
Tibet Nepal Floods 2026: अगस्त 2026 में तिब्बत-नेपाल सीमा पर आई विनाशकारी बाढ़ के कई हफ्ते बाद भी इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। खासकर नेपाल और चीन की ओर से सामने आए मौत के आंकड़ों में बड़ा अंतर चर्चा का विषय बना हुआ है। इटली की ऑनलाइन पत्रिका 'बिटर विंटर' की एक रिपोर्ट ने इस अंतर के साथ-साथ हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते प्राकृतिक खतरों को लेकर भी चिंता जताई है। रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल में बाढ़ और उसके बाद हुए विनाश में 1,300 से ज्यादा लोगों की मौत दर्ज की गई, जबकि तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के अधिकारियों ने मृतकों की संख्या 43 बताई। रिपोर्ट ने दोनों आंकड़ों के बीच भारी अंतर पर सवाल उठाए हैं।
'बिटर विंटर' की रिपोर्ट के अनुसार, सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूट गया। इसके बाद बर्फ, चट्टान, मिट्टी और तलछट का विशाल मलबा 100 किलोमीटर से अधिक दूरी तक घाटी में नीचे आया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि ग्लेशियर का मलबा करीब सात मिनट में क्यिरोंग पोर्ट तक पहुंच गया और इसके बाद नेपाल की ओर नीचे की तरफ बढ़ता गया। आईएएनएस की रिपोर्ट के अनुसार इस आपदा में चीन के पांच मंजिला कस्टम और इमिग्रेशन परिसर के पूरी तरह मलबे में दबने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, सड़कें, करीब 12 हाइड्रोपावर परियोजनाएं, संचार नेटवर्क और सीमा पर स्थित फ्रेंडशिप ब्रिज समेत कई पुल भी क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए।
रिपोर्ट में सबसे ज्यादा सवाल चीन और नेपाल की ओर से जारी मौत के आंकड़ों में अंतर को लेकर उठाए गए हैं। नेपाल में जहां 1,300 से ज्यादा मौतों का आंकड़ा बताया गया, वहीं तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के अधिकारियों ने 43 लोगों की मौत की जानकारी दी।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ पश्चिमी एजेंसियों ने चीन पर मौतों की संख्या कम बताने का आरोप लगाया है। चीन ने ऐसे आरोपों को खारिज किया है और आधिकारिक आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने या चुनौती देने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी की है।
रिपोर्ट ने मौतों के आंकड़ों से आगे बढ़कर एक और सवाल उठाया है कि क्या हिमालयी क्षेत्र में इस तरह की आपदा निकट भविष्य में दोबारा आ सकती है। चीन के नेशनल क्लाइमेट सेंटर के वरिष्ठ इंजीनियर वांग पेंगलिंग के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है और इससे एक के बाद एक प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। वांग के अनुसार, तापमान में बदलाव से क्रायोस्फीयर यानी बर्फ और जमी हुई भूमि से जुड़े प्राकृतिक तंत्र की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इससे आइस एवलांच, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और ग्लेशियर से जुड़े मलबे के बहाव जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
रिपोर्ट ने China Climate Bulletin 2026 में 2004 से 2025 के बीच दर्ज आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि पर्माफ्रॉस्ट की ऊपरी सीमा पर तापमान में औसतन 0.34 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ता तापमान पर्माफ्रॉस्ट को कमजोर कर रहा है। इससे जमी हुई जमीन और चट्टानों की मजबूती प्रभावित हो सकती है और पहाड़ी ढलानों की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।
इस घटनाक्रम ने हिमालयी क्षेत्र में बदलते मौसम, ग्लेशियरों की स्थिरता और बाढ़ जैसी घटनाओं से जुड़े जोखिमों पर नए सिरे से ध्यान खींचा है।