
Vinesh Phogat: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) को पहलवान विनेश फोगाट को जारी किए गए शो-कॉज नोटिस पर दो सप्ताह के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी कहा कि फैसला लेने से पहले विनेश फोगाट को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया जाए।
न्यायमूर्ति स्वराना कांत शर्मा की एकल पीठ ने विनेश फोगाट की याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश दिया। अदालत को WFI की ओर से बताया गया कि एशियाई खेलों के चयन ट्रायल में भागीदारी से जुड़ी विनेश की शिकायत अब अप्रासंगिक हो चुकी है। इसके बाद कोर्ट ने महासंघ को निर्देश दिया कि वह 9 मई को जारी शो-कॉज नोटिस पर दो सप्ताह के भीतर निर्णय लेकर इसकी जानकारी विनेश फोगाट और अदालत दोनों को दे।
सुनवाई के दौरान WFI की ओर से अदालत को आश्वस्त किया गया कि शो-कॉज नोटिस पर कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले विनेश फोगाट को व्यक्तिगत रूप से अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाएगा। वहीं, विनेश फोगाट की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि याचिका में केवल चयन ट्रायल का मुद्दा ही नहीं, बल्कि WFI की चयन नीति से जुड़े व्यापक सवाल भी उठाए गए हैं। इस पर अदालत ने कहा कि ऐसे मुद्दों को नई रिट याचिका दाखिल कर चुनौती दी जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि मौजूदा याचिका का निपटारा किया जा रहा है और इसके बाद नई याचिका दायर करने का विकल्प खुला रहेगा।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पहले दिए गए न्यायिक आदेशों के आधार पर विनेश फोगाट को एशियाई खेलों के चयन ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति दी गई थी। हालांकि, उनके वकील ने कहा कि ट्रायल के दौरान कथित आचरण को लेकर अब उन्हें एक नया शो-कॉज नोटिस भी जारी किया गया है।
WFI ने 9 मई को विनेश फोगाट को पहला शो-कॉज नोटिस जारी किया था। महासंघ ने उन्हें 26 जून 2026 तक घरेलू प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए अयोग्य भी घोषित किया था। WFI का कहना था कि संन्यास के बाद वापसी करने वाले खिलाड़ियों पर एंटी-डोपिंग नियमों के तहत छह महीने की अनिवार्य नोटिस अवधि लागू होती है।
अपनी याचिका में विनेश फोगाट ने WFI की चयन नीति और उस सर्कुलर को चुनौती दी थी, जिसमें एशियाई खेलों के चयन ट्रायल में केवल कुछ निर्धारित प्रतियोगिताओं के पदक विजेताओं को ही पात्र माना गया था। उन्होंने दलील दी कि चयन के लिए तय योग्यता अवधि का बड़ा हिस्सा उनकी गर्भावस्था और प्रसव के बाद स्वास्थ्य लाभ (पोस्टपार्टम रिकवरी) के दौरान बीता। ऐसे में यह व्यवस्था उनके लिए एक 'बंद और कठोर चयन प्रणाली' बन गई, जो मनमानी और भेदभावपूर्ण है।