
Supreme Court on Live-in Relationship: लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहने के बाद अलग होने पर अक्सर शादी के झूठे वादे और यौन उत्पीड़न के आरोप अदालतों तक पहुंचते हैं। सोमवार (27 अप्रैल 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणियां की है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने सवाल उठाया कि जब दो लोग लंबे समय तक आपसी सहमति से साथ रहे हों, तो बाद में रिश्ते के टूटने को आपराधिक मामले के रूप में कैसे देखा जा सकता है।
यह मामला मध्य प्रदेश से जुड़ा है। एक महिला ने अपने पूर्व लिव-इन पार्टनर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज कराई थी। महिला का आरोप था कि पति की मृत्यु के बाद आरोपी ने शादी का वादा कर उसके साथ संबंध बनाए और लंबे समय तक उसका शोषण किया। दोनों करीब 15 साल तक साथ रहे और उनका एक सात साल का बच्चा भी है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस FIR को रद्द कर दिया था, जिसे महिला ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुनवाई के दौरान बेंच ने कई अहम कानूनी पहलुओं पर ध्यान दिलाया। कोर्ट ने कहा कि जब कोई रिश्ता आपसी सहमति से लंबे समय तक चलता है तो उसे बाद में अपराध के रूप में वर्गीकृत करना जटिल हो जाता है।
अदालत ने यह भी कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में कोई औपचारिक कानूनी बंधन नहीं होता है इसलिए ऐसे रिश्तों में अलग होने की संभावना हमेशा बनी रहती है।
महिला की ओर से यह दलील दी गई कि आरोपी ने शादी का वादा किया था और अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाई थी। इस पर कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि विधिक रूप से विवाह हुआ होता, तो महिला के पास अधिक मजबूत कानूनी विकल्प जैसे दूसरी शादी (Bigamy) के खिलाफ कार्रवाई या गुजारा-भत्ता की मांग की जा सकती है।
हालांकि, लिव-इन संबंधों में अधिकारों और दायित्वों की प्रकृति अलग होती है जिसे हर मामले में तथ्यों के आधार पर परखा जाता है।
सुनवाई के दौरान ‘सहमति’ और ‘शोषण’ के बीच अंतर को लेकर भी चर्चा हुई। कोर्ट ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी होता है कि संबंध की प्रकृति क्या थी और क्या आरोप आपराधिक तत्व को स्थापित करते हैं। साथ ही, यह भी माना गया कि इस तरह के मामलों में सामाजिक और संवेदनशील पहलू भी जुड़े होते हैं।
अदालत ने मामले के मानवीय पहलू पर जोर देते हुए कहा कि बच्चे के हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कोर्ट ने सुझाव दिया कि महिला बच्चे के लिए गुजारा-भत्ता और अन्य कानूनी राहतों की मांग कर सकती है। साथ ही, दोनों पक्षों को आपसी सुलह के जरिए समाधान तलाशने की सलाह दी गई। इस संबंध में अदालत ने नोटिस जारी कर आगे की प्रक्रिया शुरू की है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी दृष्टिकोण को रेखांकित करती है। यह स्पष्ट करती है कि लंबे समय तक सहमति से चले रिश्तों में आपराधिक आरोप तय करना सरल नहीं होता और प्रत्येक मामले को उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर देखा जाना आवश्यक है।