UPI transaction fee: यूपीआई नेटवर्क तेजी से विस्तार कर रहा है, जिसका मुख्य कारण सरकार की यूपीआई को फिलहाल लेनदेन को निशुल्क रखने की नीति है। हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर सिस्टम चलाने में बैंकों और अन्य हितधारकों के लिए बहुत महंगा पड़ता है।
Digital Payments: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) आज भारत की वित्तीय धड़कन बन चुका है। चाय की टपरी से लेकर बड़े मॉल तक, हर जगह यूपीआई से पेमेंट हो रहा है। भारत में हर महीने 22 अरब से ज्यादा लेनदेन होते हैं, जिनकी कुल कीमत लगभग 30 लाख करोड़ रुपये है। सन 2016 में शुरू हुआ यह स्वदेशी सिस्टम अब फ्रांस, यूएई और सिंगापुर सहित 8 देशों में भी अपना डंका बजा रहा है। यूपीआई की इस अभूतपूर्व सफलता का सबसे बड़ा कारण यह है कि आम जनता के लिए यह पूरी तरह से फ्री है। लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह हमेशा मुफ्त रह पाएगा?
दरअसल, इतने विशाल नेटवर्क को सुचारू, सुरक्षित और तेज बनाए रखने में बैंकों और तकनीकी कंपनियों को भारी भरकम खर्च करना पड़ता है। फिलहाल, 1 जनवरी 2020 से सभी यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट जीरो है। यानि इस सेवा को देने वाली कंपनियों की कोई सीधी कमाई नहीं हो रही है। इस नुकसान की भरपाई के लिए सरकार अपनी तरफ से बैंकों को सब्सिडी देती है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए सरकार ने इसके लिए 2,000 करोड़ रुपये का बजट रखा है।
वित्त संबंधी एक संसदीय समिति ने अपनी हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि यह मुफ्त वाला मॉडल लंबे समय तक नहीं चल सकता। समिति का मानना है कि सरकार की 2,000 करोड़ रुपये की मदद उद्योग की वास्तविक लागत का केवल 11% ही पूरा कर पाती है। अगर सिस्टम से कमाई नहीं होगी, तो नई तकनीक, सुरक्षा और छोटे शहरों में इसके विस्तार पर असर पड़ेगा। इससे भविष्य में पूरा यूपीआई इकोसिस्टम लड़खड़ा सकता है।
समिति ने सिस्टम को मजबूत बनाए रखने के लिए एक 'स्तरीय राजस्व मॉडल' (टियर रेवेन्यू मॉडल) का सुझाव दिया है। आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब है कि आम आदमी और छोटे दुकानदारों के लिए यूपीआई पहले की तरह ही मुफ्त रहेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 90% छोटे लेनदेन को फ्री रखा जा सकता है। लेकिन बड़ी कंपनियों, कॉरपोरेट्स या एक तय सीमा से बड़े अमाउंट वाले ट्रांजैक्शन पर कुछ चार्ज या फीस लगाई जा सकती है। इससे सिस्टम अपने पैरों पर खड़ा हो सकेगा और सरकारी खजाने पर भी बोझ नहीं पड़ेगा।
वित्तीय सेवा विभाग के सचिव एम. नागराजू ने भी संकेत दिए हैं कि भविष्य में जरूरत पड़ने पर सरकार अपनी नीति में बदलाव कर सकती है और कुछ खास तरह के यूपीआई पेमेंट्स पर शुल्क लगाने के प्रस्तावों पर विचार किया जा रहा है। कुल मिलाकर, आम आदमी को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन बड़े लेनदेन करने वालों को आने वाले समय में अपनी जेब थोड़ी ढीली करनी पड़ सकती है।
बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यूपीआई को लंबे समय तक सुरक्षित, आधुनिक और हैकिंग से मुक्त बनाए रखने के लिए 'जीरो एमडीआर' नीति की समीक्षा जरूरी थी। बिना कमाई के कोई भी तकनीकी ढांचा ज्यादा दिन तक अपग्रेड नहीं किया जा सकता। वहीं, आम यूजर्स में इस खबर को लेकर थोड़ी चिंता है, लेकिन 90% लेनदेन फ्री रहने के प्रस्ताव से छोटे व्यापारियों और आम जनता को बड़ी राहत मिली है।
इस संसदीय रिपोर्ट के बाद अब निगाहें सीधे वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक पर टिक गई हैं। सरकार अब इस बात का खाका तैयार करेगी कि मुफ्त लेनदेन की 'सीमा' क्या होगी। कितने हजार से ऊपर के पेमेंट को 'बड़ा लेनदेन' माना जाएगा और उस पर कितना प्रतिशत चार्ज लगेगा, इस पर जल्द ही आरबीआई नई गाइडलाइन या ड्राफ्ट पेपर जारी कर सकता है।
इस पूरे मामले का एक अंतरराष्ट्रीय पहलू भी है। यूपीआई तेजी से ग्लोबल हो रहा है। यदि भारत में बड़े पेमेंट्स के लिए कोई नया रेवेन्यू मॉडल लागू होता है, तो विदेशी जमीन पर यूपीआई का इस्तेमाल करने वाले प्रवासियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों के लिए भी ट्रांजैक्शन फीस का ढांचा बदलना पड़ सकता है। इससे क्रॉस-बॉर्डर पेमेंट्स (सीमा पार भुगतान) से जुड़े विदेशी बैंकों को भी यूपीआई के नए वित्तीय ढांचे के साथ खुद को जोड़ना होगा।