
India's Strategic Autonomy: बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत की विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता की चर्चा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तेज हो रही है। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में कहा कि दुनिया के कई देश अब भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की उस नीति की अहमियत समझने लगे हैं, जिस पर भारत वर्षों से अमल करता आ रहा है। हालांकि, सुनक ने भविष्य में देशों के बीच सहयोग के स्वरूप को लेकर एक अलग तस्वीर भी पेश की।
ऋषि सुनक के मुताबिक, आज अनेक देश अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं। वे किसी एक शक्ति या गुट पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपने हितों के अनुसार अलग-अलग देशों के साथ साझेदारी विकसित करना चाहते हैं। सुनक ने इस प्रवृत्ति को भारत की रणनीतिक स्वायत्तता वाली सोच से जोड़ा और स्वीकार किया कि कुछ देश अब उस दृष्टिकोण को समझने लगे हैं, जिसे भारत लंबे समय से अपनाता रहा है।
भारत की इस नीति का मूल उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत दूसरे देशों से दूरी बनाकर चलता है, बल्कि वह परिस्थितियों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग साझेदारों के साथ सहयोग करता है।
सुनक ने यह भी कहा कि उन्हें इस बात पर कम भरोसा है कि भविष्य में मध्यम शक्तियों के लिए कोई एक व्यापक और साझा संस्थागत ढांचा उभरेगा। उनके अनुसार, अधिक संभावना इस बात की है कि अलग-अलग देश किसी खास मुद्दे या साझा हित के आधार पर छोटे समूह बनाकर काम करेंगे।
ऐसे समूहों में मध्यम शक्तियों के साथ कभी-कभी बड़ी शक्तियां भी शामिल हो सकती हैं। जलवायु परिवर्तन, व्यापार, तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर इस तरह का सहयोग उपयोगी साबित हो सकता है।
भारत लंबे समय से विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है। अमेरिका, रूस, यूरोप और एशियाई देशों के साथ उसके रिश्ते इस बहुआयामी कूटनीति की अलग-अलग मिसालें पेश करते हैं। बदलती विश्व व्यवस्था में छोटे और उद्देश्य-आधारित सहयोग समूह भारत को अपने हितों के अनुरूप साझेदार चुनने के अतिरिक्त अवसर दे सकते हैं।