
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक नोटिस जारी कर एक जनहित याचिका (PIL) पर जवाब मांगा है। इस याचिका में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने और उन्हें ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए कड़े नियम व एक रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बनाने की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को पहले से लंबित एक समान मामले के साथ जोड़ दिया है और अगली सुनवाई के लिए 3 दिसंबर की तारीख तय की है। याचिका में कहा गया है कि बच्चों को डिजिटल दुनिया के हानिकारक प्रभावों से बचाना केंद्र और राज्य सरकारों का संवैधानिक दायित्व है। यह जिम्मेदारी केवल माता-पिता की देखरेख या टेक कंपनियों की मर्जी पर नहीं छोड़ी जा सकती।
यह जनहित याचिका इंदौर के द एमराल्ड हाइट्स इंटरनेशनल स्कूल' और इसके निदेशक सिद्धार्थ सिंह ने वकील वैभव चौधरी के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में दायर की है। याचिका में भारत सरकार, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, कानून और न्याय मंत्रालय तथा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिका में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के अकाउंट बनाने, उन्हें बनाए रखने और इस्तेमाल करने के लिए उम्र के आधार पर लागू किए जा सकने वाले प्रतिबंधों की मांग भी की गई है।
याचिकाकर्ताओं ने बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल से उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है। याचिका में कहा गया है कि सोशल मीडिया का अनियंत्रित इस्तेमाल बच्चों में डिप्रेशन, घबराहट, चिंता, भावनात्मक परेशानी और कम आत्मसम्मान जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है।
इसके अतिरिक्त याचिका में बच्चों के व्यवहार से जुड़ा डेटा इकट्ठा करने और ऐसे प्लेटफॉर्म डिजाइन का इस्तेमाल करने का मुद्दा उठाया गया है, जिनका मकसद बच्चों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर उलझाए रखना होता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इनमें से कुछ खतरे तुरंत सामने नहीं आते और अक्सर माता-पिता या शिक्षकों को इनका पता तब तक नहीं चलता, जब तक कि काफी नुकसान न हो चुका हो।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों के पूरे दायरे से बचाने के लिए माता-पिता की निगरानी, अलग-अलग प्लेटफॉर्म की नीतियां या पेरेंटल कंट्रोल टूल काफी नहीं हैं। उनका कहना है कि सोशल मीडिया कंपनियों के लिए ऐसे नियम होने चाहिए जिन्हें प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके और जिनका पालन भी हो। याचिका में अदालत से यह घोषणा करने की भी मांग की गई है कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से प्रभावी सुरक्षा न दे पाना, उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है।