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संजय गांधी ने मेनका से दूरी बनाने के लिए किया था खुशवंत सिंह का इस्तेमाल, पत्रकार ने खुद को कहा था Call Girl of Indian Journalism

इमरजेंसी के दौरान मेनका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में पढ़ाई कर रही थीं। उस दौरान संजय इतने चर्चित हो गए थे कि मेनका का मानना था, 'मुझे लगा कि हर बात के लिए बलि का बकरा संजय को ही बनाया गया। मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों पर कोई आरोप नहीं गया। सब लोग संजय पर ही आरोप लगाते रहे। उन दो सालों में सारी बातों का दोष उन्हीं पर मढ़ा गया।' पर ऐसा क्या हुआ कि संजय को मेनका को खुद से दूर करने के लिए कहीं और व्यस्त रखने की जरूरत महसूस हुई और इसके लिए उन्होंने खुशवंत सिंह को काम पर लगाया? इसके जवाब के साथ संजय से जुड़े कुछ और प्रकरण आप इस आलेख में पढ़ेंगे।
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Sanjay Gandhi and Maneka Gandhi love marriage story, why Sanjay wanted distance from Maneka and Khushwant Singh's role during Emergency

संजय और मेनका गांधी ने प्रेम विवाह किया था, फिर भी ऐसा क्या हुआ कि संजय को मेनका से दूरी बनाने की जरूरत महसूस हुई? (इमेजिंग: एआई)

इंदिरा गांधी ने जब इमरजेंसी लगाई (जून, 1975) तो उसके कुछ महीने पहले ही उनके छोटे बेटे संजय गांधी की शादी (29 सितंबर, 1974) हुई थी। संजय को रिटायर्ड सिख आर्मी ऑफिसर की बेटी मेनका आनंद से प्यार हो गया था और इंदिरा के न चाहते हुए भी दोनों ने शादी कर ली थी। हालांकि मेनका के माता-पिता भी संजय को दामाद बनाने के पक्ष में नहीं थे। उन्हें संजय की उम्र ज्यादा लग रही थी। मेनका उस समय 18 साल की थीं, जबकि संजय 28 साल के हो गए थे। लेकिन, दोनों में से किसी के माता-पिता की नहीं चली तो नेहरू परिवार के एक मुस्लिम दोस्त (यूनुस) के घर पर दोनों की शादी हो गई।

इमरजेंसी के दौरान मेनका 1, सफदरजंग रोड (पीएम का सरकारी निवास) के बंगले पर आईं तो राजीव और सोनिया के बीच थोड़ा अलगाव बढ़ा। हालांकि मेनका पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उन्होंने बाद में खुद स्वीकार किया था, 'मैं तो नई दुल्हन थी। आपातकाल के दौरान पूरे समय मुझे तो इसी बात का एहसास था कि मैं संजय के प्यार में डूबी हुई थी। मेरी पूरी ज़िंदगी संजय के ही इर्द-गिर्द घूम रही थी।'

मेनका से दूरी बनाने के लिए संजय गांधी ने ली थी खुशवंत सिंह की मदद

शादी के बाद मेनका संजय की आसपास ही मंडराती रहती थीं। यही नहीं, वह हर बात में दखलअंदाजी भी करने लगी थीं। बोलते वक्त भी वह बिना सोचे-समझे, कुछ भी बोल दिया करती थीं। संजय इस सब से परेशान हो गए थे। मेनका को व्यस्त रखने के लिए संजय ने एक तरीका निकाला और इसके लिए खुशवंत सिंह की मदद ली। ये सब बातें खुद खुशवंत सिंह ने सार्वजनिक की थीं और बताया था कि उन्होंने 'सूर्या' नाम का एक साप्ताहिक अखबार निकालने में संजय की मदद की, ताकि मेनका को इसका संपादक बनाया जा सके। सिंह ने यह भी लिखा कि इस अखबार के शुरुआती छह अंक उन्होंने खुद संपादित किए थे। हालांकि, मेनका गांधी को लिखने का शौक बचपन से ही था। स्कूल में वह कविताएं लिखा करती थीं। शादी के बाद भी उनका यह लिखना जारी रहा था। हालांकि, तब वह अपनी लिखी कविताएं केवल संजय को ही दिखाती थीं। कई बार वह कविता के माध्यम से ही संजय से बात करती थीं।

संजय गांधी ने खुशवंत सिंह को 'हिंदुस्तान टाइम्स' का संपादक बनवाया और सौंप दी वामपंथी कर्मचारियों की लिस्ट

