
Sukesh Chandrasekhar: दिल्ली की एक अदालत ने ठग सुकेश चंद्रशेखर को 8 साल की सजा सुनाई है। सुकेश ने खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताकर एक न्यायिक अधिकारी पर दबाव बनाने और जमानत दिलाने की कोशिश करने का आरोप है। यह मामला साल 2017 का है, जब चंद्रशेखर एक भ्रष्टाचार मामले में पुलिस हिरासत में था।
तीस हजारी कोर्ट की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) हर्षिता मिश्रा ने सजा सुनाते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 170, 189 और 507 के तहत अलग-अलग सजा दी। अदालत ने तीनों सजाओं को एक साथ चलाने के बजाय लगातार (consecutive) चलाने का आदेश दिया।
सुकेश को धारा 170 के तहत दो साल, धारा 189 के तहत दो साल और धारा 507 के तहत चार साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई। इस तरह कुल सजा 8 साल हुई।
दरअसल, मामला अप्रैल 2017 का है। उस समय सुकेश चंद्रशेखर एक भ्रष्टाचार के मामले में पुलिस हिरासत में था। यह मामला विशेष न्यायाधीश पूनम चौधरी की अदालत में लंबित था।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, चंद्रशेखर ने पुलिस कांस्टेबल मनजीत का मोबाइल फोन हासिल किया और उससे न्यायाधीश के आधिकारिक लैंडलाइन तथा निजी मोबाइल नंबर पर फोन किया।
पहली बार फोन करने वाले ने खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक जज के निजी सचिव के तौर पर पेश किया। इसके बाद एक अन्य व्यक्ति ने फोन संभाला और खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताते हुए कहा कि वह केंद्रीय गृह मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की ओर से फोन कर रहा है।
फोन करने वाले ने न्यायिक अधिकारी से चंद्रशेखर को तत्काल जमानत या अंतरिम जमानत देने को कहा। साथ ही, ऐसा नहीं करने पर गंभीर पेशेवर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी गई।
फोन आने के बाद न्यायिक अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट से संपर्क किया और संबंधित जज के वास्तविक निजी सचिव से बात की। उन्हें बताया गया कि जज की ओर से ऐसा कोई फोन नहीं किया गया था। साथ ही, फोन करने वाले ने जिस व्यक्ति को जज का सचिव बताया था, वह उस कार्यालय में काम भी नहीं करता था।
अदालत ने 20 अगस्त को सुकेश चंद्रशेखर को इस मामले में दोषी ठहराया था। कोर्ट ने उसकी इस पूरी कोशिश को एक बेतुका नाटकीय प्रदर्शन बताया, जिसके जरिए उसने चल रही न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश की।
अदालत ने कहा कि न्यायिक आदेश अदालत कक्ष में दिए जाते हैं, किसी गुप्त फोन कॉल पर नहीं। न्यायिक विवेक न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर इस्तेमाल होता है, न कि फोन करने वाले व्यक्ति की कथित हैसियत के आधार पर।
कोर्ट ने कहा कि चंद्रशेखर ने कथित तौर पर कई वर्षों तक कॉलर आईडी में हेरफेर करने और प्रभावशाली लोगों की पहचान का इस्तेमाल करने के कारण शायद यह मान लिया था कि बड़ी से बड़ी झूठी पहचान और पर्याप्त दुस्साहस के सामने कानून झुक जाएगा।
अदालत ने कहा कि किसी नौकरशाह या राजनीतिक बिचौलिए का रूप धारण करना लालच से पैदा हुआ अपराध हो सकता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज या उनके सचिव का रूप धारण करना न्याय व्यवस्था और संस्थागत व्यवस्था को चुनौती देने जैसा है।
सजा सुनाते हुए अदालत ने कहा कि यह कोई अकेली गैरकानूनी हरकत नहीं थी, बल्कि सरकारी और न्यायिक संस्थाओं के कामकाज को प्रभावित करने के उद्देश्य से की गई सुनियोजित गतिविधियों की श्रृंखला थी।
कोर्ट ने कहा कि चंद्रशेखर के अपराध करने का तरीका जानबूझकर, सुनियोजित और धोखाधड़ीपूर्ण था। इसलिए प्रत्येक अपराध के लिए दी गई सजा को अलग-अलग प्रभावी रूप से लागू किया जाना जरूरी है।
अदालत ने उसकी सजा को एक साथ चलाने और नरमी बरतने की मांग भी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि चंद्रशेखर ने अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं दिखाया और इसके बजाय शिकायतकर्ता तथा ट्रायल कोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की कोशिश की।
अदालत ने इस मामले की जांच को लेकर दिल्ली पुलिस की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने जांच को सतही और लापरवाही से भरी बताते हुए कहा कि जांचकर्ताओं ने कई महत्वपूर्ण सबूत जुटाने में गंभीर चूक की।
पुलिस मोबाइल फोन बरामद नहीं कर सकी। इसके अलावा क्राइम ब्रांच परिसर की CCTV फुटेज सुरक्षित नहीं की गई और महत्वपूर्ण कॉल रिकॉर्ड तथा गवाहों की समय पर जांच नहीं की गई।
अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि पुलिस हिरासत में रहते हुए चंद्रशेखर को एक कथित रूप से सुरक्षित स्मार्टफोन तक पहुंच कैसे मिली। कोर्ट के मुताबिक, जांच में इस महत्वपूर्ण पहलू की भी पर्याप्त पड़ताल नहीं की गई।