
भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। (फोटो- INC/Official Website)
Indira Gandhi Interesting Facts: नवंबर में जब सोनिया गांधी का संस्मरण 'बिलांगिंग: अ जर्नी ऑफ लव' रिलीज होगा तो संभव है राजीव और सोनिया गांधी के प्रेम और शादी की कहानी के कुछ नए पहलू दुनिया के सामने आएं। जवाहरलाल नेहरू ने न चाहते हुए भी पिता मोतीलाल नेहरू द्वारा तय की गई लड़की से शादी की थी। इसके बाद इंदिरा, राजीव, संजय, प्रियंका, सभी ने अपनी पसंद से ही शादी की है।
संस्मरण से लव स्टोरी के अलावा सोनिया के व्यक्तित्व से जुड़ी कई कहानियां भी सामने आ सकती हैं और शायद इंदिरा की भी। इंदिरा गांधी का जन्म 1917 में 19 नवंबर को हुआ था। यह वह दौर था जब दुनिया विश्व युद्ध झेल रही थी। भारत को भी इस आग में धकेल दिया गया था। वह अपनी आजादी की लड़ाई अलग लड़ रहा था। रूस में बोल्शेविक क्रांति के बाद साम्यवादी शासन कायम हुआ था। इन सारी घटनाओं का आगे चल कर इंदिरा के व्यक्तित्व निर्माण पर बड़ा असर पड़ा। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं। उन दिनों परिवार में मात्र एक बेटी होना बड़ी असाधारण बात हुआ करती थी।
इंदिरा ने शुरुआती दिनों में अपने परिवार को महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई में पूरी तरह से शामिल देखा। इसका असर इंदिरा पर भी पड़ा। वह खुद को भी राष्ट्रवाद के भाव से अलग नहीं कर पा रही थीं। 13वें जन्मदिन पर उन्होंने बड़ा संकोच करते हुए पिता जवाहर लाल नेहरू को लिखा कि उनके दोस्तों ने उनका आगे का करिअर तय कर लिया है। हालांकि, इसमें उन्होंने यह भी जोड़ा- स्वाभाविक है, आजादी मिलने के बाद। जब तक आजादी नहीं मिल जाती, तब तक तो सभी के लिए बस एक ही काम है- लड़ना।
पिता आजादी की लड़ाई में व्यस्त रहते थे, मां कमला नेहरू बीमार रहती थीं। इसलिए इंदिरा पर उनकी उम्र के लिहाज से कहीं बड़ी ज़िम्मेदारी आती रही। उन्हें अकेलापन भी झेलना पड़ता था। 1930 में ही उन्होंने कांग्रेस में शामिल होकर बाकायदा कांग्रेस में शामिल होकर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने की इच्छा जताई थी। पर उनकी कम उम्र के कारण उन्हें कांग्रेस में नहीं लिया गया था।
उस समय परिवार और देश के जो हालात थे, उनका असर इंदिरा की पढ़ाई पर भी पड़ा। 1931 में उन्हें पूना के पीलल्स ऑन स्कूल में दाखिल कराया गया। यह स्कूल एक युवा दंपती ने छात्रों में सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता विकसित करने के मकसद से शुरू किया था। यहां इंदिरा तीन साल रहीं। इसके बाद उन्हें पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में रवींद्र नाथ टैगोर के विश्व भारती भेजा गया। यहां वह मुश्किल से एक साल रह सकीं। इसके बाद उन्हें मां के इलाज के लिए उनके साथ यूरोप जाना पड़ा।
