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Indira Gandhi: अपने ही मंत्री की मौजूदगी में क्यों रोने लगी थीं ‘आयरन लेडी’ इंदिरा?

Indira Gandhi: इंदिरा गांधी ने बतौर नेता और प्रधानमंत्री बड़े सख्त फैसले लिए। बांग्लादेश तक बनवा दिया। लेकिन, एक मोर्चे पर वह हमेशा बेबस ही दिखीं।

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भारत

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Vijay Kumar Jha

Jan 06, 2026

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पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की फाइल फोटो।

Indira Gandhi: 1980 में जनवरी का ही महीना था जब इंदिरा गांधी ने सबसे बड़ा राजनीतिक 'कमबैक' किया था। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में बुरी तरह हार चुकीं इंदिरा 1980 में दो जगह से चुनाव लड़ीं और दोनों ही सीटों पर शानदार जीत दर्ज की। आंध्र प्रदेश के मेडक में 6 जनवरी और राय बरेली में 3 जनवरी, 1980 को चुनाव हुए थे। वोटों की गिनती हुई तो मेडक में 49 और राय बरेली में 45 फीसदी से ज्यादा वोट इंदिरा के पक्ष में पड़े।

इंदिरा गांधी ने बतौर नेता और प्रधानमंत्री भले ही 'आयरन लेडी' की छवि बनाई थी, लेकिन एक मां के रूप में वह बेहद कमजोर महिला थीं। मां के रूप में उनकी जिंदगी से जुड़े कई किस्से यह दर्शाते हैं। ये किस्से अलग-अलग किताबों में भी दर्ज हैं। ऐसा ही एक किस्सा है संजय गांधी और मारुति कंपनी की शुरुआत का।

कूमी कपूर ने अपनी किताब 'इमरजेंसी' में इस वाकये के बारे में सिलसिलेवार तरीके से लिखा है। इसके मुताबिक संजय गांधी बड़े बिगड़ैल थे। किसी की नहीं सुनते थे। कारों को लेकर उन्हें बड़ा क्रेज था। कार चोरी के कई मामलों में भी उनका नाम आया था। 1964 में जयंत तेजा नाम के एक पारिवारिक मित्र के जरिये लंदन में संजय गांधी को रॉल्स रॉयस कंपनी के प्लांट में अप्रेंटिसशिप के लिए भेजा गया।

नेहरू से संबंधों के दम पर 20 करोड़ का लोन

तेजा खुद बड़े कारोबारी थे। उन पर नेहरू से संबंधों के चलते 20 करोड़ रुपये का लोन लेने का आरोप था। उनका फर्जीवाड़ा सामने आ चुका था। इस बीच लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बन गए थे। तेजा को पुलिस तलाशने लगी तो वह लंदन भाग गए। उधर संजय का भी मन नहीं लग रहा था। कंपनी में उनका काम भी उनके सीनियर्स को पसंद नहीं आ रहा था। न ही वे उन्हें काम के प्रति गंभीर पा रहे थे। पांच साल की अप्रेंटिसशिप पूरी किए बगैर सर्टिफिकेट लेकर 1968 में संजय गांधी वापस आ गए। यहां इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बन चुकी थीं।

गुलाबी बाग में बना 'मारुति' का डिजाइन

संजय आ तो गए, लेकिन कुछ खास कर नहीं रहे थे। संजय के आते ही भारत सरकार देश में छोटी कार बनाने के लिए निजी क्षेत्र को लाइसेंस देने के मामले में अचानक सक्रिय हो गई। सरकार और योजना आयोग ने तय कर लिया कि लाइसेंस देना है। इस बीच संजय गांधी ने दिल्ली के गुलाबी बाग में छोटी कार का एक डिजाइन बनवाया। इसका नाम रखा मारुति।

डिजाइन बनते ही मिला लाइसेंस

सरकार भी तेजी से संजय के कार बनाने के सपने को हकीकत में बदलवाने के लिए जी-जान से जुट गई। जबकि, उनके पास न तो कार बनाने का अनुभव था और न फैक्ट्री लगाने के लिए पैसे थे। इसके बावजूद 30 सितंबर, 1970 को संजय को सालाना 50000 कारें बनाने का सहमति पत्र सौंप दिया गया। उस समय फखरुद्दीन अली अहमद औद्योगिक विकास मंत्री थे। उनके जूनियर मंत्री थे भानू प्रताप सिंह। दोनों ने सहमति पत्र दिलवाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया था।

इंदिरा गांधी पर पक्षपात का आरोप लग रहा था, पर वह इससे बेअसर थीं। वह भाषणों में संजय गांधी की 'कारोबारी भावना' की तारीफ किया करती थीं और कहती थीं कि भारत के युवाओं को इससे सीख लेनी चाहिए।

