Trinamool Congress Conflict: टीएमसी के बागी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय का ममता बनर्जी से मतभेद कोई नई बात नहीं है। करीब 22 साल पहले भी उन्होंने ममता बनर्जी के खिलाफ बगावती रुख अपनाया था। उस समय उन्होंने कांग्रेस के साथ मिलकर राजनीतिक दांव चला था, तब 2004 में तृणमूल कांग्रेस के भीतर खलबली मच गई थी।

Trinamool Congress Controversy: बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हालत खस्ता है। अब पार्टी दो गुटों में बट गई है। जमकर विरोध भी हो रहा है। शीर्ष नेतृत्व पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। राडार पर टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी हैं। इस बीच 20 बागी सांसदों ने ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ ज्वाइन भी कर लिया है। जो बागी हैं, उनके नाम के चर्चे भी तेज हैं। इन्हीं में से एक हैं, ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने वाले सुदीप बंदोपाध्याय।
ऐसा पहली बार नहीं है, जब सुदीप बंदोपाध्याय ने ममता से दूरी बनाई हो। करीब 22 साल पहले भी (2004 में) उन्होंने पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया था। उस दौर में उनके फैसले ने TMC के भीतर बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम था। वो इसलिए क्योंकि तब वो टीएमसी के फायरब्रांड नेता माने जाते थे।
मुर्शिदाबाद के बरहमपुर में जन्मे सुदीप बंदोपाध्याय ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी। वह प्रियरंजन दासमुंशी के करीबी माने जाते थे और 1987 में पहली बार पश्चिम बंगाल विधानसभा पहुंचे। 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई, तब सुदीप भी उनके साथ आ गए और पार्टी के शुरुआती बड़े चेहरों में शामिल हो गए।
हालांकि 2004 में दोनों के रिश्तों में दरार आ गई। ममता बनर्जी चाहती थीं कि कोलकाता नॉर्थ वेस्ट सीट से सुब्रत मुखर्जी चुनाव लड़ें, लेकिन सुदीप अपनी सीट कतई छोड़ने को तैयार नहीं थे। लेकिन शीर्ष नेतृत्व के फैसले कारण मजबूरी में उन्होंने TMC छोड़कर कांग्रेस का रुख किया। फिर 2006 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की। उन्होंने अपनी ताकत दिखाई।
लेकिन फिर समय बदला और उनका मन बदला। कारण था- कांग्रेस में उनकी बात न बनना। उनको महत्व न मिलना। यहीं कारण था कि वह साल 2008 में वह फिर तृणमूल कांग्रेस में लौट आए। इसके बाद उन्होंने लगातार 2009, 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव जीतकर पार्टी में अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखी।
TMC के भीतर अधिकारों और फैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर असंतोष बढ़ा है। यह बात खुद टीएमसी के कई सांसद कह चुके हैं। कई वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि पार्टी में अब उनकी बात नहीं सुनी जाती। जैसे पहले था। अब उनकी बातों को या तो हाईकमान तक पहुंचाया ही नहीं जाता या फिर नजरअंदाज कर दिया जाता है। निर्णय कोई एक करता है, जबकि ये मिलकर सहमति से होना चाहिए। पार्टी में फूट को लेकर कई सांसद इसका जिम्मेदार अभिषेक बनर्जी को मानते हैं। उनका कहना है कि अब वहीं फैसले लेते हैं, ममता बनर्जी तो बूढी हो चुकी हैं। उनकी अब पार्टी में नहीं चलती।
हाल ही में बागी सांसद अरूप चक्रवर्ती ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि ममता बनर्जी इतनी डरी हुई हैं कि वह पार्टी की एक बैठक नहीं बुला पा रही हैं। दीदी अब बूढी हो चुकी हैं। मैं दीदी की परछाई था। सब उनके साथ थे। सब जानते हैं अब दीदी को कार्य करने नहीं दिया जा रहा है।