'सरहद के लोग झुकते नहीं: पहली मुठभेड़ में ही पांच दहशतगर्दों को मारा, 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारी गोलाबारी के बीच भी सरहद पर अपने लोगों की जान बचाने के लिए डटे रहे। यह उस गुमनाम देशभक्त की दास्तां है, पांच साल पाकिस्तान की कालकोठरी में बिताए। पहली ही मुठभेड़ में पांच आतंकियों को ढेर किया। आज भी यह नायक सरहद पर मुस्तैद है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी इन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर कई जिंदगियां बचाईं।
जम्मू-कश्मीर में सीमा पार की साजिशों और गोलाबारी के बीच ढाल बनकर खड़े गुमनाम योद्धाओं में एक हैं नवीन शर्मा। पुंछ के रहने वाले शर्मा ने आतंकियों को उनके घर में घुसकर चुनौती दी। पाकिस्तान की कोट लखपत जेल की रूह कंपाने वाली यातनाएं सहीं और जब अपनों ने उसे मृत मानकर उसका पिंडदान तक कर दिया, तब वह पांच साल बाद लौटे और 'ऑपरेशन सिंदूर' की भारी गोलाबारी के बीच भी सरहद पर लोगों की जान बचाने के लिए डटे रहे।
नवीन शर्मा ने बताया कि 90 के दशक में आतंकियों को उन्हीं के भाषा में जवाब देने की ठानी और पहुंच गए उन्हीं के ठिकाने पर। एलओसी पार किया तो माइंस लगाकर पांच आतंकियों को मौत के मुंह में धकेल दिया। दूसरी बार अपने दो साथियों के साथ पाकिस्तान में पकड़े गए। यह बात 1994-95 की है जब कश्मीर पाकिस्तान प्रायोजित आतंक में जल रहा था। तब सिर्फ 17 साल के नवीन का खून खौल उठा और वह आतंकरोधी स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) में शामिल हो गए।
नवीन ने बताया कि 'मैंने घुसपैठ वाले रास्तों पर एलओसी पार विस्फोटक लगाकर आतंकियों को भारी नुकसान पहुंचाया था। इसी कड़ी में 9 मार्च 1995 को अपने दो साथियों संजू और बग्गा के साथ आतंकियों के ठिकानों की खुफिया जानकारी जुटाने की ठानी। एलओसी पार हम सभी पीओके के 'बांदी मियापुर' जा पहुंचे। वहां पहचान छिपाने के लिए हमने खतना (सुन्नत) तक करवा लिया था, लेकिन बाजार में पाकिस्तानी रेंजरों की नजर पड़ गई। उनसे हमारा तीन बार आमना-सामना हुआ। उन्होंने हमें पकड़ लिया।
नवीन को लाहौर की खौफनाक कोट लखपत जेल के 'सस्पेक्ट सेल' में डाल दिया गया। वह कालकोठरी इतनी तंग थी कि न कोई सीधा खड़ा हो सकता था, न चैन से लेट सकता था। दिन में सिर्फ दो रोटियां मिलती, जिनमें पिसा हुआ कांच मिला होता था। रात 8 बजे से लगातार खड़े रहने की ड्यूटी ताकि वे सो न सकें। हीटर पर पेशाब करने को मजबूर किया जाता, जिससे पूरे शरीर में बिजली का करंट दौड़ जाता था। आइएसआइ ने उन्हें दौलत और निकाह का लालच देकर जासूस बनाने की कोशिश की, नहीं माने तो और टॉर्चर किया।
नवीन के लौटने की उम्मीदें तब टूट गईं, जब 1997 में उनके साथ गए साथी अकेले वतन लौटे और नवीन के बारे में अनभिज्ञता जताई। परिवार और समाज ने मान लिया कि वे पाकिस्तानी गोलाबारी में मारे जा चुके हैं। उनके भाई प्रदीप बताते हैं, 'जब सारी उम्मीदें खत्म हो गईं, तो भारी मन से हमने हरिद्वार जाकर उनका पिंडदान कर दिया। हमने सोचा कि भले ही उन्हें अपनी मिट्टी नसीब न हुई हो, लेकिन उनके हिस्से के सभी धार्मिक संस्कार पूरे किए जाएं।'
जेल की यातनाओं के विरुद्ध नवीन ने 15 दिनों तक अन्न-जल त्याग दिया। हालत बिगड़ने पर जब उन्हें लाहौर के अस्पताल ले जाया गया, तो वहां उनकी मुलाकात 'इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस' के प्रतिनिधियों से हुई। नवीन ने उन्हें अपना पता और आपबीती बताई। अगस्त 2000 में रेड क्रॉस के एक फोन कॉल ने पुंछ में हलचल मचा दी- 'नवीन जिंदा हैं!' उनके भाई प्रदीप ने तुरंत दिल्ली जाकर तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी से गुहार लगाई। 26 दिसंबर 2000 को अटारी-वाघा बॉर्डर के रास्ते नवीन की वतन वापसी हुई।
लंबे टॉर्चर ने नवीन के शरीर को कमजोर कर दिया था। उन्होंने खुफिया विभाग की नौकरी के बजाय परिवार के साथ पुंछ में रहकर दुकान चलाने का फैसला किया। जब 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान भारी गोलाबारी हुई, तो नवीन फिर से मोर्चे पर डट गए। अपनी जान जोखिम में डालकर उन्होंने दर्जनों लोगों को रेस्क्यू किया और अस्पतालों तक पहुंचाया। नवीन गर्व से कहते हैं- 'जेल में मैंने जीने की उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन देश मुझे वापस ले आया। हम सरहद के लोग हैं, न कभी थके हैं और न कभी झुकेंगे।'