
संजय गांधी की मौत के साथ ही इंदिरा परिवार में एक नए राजनीतिक समीकरण का जन्म हो गया था। (इमेजिंग: एआई)
इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी लगाई तो उनके बेटे संजय गांधी ने अपने हाथों में असीमित अधिकार ले लिए थे। उन पर किसी का नियंत्रण नहीं रह गया था। 1977 में चुनाव हुए तो कांग्रेस की बुरी तरह हार हुई। इंदिरा और खुद संजय भी चुनाव हार गए। संजय गांधी की यह चौथी हार थी। उन्होंने राजनीति छोड़ने का ऐलान कर दिया। लेकिन, जल्द ही उनका हृदय परिवर्तन हो गया। उन्हें लगा कि इस हार को जीत में बदला जा सकता है। उन्होंने कांग्रेस में जान फूंकने का अभियान चलाया और युवाओं पर भरोसा किया। वह ज़ोर-शोर से 1980 के चुनाव की तैयारी में जुट गए। और, इसका नतीजा भी निकला। 1980 में कांग्रेस की शानदार वापसी हुई और संजय गांधी भी अमेठी से लोक सभा पहुंच गए। लेकिन, इसके कुछ ही महीने बाद संजय गांधी की एक विमान हादसे में मौत हो गई।
वह 23 जून, 1980 की सुबह थी। 6.30 बजे थे। संजय गांधी 1, सफदरजंग रोड के बंगले से निकल गए और दिल्ली फ्लाइंग क्लब पहुंच गए। वह जून की तपती गर्मी से बचना चाहते थे। इसलिए सूरज पूरी तरह निकले, इससे पहले ही विमान उड़ा कर लौट आना चाहते थे। कैप्टन सुभाष सक्सेना के भी उनके साथ जाने का कार्यक्रम था। उनका मन नहीं हो रहा था। उन्हें हर्निया का ऑपरेशन करवाना था। उनकी तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। इसलिए वह उड़ान पर जाने से बचना चाह रहे थे। लेकिन, संजय के जिद करने पर वह मान गए थे।
दो सीटों वाला लाल रंग का अमरीकी विमान पिट्स एस-2ए उनका इंतजार कर रहा था। फ्लाइंग क्लब के चीफ इंस्ट्रक्टर ने उस विमान को उड़ाने से मना किया। उन्होंने बताया कि क्लब के एक्स्पर्ट्स ने विमान को उड़ा कर जांचा-परखा नहीं है। इसलिए अभी इसे उड़ाना ठीक नहीं होगा। लेकिन संजय की जिद थी, 'आज इस लाल चिड़िया को मैं उड़ा कर रहूंगा।' उनकी जिद के बाद बात ही खत्म हो गई।
असल में यह पिट्स एस-2ए इमरजेंसी के दौरान संजय को उद्योगपति स्वराज पॉल की तरफ से तोहफे में दिया गया था। जब तक विमान भारत पहुंचा, तब तक कांग्रेस सत्ता से जा चुकी थी। जनता सरकार बन चुकी थी। नई सरकार ने इस तोहफे की जांच कराने की बात कही। इस पर अमरीकी कंपनी डर गई और उसने कहा कि वह भारत से विमान को वापस मंगवाने के लिए तैयार है। यह सब चल ही रहा था कि कांग्रेस की सरकार लौट गई और सारा विवाद खत्म हो गया। संजय गांधी को उस तोहफे को आजमाने का मौका नहीं मिल पाया था, शायद इसलिए उन्हें वह विमान उड़ाने की जल्दी रही होगी। जनता सरकार ने कुछ समय के लिए विमान उड़ाने का उनका लाइसेंस भी जब्त कर लिया था, इस डर से कि कहीं वह मां को लेकर खुद विमान उड़ा कर विदेश न भाग जाएं।
कैप्टन सक्सेना को लेकर संजय पिट्स में उड़ गए। अब वह कैप्टन पर रौब जमाना चाहते थे। हजार फीट की ऊंचाई पर विमान को ले जाने के बाद संजय कुछ कलाबाजियां दिखाने लगे। एक बार जब संजय ने आसमान में पिट्स से गोता लगाया तो विमान वापस ऊपर उठा ही नहीं। वह क्रैश कर गया। दोनों सवारों की उसी समय मौत हो गई।
इंदिरा पर दुखों का पहाड़ टूट गया। सोनिया और राजीव इटली में थे। दोनों फौरन भारत आए। उनके आने के बाद संजय का अंतिम संस्कार हुआ। इसके बाद परिवार में एक नया सवाल पैदा हुआ- अमेठी से अब कौन? इस सवाल के साथ ही नेहरू-गांधी परिवार में एक नए राजनीतिक समीकरण का भी जन्म हुआ।
पत्नी होने के नाते अमेठी पर मेनका अपना हक समझती थीं। उनकी मां की भी यही राय थी। इंदिरा ने जब यह सवाल अकबर अहमद के सामने रखा तो उन्होंने जवाब दिया- राजीव को लड़ाइए। इंदिरा को जवाब पसंद नहीं आया। उन्होंने तुरंत कहा- बेवकूफी वाली बात मत करो। उसकी राजनीति हमारी जैसी नहीं होगी। मुझे उस पर भरोसा नहीं है।' तब अहमद ने मेनका का नाम लिया। लेकिन अब सवाल आया कि मेनका के चुनाव लड़ने योग्य होने में अभी 14 महीने बाकी हैं। तब राजीव को पायलट की नौकरी छोड़ कर राजनीति में उतरने के लिए मनाया गया। मेनका और संजय के करीबी दोस्तों को यह पसंद नहीं आया, लेकिन उनके सामने कोई चारा नहीं था। संजय के 'भक्त' अकबर 'डंपी' अहमद भी इन्हीं में से एक थे।
