
रंग-बिरंगी पैकेजिंग, कैंडी और फलों जैसे मीठे स्वाद, आकर्षक डिज़ाइन और सोशल मीडिया प्रचार के सहारे फ्लेवर्ड वेप (Vape) तेज़ी से किशोरों को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं। इन्हें अक्सर ‘सिर्फ भाप’ बताकर सुरक्षित दिखाया जाता है, लेकिन एक्सपर्ट्स के अनुसार यह भाप नहीं, बल्कि जहरीले रसायनों और सूक्ष्म कणों से भरा एरोसोल है। चंडीगढ़ (Chandigarh) में हाल में एक कॉलेज छात्र को गंभीर सांस संबंधी समस्या के साथ अस्पताल लाया गया। जांच में पता चला कि उसके फेफड़ों की छोटी श्वास नलिकाएं स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त हो चुकी थीं। डॉक्टरों ने इसे ‘पॉपकॉर्न लंग’ नाम की दुर्लभ और खतरनाक बीमारी बताया।
डब्ल्यूएचओ और विभिन्न वैज्ञानिकों की रिसर्च के अनुसार वेप के धुएं में कई खतरनाक और ज़्यादा जहरीले तत्व पाए जाते हैं। इनमें लेड (सीसा) की मात्रा सामान्य सिगरेट की तुलना में 300 गुना तक ज़्यादा दर्ज की गई है। जिंक का स्तर भी 30 गुना ज़्यादा पाया गया है। इसके अलावा वेप के सेवन से फॉर्मलाडेहाइड, एसीटैल्डिहाइड, निकेल और क्रोमियम जैसे कैंसरकारी रसायन फेफड़ों की गहराई तक पहुंचते हैं।
वेप का असर यूं तो हर उम्र-वर्ग के लोगों पर पड़ रहा है, लेकिन किशोरों को इससे ज़्यादा खतरा होता है। पिछले कुछ समय में किशोरों में वेप की लत तेज़ी से बढ़ी है, लेकिन इसके सेवन से कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा रहता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार इससे अस्थमा का 30% ज़्यादा जोखिम रहता है। श्वसन रोगों का खतरा 49% ज़्यादा रहता है। ब्रेन अटैक की 52% ज़्यादा आशंका रहती है। ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट बढ़ने का खतरा भी रहता है। मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर पड़ता है। इसके सेवन से अवसाद का जोखिम 37% बढ़ जाता है। साथ ही आत्मघाती विचारों की 23% ज़्यादा संभावना रहती है।
किशोरों के कमरे या कपड़ों से फलों जैसी मीठी गंध आना, बिना सर्दी-जुकाम के लगातार खांसी, गले में जलन, बार-बार प्यास लगना, मुंह सूखना, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और एकाग्रता में कमी वेपिंग के संकेत हो सकते हैं। माता-पिता को इन संकेतों पर ध्यान देना चाहिए।
भारत में वेप पर प्रतिबंध है, फिर भी ये उपकरण आसानी से उपलब्ध हैं। इन्हें यूएसबी ड्राइव, पेन, हाइलाइटर, स्मार्टवॉच या लिपस्टिक जैसी वस्तुओं का रूप दिया जाता है, जिससे पहचानना मुश्किल हो जाता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए सोशल मीडिया प्रचार और अवैध सप्लाई नेटवर्क पर सख्त डिजिटल तथा जमीनी कार्रवाई जरूरी है।