
Shyama Prasad Mukherjee grandson: "एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे!" आज से दशकों पहले कश्मीर की धरती पर बुलंद हुई डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की यह हुंकार भारत के इतिहास में अमर है। उनके इसी संकल्प को जब मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाकर पूरा किया, तो पूरे देश ने राहत की सांस ली। लेकिन इस ऐतिहासिक फैसले पर खुद डॉ. मुखर्जी के परिवार की क्या राय है? पश्चिम बंगाल के हुगली में रहने वाले उनके पोते बानी प्रसाद मुखर्जी ने इस पर अपनी दिल छू लेने वाली भावनाएं व्यक्त की हैं, जो आज हर देशभक्त के दिल को छू रही हैं।
बीते सोमवार को जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर पीएम मोदी ने कहा कि आज देश एक महान विभूति को स्मरण कर रहा है। उन्होंने कहा कि आज हम उस विचार बीज का गुनगान कर रहे हैं, जो वर्तमान समय में चारों तरफ फल-फूल रहे हैं। उनका विचार भारत को दिशा देने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने सोमवार को कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर, मैं उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहता हूं। आज का कार्यक्रम इस बात का प्रमाण है कि जब कोई सरकार राष्ट्र को प्राथमिकता देती है (राष्ट्र सर्वोपरि), तो राष्ट्रीय नायकों को सम्मानित किया जाता है और देश उनके आदर्शों का अनुसरण करने का प्रयास करता है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की 125वीं जन्म-जयंती को हमारी सरकार दो वर्षों के राष्ट्रीय उत्सव के रूप में मना रही है। ये पिछले वर्ष 6 जुलाई को शुरू हुए थे और अगले साल 6 जुलाई तक चलेंगे। और अब तो बंगाल में भाजपा सरकार बनने के बाद इस राष्ट्रीय सम्मान को, एक प्रेरणा पुरुष को याद करने में बंगाल ने अपने आप में रौनक बढ़ा दी है। कुछ दिन पहले ही 20 जून को भव्य तरीके से पश्चिम बंग दिवस का आयोजन किया गया था। ये बंगाल की धरती, बंगाल की विरासत को प्रणाम था।
23 जून 1953 को भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का 51 वर्ष की आयु मे श्रीनगर में निधन हो गया था। उनकी मौत को लेकर आज भी सवाल उठते हैं। दरअसल, मुखर्जी एक देश, एक विधान और एक निशान के नारे के साथ जम्मू कश्मीर में लागू परमिट सिस्टम का विरोध कर रहे थे। 11 मई 1953 को वह बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं। जहां शेख अब्दुल्ला की सरकार की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पहले सेंट्रल जेल और फिर निशात बाग के पास एक कॉटेज में नजरबंद कर दिया गया। जहां 19 व 20 जून की रात प्लूराइटिस हुआ। इससे पहले भी वे पीड़ित रह चुके थे। डॉक्टर अली मोहम्मद ने स्ट्रेप्टोमाइसिन का इंजेक्शन दिया, हालांकि मुखर्जी ने अपनी एलर्जी बताई थी। 22 जून को हृदय क्षेत्र में तेज दर्द और सांस लेने में तकलीफ हुई। उन्हें अस्पताल शिफ्ट किया गया जहां प्रोविजनल हार्ट अटैक का निदान हुआ। 23 जून की सुबह 3:40 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। आधिकारिक रूप से हृदयाघात बताया गया, लेकिन इलाज में लापरवाही, दवा की खुराक, पोस्टमॉर्टम न कराए जाने और परिवार को जानकारी न देने से साजिश के आरोप लगे।