खुशवंत सिंह नामी पत्रकार थे। इमरजेंसी के दिनों में वह संजय और इंदिरा गांधी के बेहद करीब आ गए थे। तारिक अली ने अपनी किताब '' में लिखा है कि खुशवंत सिंह ने दोस्तों के साथ बातचीत में एक बार खुद को 'भारतीय पत्रकारिता की कॉल गर्ल' तक कह दिया था। हर तरह के लोग उनका इस्तेमाल करते थे और बदले में वह उनसे फायदा लेते थे। इमरजेंसी का समर्थन करने के एवज में नेहरू-गांधी परिवार से भी उन्हें जबरदस्त फायदा मिला। उन्हें 'हिंदुस्तान टाइम्स' का संपादक नामित करा दिया गया। बिरला खानदान के इस अखबार को सरकार का मुखपत्र माना जाता था। आगे चल कर खुशवंत सिंह को राज्य सभा के लिए भी नामित किया गया। हालांकि, जब बाद में उन पर नेहरू-गांधी परिवार की कृपा नहीं रही तो उन्होंने कई राज खोले थे।

संजय के बारे में बताते हुए सिंह ने लिखा था, 'वह बोलते नरम थे, पर आदमी बड़े सख्त थे। अपने रास्ते में आने वाले लोगों पर वह कोई रहम नहीं करते थे। उन्होंने मुझे हिंदुस्तान टाइम्स का संपादक और राज्य सभा सांसद बनवाने में भूमिका निभाई। उन्होंने मुझे हिंदुस्तान टाइम्स के स्टाफ की एक लंबी लिस्ट सौंपी और कहा कि ये सब कम्युनिस्ट हैं, इन पर नजर रखिए। मैंने इस निर्देश पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन वह लिस्ट रख ली। मुझे हैरानी हुई कि संजय गांधी की सूचना पूरी तरह सही थी। लिस्ट में शामिल 25 कर्मचारी भाकपा या माकपा के सदस्य थे।'

संजय गांधी के ससुर की मौत हत्या या आत्महत्या? अनसुलझा ही रह गया सवाल

इमरजेंसी के बाद 1977 में चुनाव हुए तो कांग्रेस और इंदिरा के साथ संजय गांधी भी हार गए थे। जनता पार्टी की सरकार बनी। संजय के कई वित्तीय लेनदेन की जांच के आदेश दिए गए। मारुती प्रकरण के भी जांच के आदेश दिए। लेकिन, कहीं कोई सबूत नहीं

छोड़ा गया था, इसलिए जांच में कुछ हुआ नहीं। जांच के क्रम में संजय गांधी के ससुर कर्नल आनंद से भी पूछताछ हुई थी। एक दिन अचानक उनकी लाश पाई गई। एक हाथ में रिवॉल्वर थामे वह मृत पाए गए। उनकी मौत हत्या थी या आत्महत्या, यह रहस्य का विषय था। एक नोट मिलने से यह रहस्य और गहरा गया था। नोट में लिखा था, ' Pressure Sanjay Unbearable'। मीडिया में कयास लगाए जाने लगे कि कर्नल आनंद पर जनता सरकार का प्रेशर था या दामाद संजय गांधी का या फिर दामाद पर सरकार के दबाव से ससुर परेशान थे? यह रहस्य, रहस्य ही बना रहा।

करण थापर के साथ जहाज में कीं कलाबाजियां, उस दिन तो बच गए, मगर 23 जून, 1980 की उड़ान साबित हुई आखिरी

इमरजेंसी के कुछ ही समय पहले संजय गांधी ने जहाज उड़ाना सीखा था और पायलट का लाइसेंस भी बनवा लिया था। इमरजेंसी के बाद आई जनता सरकार ने उनका लाइसेंस सीज कर लिया था, यह कहते हुए कि हो सकता है कि आप खुद जहाज उड़ा कर अपनी मां इंदिरा गांधी के साथ विदेश भाग जाएं। वैसे कुछ समय बाद वह अपना लाइसेंस वापस पाने में कामयाब हो गए थे, लेकिन उनके साथ विमान में सफर का जो अनुभव पत्रकार करन थापर ने बयां किया है, वह खौफनाक है।

करन थापर संजय गांधी के करीबी रहे। एक बार दो सीटों वाले विमान में पायलट की सीट पर संजय गांधी थे और उनकी बगल वाली सीट पर थापर बैठे थे। तारिक अली ने अपनी किताब में थापर के हवाले से उनकी इस यात्रा का अनुभव बयां करते हुए लिखा है, 'उस एक इंजन वाले विमान में जितने भी लूप थे, एक को भी आजमाने से संजय ने छोड़ा नहीं था। हवा में जितना भी करतब वह दिखा सकते थे, दिखाने के बाद खेतों में काम कर रहे स्थानीय किसानों को डराने लगे। वह उनकी ओर विमान को ले जाते और अंतिम पल में अचानक ऊपर उठा लेते। उनकी ऐसी कलाबाजियों को लेकर कोई जो भी सोचे, लेकिन इतना तो तय है कि इसके लिए फौलाद का सीना और बहुत ज्यादा आत्मविश्वास होना चाहिए।' 23 जून, 1980 को ऐसे ही एक रोमांच में संजय का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया था और 34 साल की छोटी सी उम्र में उनकी और एक अन्य पायलट की (जिन्हें वह जबरदस्ती साथ ले गए थे) जान चली गई थी।

यह महज एक संयोग रहा कि संजय का जन्म भी समय से पहले हुआ था और उनके जन्म पर भी इंदिरा को सामान्य से ज्यादा कष्ट हुआ था।