शांति निकेतन में रहते हुए इंदिरा में विजुअल आर्ट्स और डांस के प्रति दिलचस्पी जगी, लेकिन मानव शास्त्र और विज्ञान जैसे विषयों से उनका ज्यादा संपर्क नहीं हो सका। पंडित नेहरू इस कमी को समझ रहे थे। इसे समझते हुए उन्होंने खुद जेल से ही इंदिरा को विभिन्न विषयों का ज्ञान देते रहने की ठानी। इसके लिए उन्होंने न केवल जेल से इंदिरा को नियमित खत लिखे, बल्कि इतिहास और साहित्य के अपने पसंदीदा लेखकों के नाम भी बताए।
जनवरी, 1936 में कमला नेहरू नहीं रहीं। इसके बाद इंदिरा ने ऑक्सफोर्ड जाने की तैयारी शुरू की। इसके लिए उन्होंने ब्रिस्टल में बैडमिंटन स्कूल में दाखिला लिया। अक्तूबर में वह इतिहास पढ़ने समरविले कॉलेज गईं। कुछ समय बाद उन्होंने राजनीति, तर्क शास्त्र और अर्थशास्त्र की तरफ रुख किया। लेकिन, इनमें उनका मन रमा नहीं। उन्होंने लिखा भी कि इन विषयों को पढ़ने के लिए कड़ी मेहनत चाहिए और अर्थशास्त्र में वैसे भी मैं कमजोर हूं। आगे चल कर उनकी तबीयत खराब हो गई और उन्हें बिना डिग्री लिए ऑक्सफोर्ड से वापस आना पड़ा।
1939 में इंदिरा की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो गई थी। उन्हें टीबी निकला था। उन्होंने स्विट्जरलैंड में अपना इलाज करवाया। इस तरह इंदिरा ने कभी औपचारिक और पारंपरिक तरीके से शिक्षा नहीं ली। लेकिन, जिस तरह से उन्होंने पढ़ाई की, उसका उनके व्यक्तित्व निर्माण पर अलग ही प्रभाव पड़ा।
1947 में जब पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बने तो इंदिरा की शादी को पांच साल हो चुके थे और वह दो बच्चों (राजीव और संजय गांधी) की मां बन चुकी थीं। इसके बावजूद वह अपने घर नहीं रहीं। वह पिता के साथ रहने के लिए 'प्रधानमंत्री निवास' चली गईं। पिता की देखभाल और उनसे जुड़ी जिम्मेदारियों में मदद की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। वह नेहरू के साथ कई विदेश दौरों पर गईं। इस दौरान वह दुनिया के कई बड़े नेताओं से मिलीं और कूटनीतिक गुर भी सीख गईं। इसके बाद धीरे-धीरे वह खुद राजनीति में आ गईं।
1951-52 के पहले आम चुनाव में ही कई कांग्रेसियों ने इंदिरा को लोक सभा चुनाव लड़ने का सुझाव दिया, पर वह असमंजस में थीं। बच्चे छोटे थे, फिर उन्हें पिता और पति, दोनों के चुनाव का काम देखना था। फिरोज गांधी भी उस चुनाव में जीत गए। लेकिन, इंदिरा ज्यादा दिन राजनीति से दूर नहीं रह सकीं। उन्होंने अपने अमेरिकी दोस्त डोरोथी नॉर्मन को लिखी चिट्ठी में अकेलेपन और मन की पीड़ा बताते हुए कहा भी था, 'घरेलू ज़िंदगी में मैं बड़ी नाखुश हूं।'
1955 में इंदिरा कांग्रेस की कार्यकारिणी (सीडबल्यूसी) में आ गईं। सीडबल्यूसी पार्टी के अंदर निर्णय लेने वाली सबसे बड़ी ईकाई हुआ करती थी। कई बार इंदिरा को बड़ा अजीब लगता था, जब सीनियर नेता सलाह लेने उनके पास आ जाया करते थे। उन्होंने अपने एक दोस्त के साथ अपनी यह भावना साझा भी की थी। उन्होंने लिखा था, 'जब सारे वीआईपी मेरे पास सलाह लेने आते हैं तो मुझे शर्मिंदगी लगती है। क्या मैं तुम्हें इतनी वरिष्ठ राजनेता लगती हूं?'
Updated on:
09 Sept 2026 07:24 pm
Published on:
09 Sept 2026 07:24 pm