राजीव का बतौर पायलट 14 साल का करियर हो चुका था। सोनिया भी नहीं चाहती थीं कि वह राजनीति में आएं। तारिक अली ने अपनी किताब 'An Indian Dynasty: The Story of Nehru-Gandhi Family' में लिखा है कि एक वक्त पर सोनिया ने किसी दोस्त से कहा था कि राजीव राजनीति में जाएं, इससे अच्छा होगा कि उनके बच्चे सड़क पर भीख मांगें। यही नहीं, इमरजेंसी के दौरान राजीव ने इंदिरा से इटली में बसने तक की इच्छा जता दी थी। इंदिरा ने कहा था कि ऐसे समय उन्हें छोड़ कर जाने की बात नहीं करें और वह अपने पोते-पोतियों के बिना नहीं रह पाएंगी।
न चाहते हुए भी राजीव ने अंततः पायलट की नौकरी छोड़ी और जून 1981 में भारी मतों से जीत कर लोक सभा पहुंचे। मेनका इसके आठ साल बाद लोक सभा पहुंच सकीं। वह भी जनता दल के टिकट पर।
| नाम | वर्ष (पहली बार MP कब बने?) | सदन / संसदीय क्षेत्र | किन परिस्थितियों में बने |
| पंडित जवाहरलाल नेहरू | 1952 | लोकसभा (फूलपुर / इलाहाबाद पूर्व सह जौनपुर पश्चिम) | स्वतंत्र भारत के प्रथम आम चुनाव (1951-52) में उन्होंने कांग्रेस का नेतृत्व किया और फूलपुर सीट से ऐतिहासिक जीत दर्ज की। वे देश के पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री बने। |
| फ़िरोज़ गांधी | 1952 | लोकसभा (प्रतापगढ़ जिला पश्चिम सह रायबरेली जिला पूर्व) | 1951-52 के प्रथम आम चुनाव में प्रतापगढ़-रायबरेली सीट से निर्वाचित हुए। संसद में वे अपनी ही सरकार (नेहरू सरकार) की भ्रष्टाचार नीतियों के खिलाफ प्रखर आवाज़ उठाने के लिए जाने गए। |
| इंदिरा गांधी | 1964 | राज्यसभा (उत्तर प्रदेश) | लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने पर उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया था। वे पहली बार अगस्त 1964 में राज्यसभा सदस्य चुनकर संसद पहुंचीं। (बाद में 1967 में वे रायबरेली से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतीं)। |
| संजय गांधी | 1980 | लोकसभा (अमेठी) | 1977 में आपातकाल के बाद वे अमेठी से चुनाव हार गए थे। 1980 के आम चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के साथ वे अमेठी सीट से भारी मतों से जीतकर पहली बार संसद पहुंचे। |
| राजीव गांधी | 1981 | लोकसभा (अमेठी - उपचुनाव) | जून 1980 में भाई संजय गांधी के आकस्मिक विमान हादसे में निधन के बाद खाली हुई अमेठी सीट पर मई 1981 में उपचुनाव हुआ। इंदिरा गांधी के आग्रह पर वे राजनीति में आए और उपचुनाव जीतकर संसद पहुंचे। |
| मेनका गांधी | 1989 | लोकसभा (पीलीभीत) | 1984 में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव हारने के बाद, उन्होंने जनता दल के टिकट पर 1989 के आम चुनाव में पीलीभीत से पहली बार जीत हासिल की और वी.पी. सिंह सरकार में मंत्री बनीं। |
| सोनिया गांधी | 1999 | लोकसभा (अमेठी एवं बेल्लारी) | 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद, उन्होंने 1999 के आम चुनाव में पहली बार चुनाव लड़ा। वे उत्तर प्रदेश की अमेठी और कर्नाटक की बेल्लारी सीट से एक साथ चुनाव जीतीं (बाद में उन्होंने अमेठी रखी)। |
| वरुण गांधी | 2009 | लोकसभा (पीलीभीत) | अपनी माँ मेनका गांधी के साथ भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने के बाद, 2009 के आम चुनाव में वे पहली बार पीलीभीत सीट से सांसद चुने गए। |
| राहुल गांधी | 2004 | लोकसभा (अमेठी) | 2004 के आम चुनाव में उन्होंने सक्रिय राजनीति में आधिकारिक प्रवेश किया। अपनी माँ सोनिया गांधी द्वारा अमेठी सीट छोड़ने के बाद, राहुल गांधी अमेठी से पहली बार चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। |
| प्रियंका गांधी वाड्रा | 2024 | लोकसभा (वायनाड - उपचुनाव) | 2024 के आम चुनाव में राहुल गांधी ने रायबरेली और वायनाड दोनों सीटों से जीत दर्ज की थी। राहुल गांधी द्वारा वायनाड सीट छोड़ने के बाद नवंबर 2024 के उपचुनाव में प्रियंका गांधी वाड्रा ने भारी अंतर से जीत दर्ज कर पहली बार संसद में प्रवेश किया। |
Updated on:
14 Oct 2026 11:03 am
Published on:
14 Oct 2026 11:02 am
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