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जब ट्रेन से उतर कर प्लेटफॉर्म पर दंगाइयों से भिड़ गईं थीं इंदिरा गांधी, तीन साल के राजीव भी थे साथ

इंदिरा गांधी एक प्रधानमंत्री और प्रशासक के रूप में बड़े सख्त स्वभाव की मानी जाती रही हैं। उन्होंने कई मौकों पर इसका सबूत भी दिया था, लेकिन एक मां के रूप में वह कभी कठोर दिल नहीं दिखा पाई थीं। इसके भी कई उदाहरण हैं। यहां हम दोनों मामलों के कुछ ऐसे ही उदाहरण पढ़ा रहे हैं।
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भारत

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Vijay Kumar Jha

•

Oct 12, 2026

Indira Gandhi Rajiv Gandhi

जवाहरलाल नेहरू के साथ इंदिरा गांधी और गोद में राजीव गांधी।(फोटो- X/Indian Youth Congress @IYC)

बात 1947 की है। तब राजीव गांधी तीन और संजय गांधी महज एक साल के थे। राजीव का जन्म 1944 में इलाहाबाद में और संजय का 1946 में दिल्ली में हुआ था। इनकी मां, इंदिरा गांधी का जीवन बड़ा एकाकी और असुरक्षित वातावरण में बीता था। इंदिरा को अपना दौर याद था। इसलिए वह अपने बच्चों को ऐसा माहौल नहीं देना चाहती थीं। इंदिरा और फीरोज हमेशा दोनों बच्चों के साथ रहते और उन्हें खूब प्यार करते थे।

रोने-चीखने का मन करे तो फाउंटेन के पास चले जाओ- इंदिरा ने राजीव से क्यों कहा था ऐसा?

संजय जब तक पैदा नहीं हुए थे, तब तक तो राजीव को माता-पिता का पूरा समय मिलता था। संजय के जन्म के बाद जब इंदिरा की तबीयत ठीक नहीं थी। उनका जन्म समय से पहले हो गया था। प्रसव के दौरान इंदिरा का बहुत खून बहा था। वह बहुत कमजोर हो गई थीं। ऐसे में राजीव के नखरों से उन्हें बड़ी परेशानी होती थी। उन्होंने लिखा है, 'मैं ठीक नहीं थी और राजीव के नखरे मुझे बड़े परेशान करते थे। डांट-फटकार से बात और खराब ही होती थी। इसलिए मैंने तर्क से काम लिया। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हें इतना प्यार करती हूं कि तुम्हारे चिल्लाने से मुझे दिक्कत होती है। राजीव ने कहा- मैं क्या करूं? मैं रोना चाहता नहीं, पर रोना आ जाता है।' इस पर इंदिरा ने कहा- गार्डन में बड़ा सा फाउंटेन है। जब भी तुम्हारा रोने या चीखने का मन करे, तुम फाउंटेन के पास चले जाया करो। इसके बाद जैसे ही इंदिरा को लगता कि राजीव रोने वाले हैं, वह कहने लगतीं- फाउंटेन। राजीव फाउंटेन के पास चले जाते। वहां उनका ध्यान भटकाने वाली इतनी चीजें थीं कि वह अपना 'दुख-दर्द' भूल जाया करते थे।

तीन साल के मासूम राजीव गांधी ने देखा था दंगे का खौफनाक मंजर, मां ने भीड़ से मुस्लिम को बचाया था

1947 में जब दिल्ली में दंगे भड़के तो इंदिरा गांधी बच्चों के साथ मसूरी में थीं। उन्हें पति से फोन पर रोज की हालात की जानकारी मिलती रहती थी। फीरोज गांधी कहते कि दिल्ली औरतों और बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं रह गई है। वह ज़ोर दे रहे थे कि उन्हें किसी हाल में दिल्ली नहीं लौटना है। लेकिन, इंदिरा ने तुरंत लौटने का फैसला किया। उन्होंने सूट केस पैक किए और ट्रेन पकड़ ली। दिल्ली घुसते ही उन्हें दंगाइयों की बर्बरता देखने को मिल गई। दोनों बच्चों की नन्ही आंखों ने भी वह खौफनाक मंजर देखा।

शाहदरा में रेलवे प्लैटफ़ार्म पर दंगाइयों की भीड़ एक मुस्लिम को मार डालने पर उतारू थी। इंदिरा को यह देख बड़ा गुस्सा आया। दोनों बच्चों को ट्रेन में ही छोड़ कर वह प्लैटफ़ार्म पर गईं और ओजस्वी भाषण देकर भीड़ को शांत किया। मुस्लिम की जान बची और ट्रेन आगे बढ़ी।

दून स्कूल भेजे गए राजीव और संजय गांधी

1955 में राजीव और संजय को दून स्कूल भेजा गया। वहां सब जानते थे कि दोनों प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नाती हैं, लेकिन किसी को उनके इस परिचय से कुछ फर्क नहीं पड़ता था। स्कूल के सारे बच्चे एक से बढ़ कर के रईस और संभ्रांत परिवारों के थे। यहां दोनों के जो भी दोस्त बने, ज्यादातर से उनकी दोस्ती बाद में भी कायम रही।

