीवाल और कई और।
ये सब एक-एक करके पार्टी से दूर होते गए। कारण अलग-अलग रहे लेकिन एक धागा सबमें एक जैसा था। पार्टी के भीतर फैसले लेने की ताकत धीरे-धीरे एक छोटे घेरे में सिमटती गई। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने कहा कि AAP ने पारदर्शिता और आंतरिक लोकतंत्र के अपने मूल सिद्धांत छोड़ दिए।
2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से ठीक पहले AAP के सात विधायकों ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। पूर्व कार्यकर्ताओं का कहना था कि चुनाव प्रचार की रणनीति ऊपर से थोपी जाती थी। जमीनी नेताओं और स्वयंसेवकों की कोई नहीं सुनता था।
इसके बाद नतीजा सामने आया। AAP 70 में से सिर्फ 22 सीटें जीत पाई। BJP ने 48 सीटें लेकर सरकार बना ली। पिछले चुनाव के मुकाबले 40 सीटों पर पार्टी को नुकसान हुआ।
राघव चड्ढा पंजाब से राज्यसभा सांसद हैं और उनका कार्यकाल सितंबर 2028 तक है। यानी वो अभी कहीं नहीं जा रहे, कम से कम संसद से तो नहीं। लेकिन AAP के साथ उनका रिश्ता आगे किस रूप में रहेगा यह देखने वाली बात है। पार्टी और सांसद के बीच यह खींचतान अभी खत्म नहीं हुई है, बस अब यह बंद कमरों से निकलकर सबके सामने आ गई है।