Supreme Court on Election Commission: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर केंद्र सरकार से बड़ा सवाल पूछा है। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग केवल स्वतंत्र होना ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए। कोर्ट ने चयन समिति में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री की मौजूदगी और सीजेआई को बाहर किए जाने पर चिंता जताई।
Supreme Court Judgement on Election Commission of India: सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर केंद्र सरकार से बड़ा सवाल पूछा है। शीर्ष अदालत ने गुरुवार को कहा कि चुनाव आयोग केवल स्वतंत्र होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसका स्वतंत्र दिखना भी जरूरी है। अदालत ने केंद्र से पूछा कि चुनाव आयुक्तों के चयन पैनल में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने की क्या जरूरत है और इसमें किसी तटस्थ व्यक्ति को क्यों नहीं रखा गया है?
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि चयन समिति का तीसरा सदस्य ऐसा होना चाहिए जो निष्पक्ष तरीके से फैसला लेने में सक्षम हो। अदालत ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से पूछा, “चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना ही पर्याप्त नहीं है, उसका स्वतंत्र दिखना भी जरूरी है। चयन पैनल में केंद्रीय मंत्री क्यों होना चाहिए?”
सुप्रीम कोर्ट मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था। इस कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी सीजेआई को बाहर कर दिया गया था।
फिलहाल चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह व्यवस्था चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करती है।
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत से कहा कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की धारणा महत्वपूर्ण है और यह नियुक्ति के बाद चुनाव आयुक्तों के कामकाज और फैसलों में दिखाई देगी।
हालांकि अदालत ने इस पर जोर दिया कि चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता का दिखना भी लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है।
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर), जया ठाकुर और अन्य याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं में कहा है कि 2023 का कानून स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत के खिलाफ है।
याचिकाओं में कहा गया कि सीजेआई को चयन प्रक्रिया से बाहर कर दिए जाने के बाद प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित मंत्री का प्रभाव बढ़ गया है, जिससे नियुक्ति प्रक्रिया में संतुलन खत्म हो सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2 मार्च 2023 के अपने फैसले में निर्देश दिया था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, सीजेआई और लोकसभा में विपक्ष के नेता की समिति की सलाह पर की जाए।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में इस कानून के तहत नियुक्त दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। हालांकि अदालत ने मामले की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई जारी रखी हुई है।
याचिकाओं में खासतौर पर कानून की धारा 7 और 8 को चुनौती दी गई है, जो चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया तय करती हैं। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को फिर से शामिल किया जाए, ताकि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनी रहे।