यह पूरी कहानी 16 छोटे पॉइंट्स में

क्रमविषयप्रमुख घटनाक्रम और तथ्य
1संजय गांधी और मेनका आनंद की शादी29 सितंबर 1974 को संजय गांधी ने मेनका आनंद से शादी की। मेनका उस समय 18 साल की थीं, जबकि संजय 28 साल के थे। दोनों परिवारों की असहमति के बावजूद शादी हुई।
2शादी का स्थानदोनों की शादी नेहरू परिवार के मुस्लिम मित्र यूनुस के घर पर हुई।
3इमरजेंसी के दौरान मेनकाजून 1975 में इमरजेंसी लगने के समय मेनका नई दुल्हन थीं। उन्होंने बाद में कहा कि उस दौरान उनकी जिंदगी संजय गांधी के इर्द-गिर्द घूमती थी और वह उनके प्यार में डूबी हुई थीं।
4मेनका को व्यस्त रखने की योजनासंजय गांधी ने मेनका को व्यस्त रखने के लिए पत्रकार खुशवंत सिंह की मदद ली। उनके सहयोग से साप्ताहिक पत्रिका 'सूर्या' शुरू की गई, जिसकी संपादक मेनका बनीं।
5खुशवंत सिंह की भूमिकाखुशवंत सिंह ने 'सूर्या' के शुरुआती छह अंक खुद संपादित किए। मेनका को बचपन से लिखने का शौक था और वह संजय को अपनी कविताएं दिखाया करती थीं।
6खुशवंत सिंह और संजय गांधी की नजदीकीइमरजेंसी के दौरान खुशवंत सिंह संजय और इंदिरा गांधी के करीब आ गए थे। उन्होंने बाद में लिखा कि संजय की मदद से उन्हें 'हिंदुस्तान टाइम्स' का संपादक और राज्यसभा सांसद बनने में मदद मिली।
7'हिंदुस्तान टाइम्स' के कर्मचारियों की सूचीखुशवंत सिंह के अनुसार, संजय गांधी ने उन्हें अखबार के कर्मचारियों की एक सूची दी थी और उनमें कथित कम्युनिस्टों पर नजर रखने को कहा था। सिंह ने लिखा कि सूची में शामिल 25 कर्मचारी भाकपा या माकपा के सदस्य थे।
8खुशवंत सिंह को मिला राजनीतिक लाभइमरजेंसी का समर्थन करने के दौरान खुशवंत सिंह को नेहरू-गांधी परिवार से लाभ मिलने की बात सामने आई। बाद में उन्होंने परिवार से दूरियां बढ़ने पर कई घटनाओं का खुलासा किया।
91977 के चुनाव में हारइमरजेंसी के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में इंदिरा गांधी और संजय गांधी को हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद जनता पार्टी की सरकार बनी।
10संजय गांधी के वित्तीय मामलों की जांचजनता पार्टी सरकार ने संजय गांधी के वित्तीय लेनदेन और मारुति प्रकरण की जांच के आदेश दिए। लेख के अनुसार, जांच में ठोस नतीजे नहीं निकले।
11संजय गांधी के ससुर की रहस्यमय मौतसंजय गांधी के ससुर कर्नल आनंद पूछताछ के दायरे में आए थे। बाद में वह मृत पाए गए। उनके हाथ में रिवॉल्वर था और उनकी मौत हत्या थी या आत्महत्या, यह सवाल अनसुलझा रह गया।
12रहस्यमय नोटकर्नल आनंद की मौत के बाद एक नोट मिलने की बात सामने आई, जिस पर लिखा था— “Pressure Sanjay Unbearable”। इससे यह सवाल उठा कि उन पर किसका दबाव था।
13संजय गांधी का विमान उड़ाना सीखनाइमरजेंसी से कुछ समय पहले संजय गांधी ने विमान उड़ाना सीखा और पायलट लाइसेंस हासिल किया। जनता पार्टी सरकार ने बाद में उनका लाइसेंस सीज कर दिया था, लेकिन वह इसे वापस पाने में कामयाब रहे।
14करण थापर के साथ विमान में खतरनाक करतबपत्रकार करण थापर ने संजय गांधी के साथ दो सीटों वाले विमान में उड़ान का अनुभव साझा किया। उनके मुताबिक, संजय हवा में लूप और दूसरे जोखिम भरे करतब दिखाते थे तथा खेतों में काम कर रहे किसानों के करीब विमान ले जाकर अचानक ऊपर उठा लेते थे।
15संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत23 जून 1980 को विमान दुर्घटना में संजय गांधी और उनके साथ मौजूद एक अन्य पायलट की मौत हो गई। संजय गांधी की उम्र उस समय 34 वर्ष थी।
16संजय गांधी के जन्म से जुड़ा संयोगलेख के अनुसार, संजय गांधी का जन्म भी समय से पहले हुआ था और उनके जन्म के दौरान इंदिरा गांधी को सामान्य से अधिक कष्ट हुआ था।
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