
H-1B Visa Rules: अमेरिका के मिडटर्म चुनाव के बाद H-1B वीजा को लेकर भारतीय पेशेवरों की उम्मीदें और चिंताएं, दोनों ही बढ़ गई हैं। इस चुनाव का असर न केवल अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच सत्ता के संतुलन को प्रभावित करेंगे, बल्कि इनका असर इमिग्रेशन नीति, विदेशी कर्मचारियों की भर्ती और ग्रीन कार्ड से जुड़े फैसलों पर भी पड़ सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान H-1B वीजा को लेकर कई कड़े कदम उठाए गए हैं। इससे यह सवाल उठता है कि अमेरिकी कांग्रेस में बहुमत हासिल करने के बाद क्या डेमोक्रेट्स ट्रंप प्रशासन की नीतियों को रोक पाएंगे? क्या भारतीय IT पेशेवरों को राहत मिलेगी या H-1B वीजा की राह और भी मुश्किल हो जाएगी?
H-1B अमेरिका के लिए एक अस्थायी वर्क वीजा है। यह अमेरिकी कंपनियों को अन्य देशों से ऐसे पेशेवरों को काम पर रखने की अनुमति देता है, जिनके पास विशेष योग्यताएं हों। आमतौर पर इन नौकरियों के लिए किसी खास क्षेत्र में कम से कम स्नातक की डिग्री या इसके समकक्ष कोई योग्यता होना आवश्यक होता है। इस वीजा का उपयोग मुख्य रूप से टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, विज्ञान, स्वास्थ्य सेवा और वित्त जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।
भारतीयों के लिए H-1B वीजा केवल रोजगार का एक साधन नहीं है, यह अमिका में करियर बनाने और फिर ग्रीन कार्ड पाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हर साल, जो भारतीय छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों से मास्टर या डॉक्टरेट की डिग्री पूरी करते हैं, वे अमेरिका में अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए इसी वीजा पर निर्भर रहते हैं। आमतौर पर यह शुरुआती तीन वर्षों के लिए दिया जाता है, जिसे बढ़ाकर अधिकतम छह साल तक किया जा सकता है। यदि किसी कर्मचारी का ग्रीन कार्ड आवेदन (फॉर्म I-140) स्वीकृत हो जाता है, तो वे इस छह साल की सीमा के बाद भी अनिश्चित काल के लिए वीजा विस्तार पाने के पात्र हो जाते हैं।
H-1B वीजा प्रोग्राम में भारतीयों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। U.S. सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS) के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025 के लिए H-1B की कुल 4,06,348 याचिकाओं को मंजूरी दी गई थी। इनमें भारत में जन्मे लाभार्थियों की संख्या 2,83,772, यानी लगभग 69.9% थी। वहीं, चीन दूसरे स्थान पर था, जिसकी हिस्सेदारी लगभग 12.1% थी।
इसका मतलब यह है कि H-1B नियमों में कोई भी बड़ा बदलाव सीधे तौर पर भारतीय पेशेवरों को प्रभावित कर सकता है, विशेष रूप से उन लोगों को जो भारतीय IT फर्मों या अमेरिकी टेक कंपनियों में काम कर रहे हैं और साथ ही उन युवाओं को जो अमेरिका में रोजगार पाने की इच्छा रखते हैं।
H-1B प्रोग्राम के तहत सामान्य श्रेणी के लिए सालाना 65,000 वीजा की सीमा तय है। इसके अलावा, 20000 सीटें उन योग्य उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं, जिनके पास अमेरिका के किसी उच्च शिक्षण संस्थान से मास्टर डिग्री या उससे उच्च स्तर की डिग्री है। इस तरह कुल सालाना सीमा 85,000 हो जाती है। हालांकि, कुछ एम्प्लॉयर्स और संस्थानों को इस सीमा से छूट मिल सकती है।
H-1B वीजा के लिए सबसे पहले किसी अमेरिकी कंपनी को उम्मीदवार को नौकरी का ऑफर देना होता है और उनके लिए वीजा को स्पॉन्सर करने के लिए सहमत होना पड़ता है। इसके बाद कंपनी USCIS के ऑनलाइन पोर्टल के जरिए उम्मीदवार का इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्रेशन पूरा करती है। रजिस्ट्रेशन के बाद एम्प्लॉयर्स को अमेरिकी श्रम विभाग से एक प्रमाणित लेबर कंडीशन एप्लिकेशन (LCA) भी प्राप्त करना होता है।