दून जाने के करीब पांच साल बाद राजीव और संजय के सिर से पिता का साया उठ गया। 1960 में फीरोज गांधी का देहांत हो गया। इसका दोनों बच्चों पर बड़ा गहरा असर पड़ा। राजीव तो दर्द छिपाने की नाकाम कोशिश किया करते थे, लेकिन संजय का गम उनके चेहरे पर साफ देखा जा सकता था।

सरकारी नीति घर पर लागू नहीं, विपक्ष की आलोचनाओं से बेफिक्र थीं 'मां' इंदिरा

फीरोज के देहांत के कुछ ही समय बाद इंदिरा के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा था। उनके बच्चों के भविष्य का सवाल। दून स्कूल की पढ़ाई जल्द ही पूरी होने वाली थी। अब आगे क्या? इंदिरा के सामने यह बड़ा सवाल था, क्योंकि बच्चों ने आगे पढ़ाई को लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। इंदिरा ने पिता के सामने यह सवाल रखा। इंदिरा के लिए यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण इसलिए भी था क्योंकि खुद उनकी पढ़ाई में भी बहुत विघ्न पड़ा था।

पंडित नेहरू चाहते थे कि कम से कम एक बच्चा तो आगे पढ़ाई के लिए कैम्ब्रिज जाए। उस समय सरकार पढ़ाई के लिए बच्चों के विदेश जाने की नीति को प्रोत्साहित नहीं कर रही थी। ऐसी सरकारी नीति के बावजूद प्रधानमंत्री अपने नातियों को पढ़ने के लिए विदेश भेजें, इसकी विपक्ष ने तीखी आलोचना की। लेकिन, इंदिरा ने इसकी जरा भी परवाह नहीं की। उन्होंने साफ कहा कि लोग क्या कहते हैं, इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं है। उनके बच्चों के लिए इंग्लैंड जाना जरूरी है।

जब सोनिया से प्यार हुआ, तब तय हुआ राजीव का कैरिअर

राजीव ट्रिनिटी कॉलेज चले गए। हालांकि, वह वहां डिग्री पूरी नहीं कर पाए, लेकिन उन्हें सोनिया वहीं मिलीं। यह बात 1965 की है। सोनिया से प्यार होने के कुछ समय बाद ही वह भारत लौटे और ऐलान कर दिया कि उन्हें विमान उड़ाना सीखना और पायलट बनना है। पहली बार राजीव ने अपने लिए कैरिअर चुना था। इंदिरा को यह पसंद नहीं था। लेकिन, उनके पास उस समय कोई विकल्प भी नहीं था। उन्हें सोनिया भी पसंद नहीं थीं। वह किसी भारतीय को बहू बनाना चाहती थीं। लेकिन, यहां भी उनके पास विकल्प नहीं था। 1968 में राजीव ने सोनिया से शादी कर ली और नेहरू-गांधी परिवार में विदेशी बहू का गर्मजोशी से स्वागत हुआ। राजीव ने इंडियन एयरलाइंस में नौकरी पा ली। सोनिया और इंदिरा की भी अच्छी बनने लगी। सब खुश थे।

संजय की गाड़ी अलग पटरी पर

उधर, संजय गांधी की ज़िंदगी की गाड़ी अलग पटरी पर चल रही थी। तारिक अली अपनी किताब 'The Nehrus and the Gandhis: An Indian Dynasty, में लिखते हैं कि दून स्कूल की ओर से इंदिरा को बता दिया गया था कि संजय कहीं और बेहतर कर सकता है। मतलब वहां से उन्हें निकालना पड़ा था। दिल्ली में कोलंबस स्कूल में उन्हें दाखिल कराया गया। आगे चल कर संजय की अमेरिका या इंग्लैंड जाकर पढ़ने में भी कोई रुचि नहीं थी। रुचि के नाम पर बस वह कारों को लेकर अपना जुनून ही दिखाते रहते थे। सो उन्हें एक तरह से जबर्दस्ती रॉल्स रोयास में अप्रेंटिस के लिए लंदन भेजा गया, जिसे पूरा किए बिना वह लौट आए थे। लौटने के बाद उन्होंने अपने लिए एक कार फैक्ट्री लगवाई। मारुति कंपनी इसी का नतीजा थी।

इस कंपनी के लिए जिस तरह से औपचारिकताएं पूरी की गईं, उसकी काफी आलोचना हुई। इंदिरा पर पक्षपात का आरोप लगा। लेकिन, यहां भी वह इन आलोचनाओं से बेफिक्र रहीं। संजय गांधी के लिए मारुति किस तरह शुरू करवाई गई और कांग्रेस के किस नेता ने क्या मदद की, इसका पूरा ब्योरा यहां पढ़ सकते हैं।