बंसी लाल ने ताख पर रख दिए सारे नियम

लाइसेंस की चिंता तो दूर हो ही गई थी। बंसी लाल के रूप में उन्हें एक और संकटमोचक मिला, जिन्होंने उनकी बाकी समस्याओं का समाधान कर दिया। बंसी लाल हरियाणा के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। उन्होंने कंपनी शुरू करने के लिए हरियाणा सरकार से जमीन, पानी, बिजली और तमाम सुविधाएं देने का आश्वासन दे दिया। बंसी लाल उस समय मुसीबत में थे। उनके विधायकों ने बगावत कर दी थी और सीएम के खिलाफ 66 आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति को चिट्ठी भेजी थी। बंसी लाल को लग रहा था कि संजय गांधी की मदद कर वह अपनी मुसीबत से निकल पाएंगे।

सीएम बंसी लाल ने अपने अफसरों को दिल्ली भेजा। संजय गांधी को जमीन पसंद करवाने के लिए। उन्होंने सोनीपत के पास जमीन दिखाई। वह संजय को पसंद नहीं आई। उन्होंने दिल्ली-गुड़गांव रोड पर जमीन पसंद की। वह उपजाऊ जमीन थी। कृषि क्षेत्र में थी। हवाई पट्टी के पास थी। पास की जमीन का इस्तेमाल वायु सेना अपने आयुध भंडार का कचरा फेंकने के लिए करती थी। ऐसी जमीन के हजार गज के भीतर कोई फैक्ट्री नहीं लगाने का नियम था। पर बंसी लाल ने सारे नियम-कानून ताख पर रख दिए और सफलतापूर्वक जमीन का अधिग्रहण कर लिया।

हरियाणा सरकार ने 290 एकड़ जमीन मारुति लिमिटेड को सौंप दी। संजय गांधी ने 10 अगस्त, 1971 को यह कंपनी बनाई थी। कंपनी को 10 हजार रुपये प्रति एकड़ के भाव से जमीन दे दी गई, जबकि पास में जमीन का भाव 35 हजार रुपये प्रति एकड़ था। पैसे चुकाने के लिए भी 18 सालाना किश्तों की मोहलत दी गई। दो किश्त देने के बाद मारुति उद्योग ने किश्त चुकाना भी बंद कर दिया। इस बीच रक्षा उत्पादन राज्य मंत्री वीसी शुक्ल ने वायु सेना के आयुध भंडार का कचरा फेंकने की जगह भी बदलवा दी थी।

लोन के लिए बैंकों ने कम की ब्याज दर, बिना गारंटी दिया कर्ज

लोन देने की बात आई तो भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (आईएफ़सीआई), सेंट्रल बैंक, पंजाब नेशनल बैंक ने ब्याज की दर कम कर दी। जरूरी गारंटी भी नहीं ली। लेकिन बैंकों के लिए मुश्किल हो रही थी कि जिस प्रोजेक्ट के लिए उन्होंने कर्ज दिया, वह शुरू हो ही नहीं रहा था।

संजय गांधी किसी की नहीं सुन रहे थे। इंदिरा गांधी ने अपने कानून मंत्री एचआर गोखले को समझाने के लिए भेजा। संजय ने उन्हें टका सा जवाब दिया- आपका कानून मुझ पर लागू नहीं होता। गोखले ने इंदिरा को यह बात बताई तो वह बिल्कुल असहाय दिख रहीं थीं।

साल 1973 खत्म होने को था और संजय की कंपनी शुरू नहीं हो पा रही थी। इंदिरा ने वित्त मंत्री सी सुब्रमण्यम को कुछ करने के लिए कहा। पीएम की मौजूदगी में उन्होंने संजय से बात की और प्रोजेक्ट रिपोर्ट देने के लिए कहा। संजय ने फिर टका सा जवाब दिया- प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले प्रोजेक्ट रिपोर्ट कैसे बन सकती है? सुब्रमण्यम ने समझाया कि बिना प्रोजेक्ट रिपोर्ट के कंपनी शुरू नहीं हो सकती। इस पर संजय ने कहा- मैं आपके घिसे-पिटे तरीकों से काम नहीं करता।

सुब्रमण्यम ने माफी के अंदाज में पीएम से कहा- संजय को नहीं पता कि कंपनी कैसे खड़ी की जाती है, मैं पेशेवर लोगों के जरिए मदद करवा दूंगा। संजय ने यह पेशकश भी ठुकरा दी। अब वित्त मंत्री के पास कोई चारा नहीं बचा था। उन्होंने बैंकों को आदेश जारी कर दिया कि मारुति को और पैसे नहीं दिए जाएं। बक़ौल सुब्रमण्यम, संजय की हरकतों के चलते इंदिरा गांधी की आंखों में आंसू आ गए थे।