इस प्रक्रिया के बाद जब उम्मीदवार का चयन हो जाता है तो कंपनी USCIS के पास फॉर्म I-129 दाखिल करती है और जरूरी दस्तावेज एवं निर्धारित फीस जमा करती है। पेटिशन की मनूरई के बाद उम्मीदवार को वीजा आवेदन की जरूरी प्रक्रिया पूरी करनी होती है, अगर वो अमेरिका से बाहर रहता है।
वित्तीय वर्ष 2027 के लिए USCIS ने प्रत्येक इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण के लिए $215 की फीस तय की है। इसके अलावा, फॉर्म I-129 फाइलिंग फीस और अन्य संबंधित शुल्कों को मिलाकर कुल खर्च आमतौर पर $2,000 से $5,000 के बीच होता है।
इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने कुछ विदेश में मौजूद H-1B उम्मीदवारों की याचिकाओं के लिए 1,00,000 डॉलर के अतिरिक्त भुगतान का प्रावधान किया था। हालांकि, इस प्रावधान को अदालत में चुनौती दी गई और उसके फैसले के बाद 1 लाख डॉलर की फीस की वसूली रोक दी गई थी और जुलाई के अंत में USCIS ने भी फीस नहीं वसूलने की बात कही।
H-1B और L-1 वीजा सुधार अधिनियम: 30 सितंबर 2025 को रिपब्लिकन सीनेटर चक ग्रासली और डेमोक्रेटिक सीनेटर डिक डर्बिन ने H-1B और L-1 वीजा सुधार अधिनियम को पेश किया। दोनों पार्टियों के सांसदों के समर्थन वाले इस विधेयक में वेतन और भर्ती से जुड़े नियमों को सख्त बनाने के प्रावधान शामिल हैं। साथ ही, इसमें उच्च डिग्री वाले STEM पेशेवरों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
H-1B वीजा के दुरुपयोग को रोकने का प्रस्ताव: रिपब्लिकन सीनेटर टिम शीही ने H-1B वीजा दुरुपयोग समाप्ति अधिनियम, 2026 पेश किया। इस विधेयक में नए H-1B वीजा जारी करने पर तीन साल की रोक लगाने का प्रस्ताव है। साथ ही, इसमें कुछ याचिकाओं के लिए 100,000 डॉलर की फीस तय करने की बात कही गई है। सीनेटर शीही का कहना है कि H-1B कार्यक्रम का मूल उद्देश्य विशेष और उच्च-कौशल वाले पदों पर कामगारों की कमी को पूरा करना था, न कि अमेरिकी कामगारों की जगह सस्ते विदेशी कामगारों को रखना। यह विधेयक अभी केवल एक प्रस्ताव के चरण में है।
प्रमुख IT कंपनियों के लिए PERM का निलंबन: अक्टूबर 2026 में, अमेरिकी श्रम विभाग ने आठ प्रमुख टेक कंपनियों TCS, इंफोसिस, विप्रो, HCL, कॉग्निजेंट, कैपजेमिनी, माइक्रोसॉफ्ट और एडोब के लिए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) प्रक्रिया को निलंबित कर दिया। प्रशासन ने आरोप लगाया कि इन कंपनियों ने अमेरिकी कामगारों को बाहर रखने के लिए नियमों में हेरफेर किया था। इस कदम से इन कंपनियों में काम कर रहे मौजूदा H-1B कर्मचारियों के लिए नए ग्रीन कार्ड आवेदनों का रास्ता बंद हो गया है।
H-1B वीजा को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के कई नेता अमेरिकी कामगारों को प्राथमिकता देने और H-1B प्रोग्राम में हो रहे कथित दुरुपयोग को रोकने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि कंपनियां कम वेतन पर विदेशी कामगारों को रखकर अमेरिकी कामगारों के लिए मौकों को कम कर सकती हैं। इसी तर्क के आधार पर H-1B वीजा के लिए कड़े नियमों, वेतन बढ़ाने और भर्ती प्रक्रिया में बदलाव की मांग की जा रही है। टिम शीही का H-1B वीजा के दुरुपयोग को खत्म करने वाला कानून इसी का एक उदाहरण है। साथ ही, ग्लेन ग्रोथमैन और जॉन हस्टेड का बिल भी अमेरिकी कामगारों के हितों को प्राथमिकता देने की कोशिश करता है।
वहीं, कई डेमोक्रेटिक नेता इमिग्रेशन के रास्ते खुले रखने और अमेरिकी कंपनियों को ग्लोबल टैलेंट को काम पर रखने का मौका देने के पक्ष में हैं। सीनेटर डिक डर्बिन जैसे नेता H-1B और L-1 वीजा रिफॉर्म एक्ट के जरिए दुरुपयोग रोकने के साथ-साथ उच्च डिग्री वाले STEM छात्रों और असली प्रतिभाओं को प्राथमिकता देने की बात करते हैं।
अमेरिकी मिडटर्म इलेक्शन के बाद कांग्रेस में सत्ता का समीकरण H-1B वीजा के भविष्य पर असर डाल सकता है। भारतीय पेशेवरों को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन उनकी चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं होंगी।